मुख्यपृष्ठस्तंभसाहित्य शलाका: हिंदी आलोचना का द्वंद्व और महादेवी वर्मा !

साहित्य शलाका: हिंदी आलोचना का द्वंद्व और महादेवी वर्मा !

डाॅ. दयानंद तिवारी। हिंदी आलोचना की शुरुआत भारतेंदु युग से हुई और वह छायावाद तक आते-आते प्रौढ़ हो गई। आधुनिक काल में `छायावाद’ को सबसे अधिक `आलोचना’ जगत का विरोध झेलना पड़ा। इसीलिए इस वाद पर सर्वाधिक चर्चा हुई फिर भी छायावाद के चार स्‍तंभों में प्रसाद, पंत, निराला के मुकाबले महादेवी पर बहुत कम लिखा गया। कुछ आलोचकों ने तो महादेवी की कविता का जमकर मजाक उड़ाया। सबसे महत्‍वपूर्ण यह है कि हिंदी की मर्दवादी आलोचना, महादेवी की स्‍त्री-संवेदना को समझने में विफल रही? और इसीलिए वह उनकी कविताओं पर बिफरती रही। इस संदर्भ में भी महादेवी के साहित्‍य पर विचार किया जाना आवश्‍यक है। जब एक स्त्री अपने लिए साहित्य में पुरुषों से ‘विस्तृत नभ का एक कोना’ मांगती है तो उसे पुरुषवादी हिंदी आलोचना से किस तरह की गलीज प्रतिक्रिया मिलती है वह यहां देखा जा सकता।
महादेवी एक गुलाम, मर्दवादी समाज में स्त्री की स्थिति को देखती हैं, उसे रचती हैं और उससे बाहर निकलने के रास्तों की भी तलाश करती हैं। उनका गद्य उन्हें एक स्त्रीवादी लेखिका सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है। उनकी कविताओं में यही चेतना है पर चूंकि वह छायावादी मुहावरे में अभिव्यक्त हुई है इसलिए आलोचकों ने उन्हें रहस्यवादी, वेदना और विरह आदि की कवयित्री कह उनकी धार को कुंद कर दिया है। उनकी कविताओं में ‘नीर भरी दुख की बदली’ है भी तो इसलिए कि उन्हें इस विडंबना का तीखा एहसास है कि इस ‘विस्तृत नभ का कोई कोना कभी न अपना होगा।’ इस शृंखला की कड़ियां अभी भी स्त्री के पैरों में हैं। आचार्य रामचंद्र शुक्‍ल ने छायावाद का जिन कारणों से विरोध किया वह `रहस्‍यात्‍मकता, अभिव्‍यंजना के लाक्षणिक वैचित्र्य, वस्‍तुविन्‍यास की विशृंंखलता, चित्रमयी भाषा और मधुमयी कल्‍पना है।’ आचार्य शुक्‍ल छायावाद पर यूरोपीय और रवींद्रनाथ ठाकुर का प्रमाद घोषित करते हुए इस निष्‍कर्ष पर पहुंचे कि : `छायावाद’ शब्‍द का प्रयोग दो अर्थों में समझना चाहिए। एक तो रहस्‍यवाद के अर्थ में, जहां उसका संबंध काव्‍यवस्‍तु से होता है अर्थात् जहां कवि उस अनंत और अज्ञात प्रियतम को आलंबन बनाकर अत्‍यंत चित्रमयी भाषा में प्रेम की अनेक प्रकार से व्‍यंजना करता है। रहस्‍यवाद की अंतर्भूत रचनाएं पहुंचे हुए पुराने संतों या साधकों की उसी वाणी के अनुकरण पर होती हैं जो तुरीयावस्‍था या समाधिदशा में नाना रूपकों के रूप में उपलब्‍ध आध्‍यात्मिक ज्ञान का आभास देती हुई मानी जाती थी। इस रूपात्‍मक आभास को यूरोप में `छाया’ (पैंâटसमाटा) कहते थे। इसी से बंगाल में ब्रह्मसमाज के बीच उक्‍त वाणी के अनुकरण पर जो आध्‍यात्मिक गीत या भजन बनते थे वे `छायावाद’ कहलाने लगे। धीरे-धीरे यह शब्‍द धार्मिक क्षेत्र से वहां के साहित्‍यक्षेत्र में आया और फिर रवींद्र बाबू की धूम मचने पर हिंदी के साहित्‍य क्षेत्र से भी प्रकट हुआ।
`छायावाद’ शब्‍द का दूसरा प्रयोग काव्‍यशैली या पद्धतिविशेष के व्‍यापक अर्थ में है। सन् १८८५ में प्रâांस में रहस्‍यवादी कवियों का एक दल खड़ा हुआ, जो प्रतीकवाद (सिंबालिस्‍ट्स) कहलाया। वे अपनी रचनाओं में प्रस्‍तुतों के स्‍थान पर अधिकतर अप्रस्‍तुत प्रतीकों को लेकर चलते थे। इसी से उनकी शैली की ओर लक्ष्‍य करके `प्रतीकवाद’ शब्‍द का व्‍यवहार होने लगा। आध्‍यात्मिक या ईश्‍वरप्रेम संबंधी कविताओं के अतिरिक्‍त और सब प्रकार की कविताओं के लिए भी प्रतीक शैली की ओर वहां प्रवृत्ति रही। `हिंदी में `छायावाद’ शब्‍द का जो व्‍यापक अर्थ में- रहस्‍यावादी रचनाओं के अतिरिक्‍त और प्रकार की रचनाओं के संबंध में भी- ग्रहण हुआ वह इसी प्रतीक शैली के अर्थ में। छायावाद का सामान्‍यत: अर्थ हुआ प्रस्‍तुत के स्‍थान पर उसकी व्‍यंजना करने वाली छाया के रूप में अप्रस्‍तुत का कथन। इस शैली के भीतर किसी वस्‍तु या विषय का वर्णन किया जा सकता है।’
रामविलास शर्मा ने महादेवी की कविता पर गंभीरतापूर्वक विचार किया है। वे दूसरे आलोचकों की तरह `रहस्‍यवाद’ के शिकार नहीं हुए। उनकी दृष्टि में `महादेवी वर्मा अपने गीतों में देवी के रूप में नहीं, एक मानवी के रूप में दर्शन देती हैं। वे अपने भावव्‍यंजनों में इस धरती पर काम करनेवाली मनुष्‍य नामक प्राणी ही नहीं है वरन् उसका एक भेद नारी भी हैं। उनका नारीत्‍व सामाजिक सीमाओं के अंदर विकास के लिए पंख फड़फड़ाता है। उनकी यह व्‍याकुलता अनेक सांकेतिक रूपों में उनकी कविता में प्रकट होती है।’ नि:संदेह रामविलास शर्मा ने पहली बार महादेवी की कविता को स्‍त्री के सामाजिक यथार्थ से जोड़ने का प्रयास किया। वे स्‍पष्‍ट रूप से रेखांकित करते हैं कि निराला के अलावा और किसी कवि में इतनी जिजीविषा नहीं है।
महादेवी जी और उनकी कविता का परिचय केवल `नीर भरी दुख की बदली’ या `एकाकिनी बरसात’ कहकर नहीं दिया जा सकता। उन्‍हीं के शब्‍दों में उनका परिचय देना हो तो मैं यह पंक्ति उद्धृत करूंगा, `रात के उर में दिवस की चाह का शर हूं।’ निराला को छोड़कर किसी भी छायावादी कवि में जीवन की इतनी चाह नहीं है, जितनी महादेवी में। निराशावाद की अंधेरी रात में जीवन प्रभात की यह चाह महादेवी की रचनाओं में बार-बार दीप्‍त हो उठती है और जितना ही यह अंधेरा घना होता है, उतनी ही यह चाह और भी तीव्र हो जाती है। महादेवी ने अलंकृत शब्‍दावली और मनोहर रूपकों में जीवन और सौंदर्य की इस आकांक्षा को बार-बार व्‍यक्‍त किया है, `कंटकों को सेज जिसकी आंसुओं का ताज। सुभग! हंस उठ, उस प्रफुल्‍ल गुलाब ही सा आज। बीती रजनी प्‍यारे जाग।’ क्‍या जीवन से विमुख कोई भी व्‍यक्ति ऐसी सुंदर पंक्तियां लिख सकता है? क्‍या स्‍थूल के प्रति सूक्ष्‍म का विद्रोह कहने से उस ठोस जीवन आकांक्षा, मानवीय प्रेम, मानवीय सौंदर्य की आकांक्षा की व्‍याख्‍या हो जाती है – जो इन पंक्तियों में व्‍यक्‍त हुई है? डॉ. नामवर सिंह ने महादेवी की कविता में अभिव्यक्त सामाजिक असंतोष को रेखांकित करते हुए लिखा है कि –
`निजी आंसुओं के `नीहार’ में बंदिनी रहने वाली महादेवी ने `रश्मि’ के आलोक में जीवन की व्‍याप्ति का दर्शन किया और प्रखर ताप को झेलते हुए सांध्‍य क्षणों तक जाते-जाते समान व्‍यापी दुख की अनुभूति करने लगी। उनकी `नीर भरी दुख की बदली’ का दुख केवल प्रणय व्‍यथा ही नहीं है, उसमें अनेक प्रकार के सामाजिक असंतोष घुले-मिले हैं।’
प्रकृति के आलंबन के संदर्भ में प्रसाद से तुलना करते हुए डॉ. नामवर सिंह ने लिखा है कि कुछ कवियों ने `विश्‍व सुंदरी प्रकृति पर चेतना का आरोप’ करके उसे विश्‍वप्रिया शक्ति का रूप दे दिया और कुछ ने `प्रकृति की अनेकरूपता में, परिवर्तनशील विभिन्‍नता में तारतम्‍य खोजने’ के फलस्‍वरूप उसके `कारण पर मधुरतम व्‍यक्तित्‍व का आरोपण’ करके अपना प्रिय बना लिया। पहली प्रवृत्ति प्रसाद की है और दूसरी महादेवी की। (छायावाद, पृ. ४१) नामवर सिंह अगर ‘शृंखला की कड़ियां’ के आलोक में महादेवी की कविता पर विचार करते तो पाठक को व्यापक परिप्रेक्ष्य मिल पता। इस प्रकार देखा जा सकता है कि महादेवी वर्मा के साहित्‍य पर विचार करने वाले आलोचकों में कुछ अपवाद को छोड़कर अधिकांशत: उनकी कविता को पुरुषवादी नजरिए से देखने का प्रयास किया है। इन आलोचकों ने उनकी कविता को उनके गद्य से विलगाकर परखने का प्रयास किया, जिसके कारण या तो वे अपने अंतर्विरोधों का शिकार हुए या फिर फतवेबाजी पर उतर आए। डॉ. कृष्‍णदत्त पालीवाल ने ठीक ही लिखा है कि हिंदी-आलोचना का वैâसा दुर्भाग्‍य रहा है कि ज्‍यादातर मर्दवादी आलोचक महादेवी के काव्‍य-कर्म को पलायनवादी, वेदनावादी कहकर `मति अति रंक’ का परिचय बनते रहे। प्रश्‍न उठता है कि क्‍या यह सृजन लोक-विरोधी समाज-विरोधी है? इसमें `शिवेतरक्षतये’ की मंगल-ध्‍वनि नहीं है? गद्य में महादेवी की करुणा का विस्‍तार और पद्य में महादेवी का सुख-दुख भाव -क्‍या एक-दूसरे का विरोधी है? यदि विरोधी न होकर पूरक है तो महादेवी को अखंडता में देखिए। अखंडता में देखने पर आप महादेवी के रचना-कर्म की अंतर्वस्‍तु को पलायनवादी नहीं पाएंगे। (नवजागरण और महादेवी वर्मा का रचनाकर्म : स्‍त्री विमर्श के स्‍वर, पृ. ३३७)
(क्रमश:)

(लेखक श्री जेजेटी विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में प्रोफेसर व
सुप्रसिद्ध शिक्षाविद् और साहित्यकार हैं।)

 

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