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सरकार का दिमाग ठिकाने पर है!

देशद्रोह की धारा का सर्वाधिक दुरुपयोग बीते सात वर्षों में हुआ है। राजनीतिक विरोधियों पर ‘नकेल’ कसने के लिए पीएमएलए, देशद्रोह और यूपीए आदि कानूनों का दुरुपयोग हुआ। पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र की सरकारों द्वारा इन कानूनों का विधायी मार्ग से इस्तेमाल शुरू करते ही सरकार का दिमाग ठिकाने पर आ गया!

संजय राऊत – कार्यकारी संपादक।  बीते कुछ वर्षों में जिन दो कानूनों का व्यापक दुरुपयोग किया गया, ऐसे देशद्रोह के कानून पर अंतत: सर्वोच्च न्यायालय ने ही रोक लगा दी है। देश में मनी लॉन्ड्रिंग कानूनों, यूएपीए कानूनों और देशद्रोह कानूनों का इस्तेमाल करके राजनीतिक विरोधियों को खत्म करने के लिए कोहराम मचाया गया। सरकार ने सभी नैतिकताओं को ताक पर रखकर इन कानूनों का इस्तेमाल किया। अब देशद्रोह कानून को निलंबित कर दिया गया है। महत्वपूर्ण ये है कि सुप्रीम कोर्ट ने इसे स्थगित कर दिया था।
फिलहाल हमारे देश के सामने सबसे बड़ा संकट नैतिक है। किसी को किसी बात की शर्म नहीं आती है, ऐसा हो गया है। अब तक राजनेताओं को शर्म नहीं आती है, ऐसा अन्य लोग पूरे विश्वास के साथ मानते थे। अब न्यायाधीश से लेकर पत्रकार और संपादक तक हर कोई उस लाइन में खड़ा है। महाराष्ट्र में तो एक-दूसरे का सीधा-सीधा वस्त्रहरण किया जा रहा है। राजनीति में जो भाजपा के साथ नहीं हैं वे देशद्रोही हैं और जो साथ हैं सिर्फ वही देशभक्त हैं, यह चलन शुरू हो गया है, यह देश के लिए खतरनाक है। हैरानी की बात यह है कि जो अपने नहीं हैं उनके खिलाफ देशद्रोह का मामला दर्ज करके  कैद  में सड़ाना, ऐसी नीति है। परंतु देशद्रोह कानून में बदलाव भी नहीं करेंगे और उसे निरस्त भी नहीं करेंगे। ऐसी दृढ़ भूमिका अपनानेवाली सरकार ने अचानक देशद्रोह कानून पर पुनर्विचार करने की तैयारी दर्शाई है, जो कि अजीब ही है। यह जो हृदय परिवर्तन अचानक हुआ है उसका श्रेय किसे दिया जाए, इस पर प्रतियोगिता कराने में कोई हर्ज नहीं होना चाहिए। क्योंकि २०१९ के घोषणापत्र में जब कांग्रेस ने इस कानून को निरस्त न करने का वादा किया था, तब भाजपा के प्रवक्ताओं ने ही कांग्रेस को देशद्रोही बताकर उसकी आलोचना की थी। प्रधानमंत्री मोदी ने खुद कहा था कि जो कानून ब्रिटिश शासन के दौरान अप्रचलित थे, उन्हें निरस्त किया जाना चाहिए। उसके लिए उनका अभिनंदन! अब, प्रधानमंत्री मोदी कह रहे हैं कि ‘देश की आजादी के ७५ साल पूरे होने के दौरान, गुलामी के दौर में बनाए गए देशद्रोह कानून पर पुनर्विचार की जरूरत है।’ श्री मोदी ने यह बात कही उससे दो दिन पहले सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में देशद्रोह कानून का समर्थन किया था। मुख्य न्यायाधीश एन.वी. रमन की अध्यक्षता वाली तीन जजों की संविधानपीठ के समक्ष देशद्रोह कानून को चुनौती देनेवाली याचिका पर सुनवाई चल रही है। इस याचिका को खारिज कर दिया जाए, ऐसा निवेदन केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से किया और अब प्रधानमंत्री ने अलग रुख अपनाया है। केंद्र सरकार की भूमिका और प्रधानमंत्री के मन की बात में यह अंतर क्यों? लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट ने ही देशद्रोह खत्म कर दिया है!
मुकदमा किसके खिलाफ?
कन्हैया कुमार, हार्दिक पटेल से लेकर मुंबई में सांसद-विधायक राणा दंपति तक देशद्रोह के मामले दर्ज किए गए। भीमा-कोरेगांव मामले में कवि वरवरा राव सहित कई विचारक इसी आरोप के तहत जेल में हैं। ९० वर्षीय सामाजिक कार्यकर्ता फादर स्टेंस स्वामी का मुंबई के आर्थर रोड जेल में निधन हो गया। उन्हें जमानत भी नहीं मिली। वर्ष १८७० में अंग्रेजों ने यह कानून बनाया था। महात्मा गांधी, तिलक से लेकर वीर सावरकर तक हजारों लोगों को देशद्रोह के आरोप में आजीवन कारावास की सजा दी गई या सीधे फांसी पर लटका दिया गया, लेकिन आजाद हिंदुस्थान में उसी ब्रिटिश काल के कानून की क्या जरूरत है? हर सरकार द्वारा अपने खिलाफ जनमत बनानेवालों के खिलाफ देशद्रोह का आरोप लगाना कोई नया नहीं है। केदारनाथ सिंह ने वर्ष १९५३ में बेगूसराय में कांग्रेस सरकार के खिलाफ भाषण दिया और उनके खिलाफ स्वतंत्र हिंदुस्थान में देशद्रोह का मुकदमा दर्ज किया गया। केदारनाथ सिंह ने तत्कालीन कांग्रेस सरकार पर भ्रष्टाचार और कालाबाजारी के आरोप लगाए थे। केदारनाथ सिंह फॉरवर्ड कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य थे। उन्होंने अपने भाषण में कहा था, ‘हमने अंग्रेजों को गद्दी से उखाड़ फेंका, लेकिन उनकी जगह कांग्रेस के गुंडों को चुन लिया।’ इस सरकार को भी उखाड़ फेंकना होगा। एक और क्रांति की जरूरत है। भ्रष्ट, कालाबाजारी करनेवालों को जड़ से उखाड़कर श्रमिकों व वंचितों का शासन लाना चाहिए।
इस प्रकरण में सर्वोच्च न्यायालय के पांच न्यायाधीशों की खंडपीठ ने अपने फैसले  में स्पष्ट ही कहा कि ‘सरकार की आलोचना करना, प्रशासनिक कार्यों पर टिप्पणी करना देशद्रोह का अपराध नहीं हो सकता।’ कोर्ट ने साफ ही कहा, ‘हिंसा को प्रोत्साहन देना व उसके लिए माहौल तैयार करना देशद्रोह का आधार हो सकता है, परंतु सिर्फ भाषण व घोषणा नहीं।’
किसने क्या कहा?
२०१४ से २०१९ के बीच देशद्रोह के ३२६ मामले दर्ज किए गए। पिछले आठ वर्षों में केवल सात को दोषी ठहराया गया है और सजा सुनाई गई है। वर्ष २०१२ में कानपुर के कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी को संविधान का मजाक उड़ाने की वजह से देशद्रोह का आरोप लगाकर गिरफ्तार किया गया। अगस्त २०१५ में हार्दिक पटेल ने पाटीदार आरक्षण समर्थकों के एक सम्मेलन के दौरान भाषण दिया। इसमें उन्होंने कहा, ‘आरक्षण के लिए आत्महत्या करने की बजाय पुलिस को मारो और मरो।’ इस वजह से हार्दिक पर देशद्रोह के आरोप में आपराधिक मामला दर्ज किया गया था।
वर्ष २०१६ में कन्हैया कुमार और उमर खालिद पर जेएनयू परिसर में देश विरोधी नारे लगाने के लिए देशद्रोह का आरोप लगाया गया था, लेकिन पुलिस कन्हैया कुमार के खिलाफ इस तरह की नारेबाजी का कोई ठोस सबूत पेश नहीं कर सकी। प्रधानमंत्री मोदी वोट पाने के लिए आतंकवादी हमलों, दंगों और मौतों का सहारा लेते हैं, ऐसा बयान देनेवाले वरिष्ठ पत्रकार विनोद दुआ को भी देशद्रोह के आरोपों का सामना करना पड़ा। ताजा मामला सांसद नवनीत राणा का। हनुमान चालीसा का पाठ करने के नाम पर उन्होंने दो धर्मों के बीच दरार पैदा करने का प्रयास किया। मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के निवास स्थान मातोश्री जाकर हनुमान चालीसा का पाठ करेंगे, इस घोषणा के बाद हजारों शिवसैनिक जुट गए और तनाव पैदा हो गया। इसलिए भारतीय दंड संहिता की धारा १२४-ए (देशद्रोह के आरोपों) के तहत उन्हें गिरफ्तार करना पड़ा। यह सरकारी तंत्र को ही चुनौती देने का प्रयास था। इंदिरा गांधी ने आपातकाल लगाया, ऐसा आरोप भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) आज भी लगाती है, लेकिन ‘पुलिस सरकार का आदेश न माने’ ऐसी उकसानेवाली बातें तब जयप्रकाश नारायण से लेकर चरण सिंह तक जैसे नेता अपने बयान में सीधे-सीधे करते थे। जॉर्ज फर्नांडीस और उनके सहयोगियों ने बम विस्फोटों के माध्यम से सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए एक क्रांतिकारी आंदोलन शुरू किया था। जॉर्ज को तब गिरफ्तार कर लिया गया और देशद्रोह के आरोप में वैâद में डाल दिया गया। यह भी सच है कि जॉर्ज और उनके भाइयों को जेल में बेरहमी से प्रताड़ित किया गया था। जिस तरह स्वतंत्रता सेनानियों ने अंग्रेजों के जमाने में देशद्रोह के मुकदमों के दौरान यातनाएं झेली थीं, उसी तरह अभी भी भोगा जा रहा है। धारा १२४-ए देशद्रोह कानून का सीधे-सीधे दुरुपयोग हो रहा है, ऐसा श्री शरद पवार ने चांदीवाल आयोग के समक्ष कहा तो किसी ने भी पवार के बयान को गंभीरता से नहीं लिया होगा। पवार पहले बोले और प्रधानमंत्री मोदी ने बाद में इसी ‘१२४-ए’ धारा के मुद्दे को आगे बढ़ाया। ब्रिटिश काल के कानूनों की कोई आवश्यकता नहीं है, ऐसा पवार की बातों को उद्धृत करते हुए मोदी कहते हैं और सुप्रीम कोर्ट तुरंत उस कानून को स्थगित कर देता है। इस घटनाक्रम को समझना चाहिए। जैसे ही भाजपा के विरोधियों के खिलाफ इस कानून का शिकंजा कसा, उसी तरह गैर भाजपा शासित राज्यों में महाराष्ट्र से लेकर प. बंगाल तक इस कानून का ‘करेक्ट कार्यक्रम’ शुरू होते ही देशद्रोह की धारा निलंबित हो गई! बेशक यह अच्छा ही हुआ। ‘पीएमएलए’ अधिनियम भी इसी तरह से जाएगा। सरकार का दिमाग जगह पर है क्या? संपादकीय में ऐसा लिखते ही अंग्रेजों ने लोकमान्य तिलक के खिलाफ देशद्रोह का मुकदमा दर्ज कर लिया और उन्हें छह साल के लिए मांडाले जेल भेज दिया। आजादी के बाद यही कानून कई लोगों को प्रताड़ित करता रहा। अंत में किसानों के विरोध वाले अत्याचारी कानून को जाना पड़ा! उसी तरह देशद्रोह के कानून को भी रोकना होगा! सरकार का दिमाग ठिकाने पर आ गया, ऐसा ही कहना होगा।

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