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गर्मी की आहट…. गहराने लगापानी का संकट!

राजेश माहेश्वरी।  गर्मी का मौसम आते ही देशभर में पानी को लेकर हाहाकार मचना शुरू हो जाता है। देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा शुद्ध पानी से वंचित है। खासतौर पर गांव-कस्बे की स्थिति सबसे ज्यादा खराब है। जहां देखने के लिए तो नलकूप और टंकिया सब कुछ हैं लेकिन पानी देने के नाम पर सूखा ही रहता है। ग्रामीण महिलाओं को दूर-दराज से पानी ढोने की मजबूरी से जूझना पड़ रहा है। कहीं-कहीं पर तो फिर से लोगों को या तो कुओं का सहरा लेना पड़ रहा है या फिर किराए पर टैंकर मंगाकर प्यास बुझानी पड़ रही है। वैसे तो देश के अधिकतर क्षेत्रों में सारा साल ही पानी की समस्या बनी रहती है लेकिन गर्मी के मौसम में पानी की कमी विकराल रूप धारण कर लेती है। जगह-जगह लोग पानी को लेकर परेशान रहते हैं मगर गर्मी जाते ही इस समस्या को भूल जाते हैं।
भारत को पहली बार २०११ में जल की कमीवाले देशों की सूची में शामिल किया गया था और अब ऐसी स्थिति बन चुकी है कि राजस्थान हो या बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड हो या मध्यप्रदेश या फिर देश की राजधानी दिल्ली, प्रत्येक साल गर्मी के मौसम में देश के विभिन्न भागों में पानी को लेकर हाहाकार मच जाने की खबरें आती हैं। उत्तर प्रदेश का बुंदेलखंड और पानी की कमी पर्यायवाची हो गए हैं और गर्मी के मौसम की शुरुआत के साथ यहां समस्या चरम पर होती है। जल संकट के समाधान के लिए कई योजनाएं शुरू की गर्इं, इसके लिए करोड़ों रुपए बजट में आवंटित किए गए लेकिन जमीनी स्थिति जस की तस बनी हुई है।
जंगलों की कटाई, भूगर्भ जल का अत्यधिक दोहन और तकनीक के अत्यधिक इस्तेमाल से झारखंड की राजधानी रांची में भारी जल संकट की स्थिति उत्पन्न हो गई है। बड़े-बुजुर्ग बताते हैं के २०-३० साल पहले सिर्फ ५० से ६० फीट की गहराई में पानी मिल जाता था, जो अब ५०० फीट में भी नसीब नहीं हो रहा है। कमोबेश ऐसे हालात देश के लगभग हर राज्य के हैं। केंद्रीय भू-जल बोर्ड की एक रिपोर्ट के अनुसार देश में सन् २००७ से २०१७ के बीच भूगर्भ जल के स्तर में इकसठ प्रतिशत की गिरावट आई। हालत यह हो गई कि कई नदियों के किनारे बसे गांवों में भी लोगों को पेयजल की किल्लत का सामना करना पड़ रहा है। महत्वपूर्ण यह है कि सारी दुनिया में भूगर्भ जल का प्रयोग करने के मामले में भारत अव्वल है। १५ अगस्त २०१९ को प्रधानमंत्री द्वारा देश के हर ग्रामीण क्षेत्र तक नलों के जरिए प्रत्येक घर में जल पहुंचाए जाने के लिए ‘जल जीवन मिशन’ नामक अभियान की शुरुआत की गई थी। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इस मिशन की शुरुआत से पहले देश के ग्रामीण इलाकों में केवल ३.२३ करोड़ परिवारों के पास ही नल कनेक्शन थे और इस योजना के तहत २०२४ तक १९.२२ करोड़ ग्रामीण परिवारों तक पानी पहुंचाए जाने का लक्ष्य है। हालांकि घर-घर तक जल पहुंचाने का वास्तविक लाभ तभी होगा, जब नलों से जलापूर्ति भी सुचारु रूप से हो और यह केवल तभी संभव होगा, जब जलस्रोतों की बेहतर निगरानी व्यवस्था होने के साथ-साथ जल संरक्षण के लिए कारगर प्रयास नहीं किए जाएं। देश में जल संकट गहराते जाने की प्रमुख वजह है भूमिगत जल का निरंतर घटता स्तर। एक रिपोर्ट के अनुसार इस समय दुनियाभर में करीब तीन बिलियन लोगों के समक्ष पानी की समस्या मुंह बाये खड़ी है और विकासशील देशों में तो यह समस्या कुछ ज्यादा ही विकराल होती जा रही है, जहां करीब ९५ फीसदी लोग इस समस्या को झेल रहे हैं। पानी की समस्या एशिया में और खासतौर से भारत में तो बहुत गंभीर रूप धारण कर रही है। जल संबंधी विभिन्न मुद्दों पर ठोस काम करने की जरूरत है। जनता को पानी के बुद्धिमता पूर्ण उपयोग के लिए जागरूक किया जाना चाहिए। निजी और सार्वजनिक जलस्रोतों का समुचित विकास और संरक्षण सुनिश्चित हो। बरसात के पानी को और अधिक संग्रहित किया जाना चाहिए। नए तालाब बनवाए जाएं, पुराने कुओं, तालाबों और बावड़ियों का संरक्षण किया जाए। नदियों को स्वच्छ बनाया जाए। जमीन के भीतर पानी जाए, इसके लिए प्रयास हों। वर्षा जल संग्रहण के जो परंपरागत साधन थे, आधुनिक जीवनशैली ने उन्हें भी अप्रासंगिक मान लिया। ऐसे में आवश्यकता है कि हम जल के उपलब्ध भंडारण के संरक्षण के प्रति सचेत हों और वर्षाजल के संग्रहण के प्रति सजग रहें। यह सजगता ही हमें भविष्य की परेशानियों से बचा सकती है।

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