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फार्मेसी कॉलेजों का हश्र इंजीनियरिंग जैसा! १४,००० से अधिक सीटें रिक्त, वेतन और शिक्षा गुणवत्ता पर भी पड़ सकता है प्रभाव, राज्य सरकार से मंजूरी न देने की हो रही मांग

सामना संवाददाता / मुंबई
महाराष्ट्र के फार्मेसी कॉलेजों में १४,००० से अधिक सीटें रिक्त हैं। ऐसे में अगले शैक्षिक वर्ष के लिए किसी भी फार्मा संस्थान को अनुमति न दिए जाने की मांग राज्य सरकार से मांग की गई है। एसोसिएशन ऑफ फॉर्मास्युटिकल टीचर्स ऑफ इंडिया की तरफ से कहा गया है कि यदि सरकार उनकी मांगों को अनदेखी करती है, तो वह दिन दूर नहीं है जब फार्मा पाठ्यक्रम का हश्र इंजीनियरिंग जैसा हो जाएगा। इसके साथ ही इसका प्रतिकूल प्रभाव वेतन के साथ ही शिक्षा पर भी पड़ेगा।
उल्लेखनीय है कि राज्य भर में बैचलर ऑफ फार्मेसी (बी. फार्मा) के ५७ नए कॉलेजों को अनुमति मिली थी। ऐसे में इन कॉलेजों के माध्यम से प्रदेश भर में बी.फार्मा की ११,००० सीटें बढ़ गईं। इसी तरह इसी तरह फार्मेसी में डिप्लोमा (डी.फार्मा) प्रदान करनेवाले संस्थानों की संख्या भी १३६ पर पहुंच गई। इस कारण साल २०२४-२४ में बी.फार्मा में करीब एक-तिहाई और डी.फार्मा में एडमिशन लेने के लिए अभ्यर्थियों ने अनिच्छा दिखाई थी। ऐसे में इन संस्थानों में डी.फार्मा में करीब ७,००० सीटों समेत करीब १४,००० सीटों पर रिक्तियां हो गईं। दूसरी तरफ शिक्षकों और उद्योगपतियों को चिंता है कि बड़े पैमाने पर रिक्तियों से फार्मा कॉलेजों का हश्र इंजीनियरिंग संस्थानों जैसा हो सकता है, जो शुरुआत में जोरदार था, जिसका बाद में क्रेज कम होता चला जा रहा है।
फार्मा संस्थानों की बाढ़
एपीटीआई ने अपने पत्र में कहा कि फार्मेसी की मांग में कमी के बावजूद नए संस्थानों को अनुमति दी गई। इसमें यह भी आरोप लगाया गया कि राज्य विश्वविद्यालयों ने नए कॉलेजों का निरीक्षण किए बिना उन्हें अस्थाई संबद्धता दे दी, जिससे फार्मा शिक्षा के शीर्ष नियामक फार्मेसी काउंसिल ऑफ इंडिया द्वारा अंतिम अनुमोदन का मार्ग प्रशस्त हो गया। इसके साथ ही नए डिग्री संस्थानों को अपने पहले वर्ष में बी.फार्मा के लिए ६० से बढ़ाकर १०० सीटें देने की अनुमति दी गई। कई मौजूदा कॉलेजों को स्नातकोत्तर कार्यक्रम जोड़ने की अनुमति दी गई। इससे महाराष्ट्र में फार्मा संस्थानों की बाढ़ आ गई।
बेरोजगारी बढ़ने का डर
एसोसिएशन ने बताया है कि राज्य सरकार नए संस्थानों और मौजूदा कॉलेजों में अतिरिक्त सीटों अथवा पाठ्यक्रमों की मंजूरी से इनकार करके अधिक रिक्तियों को रोक सकता है। इससे फार्मा शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार होने का मार्ग भी प्रशस्त हो सकता है। इसमें कहा गया है कि अगर प्रसिद्ध कॉलेजों में सीटें खाली हो गई, तो इससे बेरोजगारी बढ़ेगी और छात्रों को नुकसान होगा।
लगातार बढ़ रहे कॉलेज
राज्य कॉमन एंट्रेंस टेस्ट सेल और तकनीकी शिक्षा निदेशालय के आंकड़ों से पता चलता है कि राज्य में २०२२-२३ और २०२३-२४ में बी.फार्मा में नामांकन लगभग २८,००० तक पहुंच गया। हालांकि इस अवधि में फार्मा कॉलेजों की संख्या १६८ से बढ़कर ४५३ हो गई, जिससे प्रवेश क्षमता ११,५८८ से बढ़कर ४२,७९४ हो गई, जो छात्रों की संख्या से कहीं अधिक है। इस शैक्षिक वर्ष में अकेले फार्मेसी काउंसिल ऑफ इंडिया द्वारा ५० से अधिक नए संस्थानों को मंजूरी दी है।

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