मुख्यपृष्ठस्तंभचुनावी चंदे में गुमनामी का खेल असंवैधानिक!

चुनावी चंदे में गुमनामी का खेल असंवैधानिक!

प्रमोद भार्गव

लोकसभा चुनाव के ठीक पहले सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी समेत सभी राजनीतिक दलों को बड़ा झटका दिया है। डीवाई चंद्रचूड की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने ऐतिहासिक पैâसले में दलों को गुमनामी चुनावी चंदा उपलब्ध कराने वाली केंद्र सरकार की निर्वाचन बॉन्ड योजना को असंवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया है। पीठ ने बॉन्ड की बिक्री पर तत्काल प्रभाव से रोक लगाते हुए इसे क्रय करने वालों, बॉन्ड का मूल्य और इसे पाने वालों के नाम सार्वजनिक करने का आदेश दिया है। अदालत ने २०१८ में वित्त विधेयक-२०१७ के जरिए लाई गई इस योजना को संविधान के अनुच्छेद १९ (१ ए) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सूचना के मौलिक अधिकार के संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन माना है। पीठ ने केंद्र सरकार की इस दलील को भी नहीं माना कि यह योजना राजनीतिक चंदे में पारदर्शिता और कालेधन पर अंकुश लगाने के लिए अस्तित्व में लाई गई थी। इस पैâसले को लोकतंत्र में विश्वास बहाली की दृष्टि से देखा जा रहा है।
कई याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान महान्यायवादी आर वेंकटरमणी ने शीर्ष न्यायालय को लिखित दलील देते हुए कहा था कि देश की जनता को राजनीतिक दलों को चंदा कौन देता है, यह जानने का अधिकार नहीं है। चुनावी बॉन्ड चंदा देने का एक स्वच्छ जरिया है, इसलिए इनके नाम सार्वजनिक नहीं किए जा सकते हैं। महान्यायवादी ने संविधान के अनुच्छेद १९ (१-ए) के तहत नागरिकों को चुनावी धन का स्रोत जानने का अधिकार नहीं होने की दलील भी दी थी। इस कानून के समर्थन में सभी दल रहे हैं, क्योंकि सभी को भरपूर गुमनामी चंदा उद्योगपतियों और औद्योगिक घरानों से मिलता रहा है। इसी कारण चुनाव आयोग से मान्यता प्राप्त सभी दल खूब फलते-फूलते रहे हैं। साफ है, सभी दल बहती गंगा में हाथ धोने में लगे थे। निर्वाचन बॉन्ड ने तो दलों और उम्मीदवारों को यह सुविधा भी दे दी थी कि उन्हें जो चंदा बॉन्ड के जरिए मिलेगा, उसकी जानकारी निर्वाचन आयोग को भी देने की जरूरत नहीं है। दरअसल, इस चंदे के बदले में दल औद्योगिक घरानों के हित साधने का काम करते हैं, यहां तक कि कई नीतियां भी उन्हीं के हितों को साधने के लिए बना दी जाती हैं। दलों को धन की जरूरत चुनाव लड़ने के साथ-साथ संगठन चलाने के लिए भी रहती है। अतएव चंदे में पारदर्शिता को वित्त विधेयक में दूर रखने के पुख्ता उपाय मौजूद थे। अदालत की पीठ ने इन्हीं उपायों की असंवैधानिकता पर कुठाराघात किया है।
२०१८ में चुनावी बॉन्ड के जरिए चंदा लेने का कानून बनाए जाने के वक्त दावा किया गया था कि कालेधन पर रोक और भ्रष्टाचार पर लगाम की दृष्टि से राजनीतिक पार्टियां अब केवल निर्वाचन बॉन्ड के जरिए ही चंदा ले सकेंगी। ये बॉन्ड एक हजार, १० हजार, १ लाख, १० लाख और १ करोड़ के गुणक में उपलब्ध कराए गए थे। इन्हें केवल भारतीय स्टेट बैंक की चुनिंदा शाखाओं से ही खरीदा जा सकता था। तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली ने दावा किया था कि इस व्यवस्था के शुरू होने से देश में राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे की प्रक्रिया में पारदर्शिता आ जाएगी। भारत का कोई भी नागरिक या संस्था ये बॉन्ड खरीदकर दलों को चंदा देने के लिए स्वतंत्र है। बॉन्ड पर दानदाता का नाम नहीं लिखा जाएगा। ये बॉन्ड खरीदे जाने के १५ दिन के भीतर किसी भी दल को दान के रूप में दिए जा सकेंगे। इस दान को लेने का हक केवल उन दलों को होगा, जिन्हें निर्वाचन आयोग की मान्यता के साथ एक प्रतिशत से ज्यादा वोट मिले हों। इस प्रक्रिया पर असहमति जताते हुए भारत निर्वाचन आयोग ने कहा था कि आम लोगों को यह कैसे पता चल पाएगा कि किस दल या उम्मीदवार को कितना चंदा किस व्यक्ति या व्यापारी से मिला है? आयोग ने सरकार द्वारा जनप्रतिनिधित्व कानून में किए गए उस बदलाव पर भी आपत्ति दर्ज कराई थी, जिसमें राजनीतिक दल को बॉन्ड के जरिए ली गई धनराशि को ऑडिट रिपोर्ट में दर्शाने की बाध्यता खत्म कर दी गई थी। ये प्रावधान ‘वित्त विधेयक-२०१७’ के जरिए किए गए थे। विडंबना रही कि किसी भी विपक्षी दल ने आयोग की आपत्तियों पर गौर नहीं किया। साफ है, सभी दल चंदे की गोपनीयता बनाए रखने में एकमत थे।
वित्त विधेयक-२०१७ में प्रावधान है कि कोई व्यक्ति या कंपनी चेक या ई-पेमेंट के जरिए चुनावी बॉन्ड खरीद सकता है। ये बियरर चेक की तरह बियरर बॉन्ड होंगे। मसलन, इन्हें दल या व्यक्ति चेकों की तरह बैंकों से भुना सकते हैं। चूंकि बॉन्ड केवल ई-ट्रांसफर या चेक से खरीदे जा सकते हैं, इसलिए खरीदने वाले का पता होगा, लेकिन पाने वाले का नाम गोपनीय रहेगा। अर्थशास्त्रियों ने इसे कालेधन को बढ़ावा देने वाला उपाय बताया था, क्योंकि इस प्रावधान में ऐसा लोच था कि कंपनियां इस बॉन्ड को राजनीतिक दलों को देकर फिर से किसी अन्य रूप में वापस ले सकती थी। कंपनी या व्यक्ति बॉन्ड खरीदने पर किए गए खर्च को बही खाते में तो दर्ज करेंगे, लेकिन यह बताने को मजबूर नहीं रहेंगे कि उसने ये बॉन्ड किसे दिए हैं। यही नहीं, सरकार ने व्ाâंपनियों पर चंदा देने की सीमा भी समाप्त कर दी थी। बॉन्ड के जरिए २० हजार रुपए से ज्यादा चंदा देने वाली कंपनी या व्यक्ति का नाम भी बताना जरूरी नहीं था।
हालांकि, केंद्र सरकार ने यह पहल निर्वाचन आयोग की सिफारिश पर की थी। आयोग ने इसके लिए जनप्रतिनिधित्व अधिनियम १९५१ में संशोधन का सुझाव दिया था। फिलहाल, दलों को मिलने वाला चंदा आयकर अधिनियम १९६१ की धारा १३ (ए) के अंतर्गत आता है। इसके तहत दलों को २०,००० रुपए से कम के नकद चंदे का स्रोत बताने की जरूरत नहीं है। इसी झोल का लाभ उठाकर दल बड़ी धनराशि को २०,००० रुपए से कम की राशियों में सच्चे-झूठे नामों से बही खातों में दर्ज कर कानून को ठेंगा दिखाते रहे थे। इस कानून में संशोधन के बाद जरूरत तो यह थी कि दान में मिलने वाली २,००० तक की राशि के दानदाता की पहचान को आधार से जोड़ा जाता, जिससे दानदाता के नाम का खुलासा होता? किंतु ऐसा न करते हुए सरकार ने निर्वाचन बॉन्ड के जरिए उपरोक्त प्रावधानों पर पानी फेर दिया था।
शायद इसीलिए सीजेआई ने फैसले में चुनाव आयोग की खिंचाई करते हुए कहा है कि आप देशभर में निर्वाचन प्रक्रिया संपन्न कराने वाली एकमात्र एजेंसी हैं। किंतु आपको ही पता नहीं होगा कि किस दल को कहां से चंदा मिल रहा है, तब पारदर्शिता कैसे है? अतएव कानून राजनीतिक समर्थन दिखाते हुए चंदे की अनुमति देता है तो लोगों के अधिकारों की रक्षा करना संविधान का कर्तव्य है। संविधान किसी जानकारी के सार्वजनिक होने पर दुरुपयोग की दलील पर आंख मूंदकर भरोसा नहीं कर सकता। अदालत ने उन तीनों कानूनों को भी खत्म कर दिया, जो गुमनामी चंदे की गोपनीयता के मजबूत सुरक्षा कवच थे। इस हेतु आरबीआई, आयकर और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम में संशोधन किया गया था। याचिका में आरोप था कि इस तरह से कानूनों में बदलाव करके दलों को बेहिसाब धन राशि एकत्रित करने का सरकार द्वारा सुनहरा अवसर दे दिया गया था।
एक मोटे अनुमान के अनुसार, देश के लोकसभा और विधानसभा चुनावों पर ५० हजार करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च होते हैं। इस खर्च में बड़ी धनराशि कालाधन और आवारा पूंजी होती है। आर्थिक उदारवाद के बाद यह बीमारी सभी दलों में पनपी है। न्यायालय में प्रस्तुत किए गए निर्वाचन आयोग और एडीआर के आंकड़ों के मुताबिक, २०१७-१८ में योजना शुरू होने से जनवरी २०२४ तक १६,५१८.११ करोड़ रुपए के अधिक के निर्वाचन बॉन्ड बिके हैं। यह राशि सभी दलों को उनकी पहुंच और हैसियत के मुताबिक व्यापारियों ने दी है। साफ है, जब बड़े व्यापारिक घरानों से दलों को मोटी धनराशि मिलने लगी, तब से दलों में जनभागीदारी निरंतर घटती चली जा रही है। मसलन, कॉरपोरेट फंडिंग ने ग्रास रूट फंडिंग का काम खत्म कर दिया है। इस वजह से दलों में जहां आंतरिक लोकतंत्र समाप्त हुआ, वहीं आम आदमी से दूरियां भी बढ़ती चली गईं। दल आम कार्यकर्ताओं की बजाय धनबलियों को उम्मीदवार बनाने लग गए। नतीजतन, लोकसभा और विधानसभाओं में पूंजीपति जनप्रतिनिधियों की संख्या लगातार बढ़ रही है। वर्तमान लोकसभा और राज्यसभा के सांसदों की घोषित संपत्ति १० हजार करोड़ रुपए (एक खरब) से भी अधिक है। अतएव अदालत ने निर्वाचन बॉन्ड को खत्म करके राजनीतिक दलों को आमजन तक फिर से पहुंचने के लिए सबक सिखाने का काम किया है।

अन्य समाचार