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जेनेरिक का आया जमाना! सस्ती और असरदार `असली’ दवाएं

इस दुनिया में ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं, जिसे कभी कोई रोग नहीं हुआ हो। ये रोग मरीज और उसके परिवार को बर्बादी तक भी पहुंचा देते हैं। बहुत सारी ऐसी भी बीमारियां हैं, जिनकी चपेट में आने से इंसान की मौत हो जाती है। ऐसे में मरीज की जान तो जाती ही है, साथ में धन की भी बर्बादी होती है। कुल मिलाकर बीमारी जान-माल की क्षति है। इन सबके बीच सस्ते दाम पर बेची जा रही जेनेरिक दवाएं कीमतों और रोजमर्रा के इस्तेमाल के लिहाज से लोगों को राहत दे रही हैं। दरअसल, दवाओं की पेटेंट अवधि खत्म होने पर जेनेरिक दवा के रूप में उनका उत्पादन कोई भी कंपनी कर सकती है। उनके ब्रांडेड न होने से वे सस्ती मिलती हैं। यह योजना २००८ से चल रही है। पहले सरकार स्टोर चलाती थी, पर अब वह सिर्फ इसकी अनुमति देती है। बीते नौ सालों में १०० गुना से अधिक रफ्तार से बढ़ते हुए इसके ८० से बढ़कर अब करीब १०,००० केंद्र हो गए हैं।
उल्लेखनीय है कि लोगों के जेहन में यह बात बैठ चुकी है कि जेनेरिक दवाओं का ब्रांडेड दवाओं जितना असर नहीं होता है। पीएमबीजेपी (प्रधानमंत्री भारतीय जन औषधि परियोजना) के मुख्य कार्यकारी अधिकारी रवि दाधीच के मुताबिक, क्वालिटी के लिए डब्ल्यूएचओ-जीएमपी सर्टिफाइड कंपनियों से ही दवाएं खरीदी जाती हैं। साथ ही १३ एनएबीएल एक्रेडिटेड लैब में दवाओं के हर बैच की जांच कराई जाती हैं। इनकी टेस्ट रिपोर्ट आने के बाद ही बाजार में दवाएं भेजी जाती हैं। ये दवाएं एमआरपी पर ही बिकती हैं। उत्तर-पश्चिम के १०-१२ जिलों को छोड़ दें तो जन औषधि केंद्र देश के सभी ७६५ जिलों में मौजूद हैं। इन्हें उत्तर प्रदेश में १,३४९, कर्नाटक में १०८४, तमिलनाडु में ९१०, महाराष्ट्र में ६५० और मोदी के गुजरात में मात्र ५२६ जन औषधि केंद्र खोले गए हैं। फिलहाल इस सफलता के बाद अब विदेशों में भी जन औषधि केंद्र खोलने की तैयारी है।
ऐसे खुलते हैं केंद्र
बी. फार्मा, डी. फार्मा की डिग्री धारक इसके लिए आवेदन कर सकते हैं। मंजूरी मिलने के बाद राज्य सरकार लाइसेंस जारी करती है। पीएमबीजेपी से केंद्र खोलने के लिए पांच लाख रुपए की आर्थिक सहायता मिलती है। एससी- एसटी, दिव्यांग और महिलाओं को पांच लाख के अलावा दो लाख रुपए की सहायता और दी जाती है। दवाओं की बिक्री में दुकानदार का मार्जिन २० प्रतिशत होता है।
दवाओं के मूल्य में अंतर
बुखार की रोकथाम के लिए इस्तेमाल की जाने वाली ‘डोलो ६५०’ की ब्रांडेड गोलियां जहां ३३ रुपए में बिकती हैं, वहीं ये जेनेरिक दुकानों पर केवल १५ रुपए में ही उपलब्ध हैं। इसी तरह ब्रांडेड इंसुलिन ग्लोरिया इंजेक्शन १०० आईयू प्रति एमएल, जहां ७२२ रुपए में बिक रही हैं, वहीं यह जेनेरिक दुकानों पर महज ३४० रुपए में ही मिल जाता है। एमलोदीपाइन५ की १० गोली जेनेरिक दुकानों पर सिर्फ ५.३० रुपए में बिकती हैं। यही दवा ब्रांडेड कंपनी का खरीदने पर २८ रुपए में बेची जा रही है।
कंपनियों में मिलीं कई खामियां
देश में दवा बनाने वाली कंपनियों की गहन जांच के बाद तमाम खामियां पाई गई हैं। इनमें कच्चे माल के परीक्षण का अभाव सहित कई गड़बड़ी शामिल हैं। स्वास्थ्य मंत्रालय की तरफ से दी गई जानकारी के अनुसार, अधिकारियों ने हाल के महीनों में दवा निर्माताओं की जांच शुरू की थी, जब कुछ कफ सिरप को विदेश में ९५ बच्चों की मृत्यु से जोड़ा गया था।

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