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झमाझम बरसेंगी `नकली’ वर्षारानी!

धीरेंद्र उपाध्याय मुंबई
महाराष्ट्र पर यदि मेघराज इसी तरह कुपित रहते हैं तो आनेवाले दिनों में कृत्रिम बारिश कराने के प्रयास किए जाएंगे। इस तरह के संकेत जलापूर्ति मंत्री ने सोमवार को जलगांव जिले में हुई समीक्षा बैठक के दौरान दिए हैं। मानसून का मौसम होने के बावजूद एक महीने से प्रदेश में केवल रिमझिम बारिश ही हो रही है। पर्याप्त बारिश न होने से कई जिलों में खेतों में खड़ी फसलें सूखने के कगार पर पहुंचने लगी हैं। किसानों का कहना है कि सूखी जमीन में दो बार बुआई करने के बाद भी कुछ नहीं उगा। इसी बीच `ईडी’ सरकार के मंत्री की तरफ से कहा गया कि कृत्रिम बारिश के लिए अनुकूल वातावरण तैयार होने के बाद वैज्ञानिकों से चर्चा की जाएगी और अंतिम फैसला किया जा सकता है। प्रदेश के जलगांव समेत कई जिलों में बारिश नहीं होने से कुछ गांवों में पानी की कमी जैसी स्थिति पैदा हो गई है। इससे पहले साल २०१९ में महाराष्ट्र सरकार ने सूखे की स्थिति से निपटने के लिए कृत्रिम बारिश का प्रयोग करने की कोशिश की थी। तब इसके लिए ३० करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया था। वहीं कृत्रिम बारिश के लिए अनुकूल बादलों का अध्ययन करने के लिए सरकार ने पहले ही सोलापुर में एक केंद्र स्थापित किया था।
कैसे होती है कृत्रिम बारिश?
कृत्रिम बारिश एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है, जिस क्षेत्र में कृत्रिम वर्षा कराई जानी है, वहां आकाश में वाष्पयुक्त बादल होने चाहिए। रडार सिस्टम के जरिए बारिश के लिए उपयुक्त बादलों का पता लगाया जाता है। कृत्रिम वर्षा के लिए क्षेत्र में आर्द्रता ७० प्रतिशत होनी चाहिए। सही बादलों का चयन करके उनमें कुछ विशेष प्रकार के कणों का बीजारोपण किया जाता है। यह कण वर्षा की बूंद के केंद्र के रूप में कार्य करता है। इस केंद्र पर वाष्प एकत्रित होती है। जैसे-जैसे इसका आकार बढ़ता है, यह बारिश की बूंदों के रूप में जमीन पर गिरता है। गर्म और ठंडे बादलों के लिए कृत्रिम वर्षा की अलग-अलग विधियां हैं। एक गर्म बादल में १४ माइक्रोन की अर्धव्यास वाली बूंदें नहीं होती हैं। बादल में वाष्प को अवशोषित करने के बाद बूंदों का आकार १४ माइक्रोन से अधिक हो जाता है और बारिश होने लगती है। वही ठंडे बादलों में बर्फ के निर्माण के लिए आवश्यक केंद्र बिंदु का अभाव होता है, बादलों पर सिल्वर आयोडाइड का छिड़काव किया जाता है। बर्फ के क्रिस्टल तेजी से बनने और आकार में बढ़ने के बाद वे गिरने लगते हैं।

`पहले के प्रयोग विफल’
मौसम विशेषज्ञों के मुताबिक, इससे पहले कृत्रिम बारिश के प्रयोग २००३ में कर्नाटक में, २००३ और २००४ में महाराष्ट्र में और २००७ में आंध्र प्रदेश में एक अमेरिकी कंपनी द्वारा किए गए थे। २००९ से २०११ तक आईआईटीएम, पुणे द्वारा कायपिक्स नामक एक प्रयोग शुरू किया गया था। साल २०१० और २०११ में तीन राज्यों के सूखाग्रस्त क्षेत्रों में प्रयोग किए गए लेकिन ये सभी प्रयोग असफल रहे। इसके अलावा दुनिया भर में कृत्रिम बारिश के असफल प्रयोगों का भी इतिहास है। बादलों पर रसायन छिड़कने के बाद भी अगर बादल चले जाते हैं, तो इसका कोई फायदा नहीं होता। केवल चीन ने ही कृत्रिम बारिश का सफल प्रयोग किया है। लेकिन उसने इस प्रयोग के फॉर्मूले को दुनिया से साझा करने की बजाय छिपाकर रखा है।

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