मुख्यपृष्ठग्लैमर‘अवॉर्ड की पहली सूचना सपने जैसी थी!’-वहीदा रहमान

‘अवॉर्ड की पहली सूचना सपने जैसी थी!’-वहीदा रहमान

गुजरे जमाने की बेहतरीन एक्ट्रेस वहीदा रहमान की ऊर्जा आज भी ऐसी है कि नई हीरोइनों को भी वो मात दे दें। वहीदा रहमान ने सिनेमा के हर बदलते दौर को बड़े करीब से देखा है। सिनेमा को दिए उनके बेजोड़ योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें ‘दादा साहेब फाल्के’ पुरस्कार से सम्मानित किया, जिसकी वो असल हकदार हैं। पेश है, वहीदा रहमान से डॉ. रमेश ठाकुर की हुई बातचीत के प्रमुख अंश-

 आपके नजरिए से इस सम्मान की अहमियत क्या है?
अगर मैं अपने नजरिए से कहूं तो इस सम्मान के लिए अहमियत शब्द भी बहुत छोटा पड़ेगा। देखिए, प्रत्येक आर्टिस्ट का सपना होता है कि उसे फिल्मों का सबसे बड़ा सम्मान ‘दादा साहेब फाल्के’ पुरस्कार मिले। मुझे मिला है, इसलिए मैं खुद को भाग्यशाली मानती हूं, पर इतना जरूर कहूंगी कि इंडस्ट्री में मुझसे भी कहीं बेहतर और उम्दा कलाकार मौजूद हैं, वो भी ‘दादा साहेब फाल्के’ पुरस्कार के काबिल हैं। खैर, सम्मान किसे मिलेगा और किसे नहीं? ये सरकार की ज्यूरी तय करती है। इसलिए इस विषय पर टीका-टिप्पणी मैं नहीं करूंगी।

उस क्षण के बारे में बताएं जब पहली मर्तबा आपको अवॉर्ड मिलने की सूचना मिली?
सच कहूं तो मुझे कतई अंदाजा नहीं था कि सरकार मुझे इस सम्मान के लायक समझेगी। शाम के करीब ६ बजे होंगे कि मेरे एक जानने वाले का मुझे फोन आया और उन्होंने कहा, ‘बधाई हो।’ मैंने कहा, किस बात की, तो वे बोले ब्रॉडकास्टिंग मिनिस्टर ने अपने ‘एक्स’ पर आपको ‘दादा साहेब फाल्के’ पुरस्कार देने की घोषणा की है। तब मैंने सोचा कोई अफवाह होगी, लेकिन उसके बाद सभी न्यूज चैनलों पर खबरें चलने लगीं। लोगों के फोन आने शुरू हो गए। सच बताऊं तो मुझे एकाध घंटे तक कुछ पता ही नहीं चला, मुझे ऐसा लगा कि मैं सपना देख रही हूं।

अवॉर्ड मिलने पर आपने देव आनंद साहब को याद किया?
बिल्कुल, सबसे पहले मेरे जेहन में उनका ही खयाल आया। मैंने उस दिन भी मीडिया में कहा था कि अवॉर्ड की घोषणा होना मेरे लिए एक नहीं, बल्कि दोहरी खुशी जैसा है। क्योंकि उस दिन देव साहब का जन्मदिन था। शायद ईश्वर ने मुझे उनके जन्मदिन के दिन ये तोहफा देना मुकर्रर किया था। कुछ पल के लिए मुझे लगा कि ये सम्मान उनको ही दिया जा रहा है। देव साहब के योगदान को सिने संसार कभी नहीं भूलेगा। ६०-७० के दशक तक हमारा देश सादगी में जीता था। विदेशों में भारतीय स्टाइल को उन्होंने ही पहुंचाया था।

 आज के बदलते सिनेमा को आप कैसे देखती हैं?
आज सब कुछ बदल चुका है। दोनों के मध्य एक-दूसरे की तुलना कतई नहीं की जा सकती। दोनों का रंग-रूप और स्वरूप भिन्न है। सिनेमा का पुराना जमाना वैâसा था, इस बात से अंदाजा लगा सकते हैं कि पुरानी फिल्मों का जब रीमेक बनता है तो उसे दर्शक बड़े चाव से देखते हैं। गांव की संस्कृति, पुराना पहनावा, पुरानी भारतीयता अब की फिल्मों में कहीं नहीं दिखती। अब जो फिल्में बनती हैं उनमें जब तक विदेशी लोकेशन न हो, दर्शकों को मजा नहीं आता। इसलिए इस बदलाव में सिनेमा से ज्यादा आधुनिक समाज ने अपनी भूमिका निभाई है।

 लेकिन फिल्मों में जबरदस्ती की नग्नता और फूहड़ता को तो दर्शक भी पसंद नहीं करते?
इस बात की पक्षधर मैं भी नहीं हूं। इससे हमारी संस्कृति धूमिल होती है। ये पश्चिमी सभ्यता है, जिसे हम कॉपी करते जा रहे हैं। सच बताऊं तो नहीं करना चाहिए, हमारे पास भी बताने और दर्शाने के लिए बहुत कुछ है। इन गंदे दृश्यों की वजह से ही दर्शकों का एक वर्ग आज सिनेमा से कट गया है। फिल्में साफ-सुथरी हों और पारिवारिक हों, जिसे सभी मिल-बैठकर देखें। ‘नदिया के पार’, ‘नगीना’ व ‘राम लखन’ जैसी फिल्मों की अब कोई कल्पना भी नहीं कर सकता।

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