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द लेसेंट ग्लोबल हेल्थ पत्रिका ने जताई चिंता देश में बढ़ रही हैं `बालिका वधुएं’!

सामना संवाददाता / नई दिल्ली

विश्व के कई देशों में ऐसी कई प्रथाएं हैं, जो आज के समय में लोगों के लिए समस्या बन चुकी हैं। इसमें से कई ऐसी प्रथाएं, जो महिला वर्ग के लिए चुनौती बन गई है। इन्हीं में से एक प्रथा है बाल विवाह। बाल विवाह के नाम पर आज महिला वर्ग के साथ अन्याय हो रहा है, वे चाह कर भी कुछ बोलने का सामर्थ्य नहीं जुटा पाती हैं। हालांकि, ऐसा नहीं है कि यह देश के हर कोने में खुले तौर पर हो रहा है, लेकिन जहां भी हो रहा है, इसे रोकना बहुत जरूरी है। आज का समाज पहले के मुकाबले बहुत आगे निकल चुका है। ऐसे में पुरानी प्रथा के साथ जीवन-यापन करना पूरी तरह से गलत है। इसके बावजुद हमारे हिंदुस्थान में १४ राज्यों में बढ़ते बाल विवाह के मामलों ने चिंता पैदा कर दी है। दरअसल, हिंदुस्थान में बाल विवाह पर चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं। दावा है कि भारत के कई राज्यों में बाल विवाह खत्म करने को लेकर हुए प्रयास नाकाफी साबित हो रहे हैं। एक स्टडी के अनुसार पांच लड़कियों में एक और छह लड़कों में एक लड़के की शादी हो रही है। बाल विवाह को लेकर एक वैश्विक हेल्थ जर्नल- लैंसेट की स्टडी में ये चौंकानेवाला खुलासा हुआ है। इसके अनुसार, पिछले कुछ साल में बाल विवाह रोकने को लेकर हुए प्रयास रुक गए हैं। इसके साथ ही यूएन के मुताबिक, दुनियाभर में १० मिलियन (एक करोड़) बच्चियों पर बाल विवाह का खतरा मंडरा रहा है।

बता दें कि पिछले पांच साल (२०१६ से २०२१) की अवधि में बाल विवाह को लेकर हुई स्टडी में कहा गया है कि कुछ राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में बाल विवाह बेहद आम बात हो गई है। छह राज्यों में लड़कियों के बाल विवाह बढ़े हैं। इन राज्यों में मणिपुर, पंजाब, त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल शामिल हैं। आठ राज्यों में लड़कों की शादियां नाबालिग रहते हो रही हैं। इनमें छत्तीसगढ़, गोवा, मणिपुर और पंजाब शामिल हैं। गौरतलब है कि साल १९९३ से २०२१ के दौरान भारत का राष्ट्रीय पैâमिली हेल्थ सर्वे हुआ था। इस शोध टीम में हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के रिसर्च अधिकारी और भारत सरकार से जुड़े अधिकारी भी शामिल रहे।
यूनाइटेड नेशंस चिल्ड्रंस फंड का मानना है कि बाल विवाह `मानवाधिकारों का उल्लंघन’ है। ऐसा इसलिए क्योंकि१८ साल से कम आयु वाली लड़कियों के साथ-साथ २१ साल से कम आयु में लड़कों की शादियों के कारण उनके विकास भी प्रभावित हो रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र की इस एजेंसी का मानना है कि बाल विवाह लैंगिक असमानता के कारण बढ़ रहे हैं। भारत में बाल विवाह की वर्तमान स्थिति को देखते हुए ये लक्ष्य काफी चुनौतीपूर्ण लग रहे हैं, लेकिन लैंगिक समानता के लिए बाल विवाह को जड़ से मिटाना काफी जरूरी है।

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