मुख्यपृष्ठस्तंभबढ़ती बेरोजगारी से दांव पर लगा देश का भविष्य!

बढ़ती बेरोजगारी से दांव पर लगा देश का भविष्य!

योगेश कुमार सोनी
बीते बृहस्पतिवार सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी ने एक आंकड़ा जारी किया है, जिसमें २०१६-१७ और मार्च २०२३ के बीच मैन्यफैक्चरिंग सेक्टर की नौकरियों में ३१ फीसदी की गिरावट आई है। जनवरी-मार्च २०२३ के नवीनतम आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण से पता चलता है कि शहरी क्षेत्रों में भी ५० फीसदी से कम श्रमिकों के पास काम है। इस आंकड़े ने सबको चौंका दिया। देश में लाखों-करोड़ों युवा पढ़े-लिखे बेरोजगार बैठे हैं।
अभिभावक अच्छी खासी पूंजी लगाकर, अपनी इच्छाओं व मन को मारकर बच्चों को बेहतर कोर्स करवाते हैं, लेकिन नौकरी नहीं मिल पा रही। नौकरी बहुत सीमित होकर रह गई, जैसा कि आंकड़े में बताया गया है कि मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में ३१ फीसदी गिरावट आ गई, जिसका अर्थ समझेंगे तो अनर्थ सा लगता है। चूंकि इस आंकड़े के आधार पर स्पष्ट है कि जिनकी नौकरियां लगी हुई हैं, उनकी ही सुरक्षित नहीं हैं तो नए उम्मीदवार को मौका कैसे मिलेगा? साथ ही जिस कर्मचारी की सैलरी दस साल पहले जितनी थी, बढ़ने की बजाय उससे भी कम है और महंगाई का पैमाना बताने की जरूरत नहीं लगती। सरकार की विफल नीति से एक तीर से दो नहीं, बल्कि चार शिकार हो रहे हैं। बेरोजगार होना या नौकरी न मिलने से आजकल के युवाओं में जिस तरह निराशा बढ़ रही है, उससे वह अपराध की ओर भी अग्रसर हो रहे हैं।
बीते दशकभर में देशभर में जितने भी अपराध हुए हैं, उसमें सभ्य व बेहद शिक्षित परिवार के बच्चे पकड़े गए हैं। कुछ मामलों में अपराधियों से पूछताछ हुई तो उसमें युवाओं ने बताया कि उच्च शिक्षा प्राप्त की और कॉलेज व यूनिवर्सिटी को भी टॉप करके नौकरी नहीं मिल रही और जीवन यापन के लिए कहीं कोई विकल्प समझ नहीं आ रहा था तो वह शॉर्टकट वाले काम में लग गए। देश की लगभग अस्सी प्रतिशत जनसंख्या मध्यम व गरीब है और उनकी लड़ाई मात्र रोटी खाने व जीवन निर्वाह करने की है। जिसके पास रोजगार है वह अपने बच्चों को रोजगार नहीं करवाना चाहता। चूंकि आज रोजगार की स्थिति क्या है यह सबको भलिभांति पता है इसलिए यह वर्ग बच्चों को अपनी क्षमता से अधिक पैसा लगाकर उनको शिक्षा दिलवाकर नौकरी की ओर प्रेरित कर रहे हैं, जिसमें बच्चे भी रुचि ले रहे हैं, लेकिन बात न बनने से निराशा की स्थिति लगातार बनी हुई है। जो बच्चा लाखों रुपए लगा व मेहनत करके कोई मुकाम हासिल नहीं करेगा तो वह निश्चित तौर पर डिप्रेशन का शिकार हो जाएगा।
उदाहरण के तौर पर जो बच्चा ५० हजार रुपए सैलरी की कल्पना करे और उसको दस हजार की भी नौकरी न मिले तो वह फिर शॉर्टकट में उतर जाता है। उसको ऐसा लगता है कि चोरी, छीना-छपटी करके वह बहुत ज्यादा व जल्दी पैसा कमा लेगा लेकिन गलत काम कितने दिन चलता है, यह उसको बाद में पता चलता है। बहरहाल, शहरी क्षेत्रों में भी ५० फीसदी से कम श्रमिक के पास काम है और इसके अलावा भी कई आंकड़े देश के भविष्य के लिए बेहद चिंता का विषय बने हुए हैं। यदि केंद्र सरकार इस ओर गंभीर नहीं हुई तो हालात और भी बिगड़ते जाएंगे।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक मामलों के जानकार हैं।)

अन्य समाचार