प्यार की महिमा

प्यार से बढ़कर कुछ नहीं है
प्यार है तो आप और हम हैं
प्यार बिना धरा उजाड़ी सूनी
ज्यों महिर धमकता हो बिन आभा के
जैसे नाव सरक रही हो बिन खेवैया के
प्यार है तो जीवन का अर्थ है
बिन प्यार के सब व्यर्थ है
प्यार से हर कर्तव्य सफल है‌
प्यार से हर संबंध अटल है
प्यार बिन क्या दिन और क्या रात
क्या सावन और क्या बरसात
प्यार बिना दिन में घोर अंधेरा
प्यार बिना प्रभात घुप मायूस सवेरा
प्यार बिना दिल कपटी छलिया है
प्यार ने सबका मन हर लिया है
प्यार ही इक प्यारा मजमून है
प्यार में संतुष्टि है अथाह सुकून है
इस ढाई आखर में है इतनी शक्ति
जितनी करे कोई ईश्वर की भक्ति
प्यार की महिमा जिसने है जानी
उसका विकसित जीवन, प्रफुल्लित जवानी।
अतः घृणा, त्याग, प्यार से पेश आओ
प्यार बरसाओ और खूब प्यार पाओ।
प्यार ही सारी इंद्रियों का चारा है
प्यार बिना नहीं छुटकारा है
प्यार में नहीं स्वार्थ केवल समर्पण हो
हर हृदय को प्यार हृदय से अर्पण हो।

– त्रिलोचन सिंह अरोरा,
डोंबिवली

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