" /> मामला मजहबी है! भाग-३

मामला मजहबी है! भाग-३

कश्मीरी पंडितों पर घाटी में हुई बर्बरता और उसके बाद के पलायन को ३२ वर्ष बीत गए। टेंटों में तीन-तीन पीढ़ियां वादी में वापसी की उम्मीद में सांस लेती रहीं, पर हासिल अब तक कुछ नहीं हुआ। सरकार तब भी चिंतन शिविर में थी और आज भी वहीं है। उस देश में जहां हर हक के लिए आंदोलन होता है, वहां घाटी में किसी महिला को निर्वस्त्र कर उसके वक्ष काट खुली सड़क पर घसीटा गया, तब भी किसी की आवाज मुखर नहीं हुई। आज फिर से १९९० के उन स्याह पन्नों को पलटना जरूरी है।
नए कश्मीर के सपने को न जाने किसकी नजर लग गई। अभिमन्यु सोच ही रहा था, उसे याद आया कि उस दिन अभय प्रताप कौल कितने गुस्से में थे। जब भी अभय प्रताप गुस्से में होते आरती और अभिमन्यु उनके आस-पास भी नहीं भटकते थे। दोनों ने उन्हें अपने कमरे में अकेला छोड़ दिया। आरती सुरक्षाकर्मियों के खाने के प्रबंध में लग गई और खुली हवा का आदी अभिमन्यु ऊपर छत पर चला गया। छत से वह पूरे इलाके पर नजर घुमा रहा था। कर्फ्यू के कारण हर गली, हर चौबारा सुनसान पड़ा था। एक खामोशी दूर-दूर तक पैâली हुई थी। तूफान आने से पहले जैसे सब कुछ खामोश हो जाता है, वैसी वाली खामोशी थी। आनेवाले तूफान की दस्तक और वह तूफान आया! मगरिब की नमाज के बाद लाउडस्पीकर पर पंडितों को आखिरी चेतावनी दी गई कि पंडितों, भाग जाओ… वरना… मर जाओ। हर गली-मुहल्ले में हथियार थामे लोग घूमने लगे थे। उस भीड़ की आवाज ने पूरी वादी में दहशत भर दी थी। वे लोग दो घंटे से लगातार चेतावनी दे रहे थे। हर गली से जुलूस निकल रहे थे। हिंदू लोगों के दरवाजे खटखटाकर उन्हें बाहर निकलने के लिए कह रहे थे। अभय प्रताप के घर का रुख किसी ने नहीं किया।
वादी में दो घंटे आतंक से भरे थे। फिर मस्जिदों में ईशा की नमाज की अजान हुई और अजान के बाद कुछ देर सब शांत रहा। इतना शांत कि न जाने क्या होने जा रहा है, कोई अंदाजा ही नहीं था। रात करीब ८ बजे ईशा की नमाज के बाद मुख्तार दौड़ता-दौड़ता अभिमन्यु के घर में दाखिल हुआ। वह बहुत घबराया हुआ था। उससे न बोला जा रहा था, न सांस ली जा रही थी। ऐसी अवस्था में भी उसने कहा, ‘कत्लेआम का फरमान जारी हुआ है, कुछ कीजिए। आपकी तो सरकार में पहचान है, कुछ तो कीजिए।’ मुख्तार ने लपककर अभिमन्यु का हाथ पकड़ा और उसे अपने साथ खींचते हुए सबसे कहा कि आप सब लोग मेरे घर चलो। यहां बहुत खतरा है। उसके आने से अभिमन्यु को भी लगा कि कुछ कश्मीरियत बाकी है। बहुत देर बाद अभिमन्यु ने थोड़ी खुलकर सांस ली थी।
अभय प्रताप, मुख्तार के जज्बात समझ रहे थे पर यह भी जानते थे कि हमें पनाह देने के कारण जिहादी मुख्तार और उसके पूरे परिवार का बुरा हश्र कर सकते हैं। इस वक्त मुख्तार का उनके घर में होना, मुख्तार की जान को खतरा था। अभय प्रताप ने मुख्तार को समझा दिया कि वे सेना की सुरक्षा में है उन्हें कुछ नहीं हो सकता। अपने दरवाजे पर तैनात एक जवान को अभय प्रताप ने कहा कि मुख्तार को सही-सलामत छोड़ आए। मुख्तार मन से जाने के लिए जरा भी तैयार नहीं था। ऐसी संकट की घड़ी में उसे अभिमन्यु के साथ रहना था पर मुख्तार, अभय प्रताप की बात मानने के लिए बाध्य था। टेंशन का माहौल देख मुख्तार अभय प्रताप को और परेशान करना नहीं चाह रहा था। मुख्तार उस घर से निकलकर जानेवाला था कि एक ही क्षण में वह पलटा, पलटकर अभिमन्यु के पास जाकर उसका हाथ पकड़कर कहा, ‘तू घर से बाहर जरा भी नहीं निकलना, डर लगे तो तुरंत मेरे घर आ जाना, ठीक है…? वरना अभी चल। मेरे घर में तुझे कुछ नहीं होगा!’ अभिमन्यु ने अपने पापा की तरफ ऐसे देखा कि उनके होते हुए उन्हें कुछ नहीं होगा। मुख्तार का डर कम करने के लिए अभिमन्यु ने उससे कहा- ‘तू ज्यादा सोच मत। हमें कुछ नहीं होगा। मैं घर से बाहर नहीं निकलूंगा। तेरी कसम।’ अपने लिए मुख्तार की आंखों में जो चिंता थी, उसे देख अभिमन्यु को एक पल के लिए लगा कि मुख्तार के गले लग जाए। वह लगने भी वाला था कि लाउडस्पीकर फिर एक बार चिल्लाया, ‘अल्लाहूअकबर…’ और उस लाउडस्पीकर के साथ बाहर रास्ते पर खड़ी भीड़ जोर-जोर से नारे देने लगी, ‘अल्लाहूअकबर… अल्लाहूअकबर।’ मुख्तार के गले लगने की अभिमन्यु की आरजू उस अल्लाहूअकबर की आवाज में दब गई। बेमन ही सही, मुख्तार वहां से चला गया।
फोन बज रहा था। बाहर शोर इतना था कि फोन की आवाज भी उस शोर में ठीक-ठीक सुनाई नहीं दे रही थी। अभय प्रताप ने अभिमन्यु से कहा कि दरवाजे-खिड़कियां बंद कर लो… और उन्होंने फोन उठाया। दूसरी तरफ उनकी ही आवाज थी, जिनके नाम नहीं होते। ‘क्या तय किया, अभय प्रताप भाईजान? चले आइए हमारे साथ।’ ‘नहीं…! और दुबारा कभी कॉल नहीं करना।’ अभय प्रताप ने बेहद गुस्से में कहा। ‘दुबारा कॉल करने की नौबत नहीं आएगी, अभय भाईजान। कितनी देर सुरक्षा में रहोगे? आधा घंटा… एक घंटा…? और जिनके पास सुरक्षा नहीं, तुम्हारे उन लोगों को वैâसे बचाओगे?’ यह बात सुनते ही अभय प्रताप ने झटके से फोन कट किया और ऑफिस में उनके जो सहायक थे, कृष्णावतार, उनके घर फोन डायल करना शुरू किया, यह कहने के लिए कि जल्दी-से-जल्दी घर खाली करके वहां से निकल जाओ। पहली दो दफा फोन एंगेज आ रहा था। अभय प्रताप को अवतार की चिंता खाए जा रही थी। फोन अभी भी एंगेज था, अभय प्रताप लगातार डायल करते रहे। उनकी परेशानी देख आरती बहुत घबरा गई। अभय प्रताप को यकीन था कि उनके अखबार के हिंदू स्टाफ की जान अब खतरे में है। स्टाफ में सिर्फ कृष्णावतार के घर ही फोन था… उस वक्त अभय प्रताप के हाथ में सिर्फ फोन करके उसे आगाह करने के सिवाय कोई और उपाय नहीं था। जब तक कि कृष्णअवतार का फोन एंगेज आ रहा था… बाकी लोगों की चिंता भी अभय प्रताप को सता रही थी। पुलिस को कॉल करके कोई फायदा नहीं था क्योंकि उनके हिसाब से अब यह मजहबी मामला था। वाकई आज भी मामला मजहबी ही तो है।
(क्रमश:)
(आशीष कौल वरिष्ठ मीडियाकर्मी और डॉक्टोरल रीसर्च स्कॉलर हैं। कश्मीर पर लिखी इनकी किताबें रीफ्यूजी वैंâप, दिद्दा-द वॉरियर, क्वीन ऑफ कश्मीर, रक्त गुलाब बेस्टसेलर रही हैं।)