मुख्यपृष्ठस्तंभसंडे स्तंभ : सिनेमा का ‘इंपायर’ और ‘कैपिटॉल’!

संडे स्तंभ : सिनेमा का ‘इंपायर’ और ‘कैपिटॉल’!

विमल मिश्र।  देश की पहली फीचर फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ दिखानेवाले गिरगांव के कोरोनेशन सिनेमा का नामो-निशान नहीं बचा। बोलनेवाली पहली फिल्म ‘आलम आरा’ दिखानेवाले गिरगांव के ही मैजेस्टिक सिनेमा की जगह मल्टीस्टोरी टॉवर है और फोर्ट के वॉटसन होटल में ल्यूमरे ब्रदर्स द्वारा प्रदर्शित पहली फिल्म के प्रदर्शन की सही जगह आंखों से ओझल है। सिनेनगरी मुंबई के ‘वैâपिटॉल’ और ‘न्यू इंपायर’ भी सिनेमाघर के रूप में अब अतीत बन चुके हैं।
खास से आम का सफर
रखरखाव के बढ़े खर्च और दर्शकों की कमी से अब बंद पड़ा छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस के सामने खूबसूरत थिएटर वैâपिटॉल कभी पूरे फोर्ट क्षेत्र की शान होता था। नजीर नामक पारसी सेठ द्वारा बनवाया वैâपिटॉल मूलत: ‘गेयटी’ थिएटर था, जिसके ७० फुट चौड़े और ४० फुट गहरे मंच पर मराठी, गुजराती और अंग्रेजी नाटक खेले जाते थे। १८५० के दशक में पारसी थिएटर पनपा तो इसके पीछे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सहसंस्थापक दादाभाई नौरोजी सरीखों का प्रयास था। नौरोजी उस वक्त एलफिंस्टन कॉलेज के स्टूडेंट थे और नानाभाई रानीना और आर्देशीर एफ. मूस जैसे सहपाठियों के साथ गेयटी के इन नाटकों में प्रांप्टर का काम करने से लेकर पर्दा उठाने और गिराने जैसे कामों में हाथ बंटाया करते थे।
१८६० में जब मुंबई में तेजी का युग था, फोर्ट क्षेत्र की अनेक इमारतों की तरह गेयटी भी बोरीबंदर के फलक पर उभरा। पड़ोस की भव्य विक्टोरिया टर्मिनस और महाकाय मनपा बिल्डिंग तब तक बनी नहीं थी। सोराबजी कुवेरजी नजीर ने ६ दिसंबर, १८७९ को थिएटर के रूप में निर्माण कराकर गेयटी के दरवाजे आम दर्शकों के लिए खोल दिए।
शुरू के दो वर्ष गेयटी में केवल श्ल्r्ी घ्ह ऊप ण्aूप्raत् सरीखे अंग्रेजी शो ही होते रहे, जिनके ग्राहक गोरे साहब बहादुर या अंग्रेजीदां बाबू हुआ करते थे। यहां तक कि इसका नाम ही ‘ऑवर यूरोपियन थिएटर’ पड़ गया। १८८१ में मराठी और १८८३ में पारसी अभिनेताओं के गुजराती शो शुरू हुए। नवंबर, १९१२ में फिल्मों का दौर आरंभ हुआ मूक फिल्म Eज्ग्ेद इrदस् ऊप Raस्aब्aहa से। १९३१ में प्रदर्शित हुई पहली हिंदी टॉकी ‘आलमआरा’।
पर्दे की लाइन से ७० फुट लंबा और ३१ फुट चौड़ा स्टेज और दो साइड स्टेजों के बाद पीछे की ओर उठता हुआ विक्टोरियन गेयटी का भीतरी‌ हिस्सा घोड़े की नाल के आकार में चार भागों में बंटा था – आर्केस्ट्रल स्टॉल्स, पिट स्टॉल्स, पिट और एंफीथिएटर। गेयटी का ड्रॉप सीन सर रिचर्ड टेंपल की पेंटिंग से उठाया गया था – उन्हीं की निगरानी में बना हुआ। १८८३ में बिजली आई, उससे पहले थिएटर को रोशन करने की जिम्मेदारी उठाते थे २००० मोमबत्तियों वाले विशालाकार लैंप। तोरण बहुत खूबसूरत था व कुर्सियां नफीस क्वॉलिटी के बेंत की बनी थीं और बॉक्स – जिनके पर्दे लाल और सफेद थे – छह और चार दर्शकों के हिसाब से बनवाए गए थे। प्रशस्त पोर्च संभालता था आर्वेâस्ट्रा की जगह। गेयटी में हुआ पहला ही शो २१ सप्ताह तक चला। उस समय की जो जानकारियां हासिल हो पाई हैं, उनके अनुसार स्टेज बॉक्स का सीजन टिकट ६८० रुपए और आर्वेâस्ट्रल बॉक्स का ४८० रुपए होता था, जबकि आर्वेâस्ट्रल बॉक्स का सिंगल टिकट १०० रुपए का था। ४० शो के हस्तांतरणीय टिकट भी थे।
वैâपिटॉल और गेटवे ऑफ इंडिया के पास रीगल सिनेमा के मालिक एक ही हैं – कोलकाता के ग्लोब थिएटर्स के मालिक मानेक एफ. सिधवा, जिनके पिता ने इस कंपनी की स्थापना की थी। सिधवा ने १९२८ में गेयटी के लीज अधिकार खरीदे और उसे नया नाम दिया ‘वैâपिटॉल’। २० जनवरी, १९२८ से यह पूरी तरह फिल्में दिखानेवाला सिनेमाहॉल बन गया।
फिल्म विरासत
पुराने ढंग की टेबल कुर्सियों वाला वैâफेटेरिया, मेकअप रूम और दूसरे कमरों के साथ वैâपिटॉल ग्रेड-२ की विरासत इमारत है। मुंबई का अकेला सिनेमा हॉल, जो अंत समय तक लगभग मूल हालत में ही रहा। पुराने दर्शकों ने दशकों पुराने बिजली के पंखों के साथ यहां गायब हत्थों वाली बाप-दादों के जमाने की एक बड़ी सी घड़ी भी टंगी देखी है। संभवत: यह वही घड़ी है, जिसके घंटे शो शुरू होने की घोषणा के लिए उपयोग में लाए जाते थे। १९५० के दशक के मध्य में फिल्में जब सिनेमास्कोप हुर्इं साइड बॉक्स हटाकर और अग्रभाग चौड़ा कर उसके लिए गुंजाइश निकाली गई। गेयटी, जो पहले अभिजात वर्ग का थिएटर था – वैâपिटॉल के रूप में अब आम प‌ब्लिक का थिएटर बन गया। ८८८ सीटोंवाले इस थिएटर की सफलता की वजह थी मामूली टिकट दर और सीएसटीएम के ठीक सामने इसकी लोकेशन।
पर, देश के अन्य सिंगल स्क्रीन सिनेमाघरों की तरह वैâपिटॉल के भी दुर्दिन आए। १९९९ में सीएसटीएम के सबवे के निर्माण के कारण भूगर्भ मार्ग से दूर होने के बावजूद थिएटर की दीवारों में दरारें पड़ गर्इं और ज्यादा क्षति से बचाने के लिए खर्चीली मरम्मत करानी पड़ी। बिल्डिंग में मौजूद किराएदार बहुत कम किराया देते थे। जब बिजली, पानी, एयर कंडीशनिंग का खर्च निकालना भी मुश्किल हो गया तो २००६ में इसे अपने दरवाजे हमेशा के लिए बंद करने पड़े। यहां दिखाई जानेवाली आखिरी फिल्म थी ‘शस्त्र’। इसके मालिकों ने महानगपालिका को अपग्रेड करने की योजनाएं देकर इसे जिंदा रखने की भरसक कोशिशें कीं, पर वे लाल फीते में अटक कर रह गर्इं। आखिर, मालिकों ने सिनेमा का लाइसेंस ही सरेंडर कर दिया। अब यह इमारत प्रशासकीय कामों में उपयोग में लाई जा रही है।
एशिया का ऐसा पहला थिएटर
२१ फरवरी, १९०८ को खुला मुंबई के सबसे पुराने और रखरखाव व सुंदरता के लिहाज से थिएटरों में गिना जानेवाला विक्टोरियन इंपायर- अपने नाटकों के लिए मशहूर था, जिसकी शुरुआत बाटलीवाला ऐंड कंपनी के एक शानदार शो के साथ हुई। उस वक्त यह सेंटीलीवर बॉलकनी वाला एशिया का पहला थिएटर होता था। मूलत: बोरोक शैली में निर्मित इस थिएटर का डिजाइन आर्थर पेन और ओ. कोनर ने बनाया और भीतरी सज्जा की जेराल्ड ने। इंपायर में नियमित फिल्में दिखाई जानी शुरू हुर्इं १९३० में न्न्aुaंदह् ख्ग्हु से। १९३५ में ‘सिनेमा मुगल’ कहलाने वाले केकी मोदी ने इसे बॉम्बे इंप्रूवमेंट ट्रस्ट से खरीद लिया। मौजूदा नाम ‘न्यू इंपायर’ उसने १९३७ में पाया।
जॉन रॉबर्ट्स कंपनी के आर्किटेक्ट प्रिâट्ज वॉन ‌ड्रिबर्ग द्वारा डिजाइन ९८३ सीटिंग क्षमतावाले इस थियेटर का नया आर्ट डेको रूप १९४८ में ब्रिटिश आर्किटेक्ट एम. ए. रिडली एबॉट की देन है। हॉलीवुड की फिल्म निर्माता कंपनी २०ूप् णहूल्rब् इर्दे ने १९५५ में हस्तगत कर इसे मुंबई में अपनी फिल्मों का शोकेस बना दिया। ग्लैमरस फिल्मों के शौकीनों, प्रेमियों, कॉलेज स्टूडेंट्स, ऑफिस गोअर्स और कॉर्नर सीट के चाहतमंदों के मनपसंद इस सिनेमाघर के सामने दर्शकों की उपेक्षा से जब बुरे दिन आए तो इसने जिंदा रहने के लिए बहुत हाथ-पांव मारे। इनमें एक कदम था नियमित फिल्मों से पहले वर्ल्ड बॉक्सिंग चैंपियनशिप के मुक्केबाजी के मुकाबले दिखाना। २१ मार्च, २०१४ को बगैर किसी शोर के यह दर्शकों को अलविदा कह गया। (क्रमश:)
(लेखक ‘नवभारत टाइम्स’ के पूर्व नगर संपादक, वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं।)

अन्य समाचार