मुख्यपृष्ठसंपादकीयरोखठोक‘आर्टिकल ३७०’ का झमेला... राम पहुंचे मंदिर में, कश्मीरी पंडित वनवास में!!

‘आर्टिकल ३७०’ का झमेला… राम पहुंचे मंदिर में, कश्मीरी पंडित वनवास में!!

संजय राऊत

धारा ३७० ही विकास में मुख्य बाधा थी, ऐसा प्रधानमंत्री मोदी ने कहा। धारा ३७० हटाए चार साल हो गए हैं। जम्मू-कश्मीर में चुनाव हो नहीं पाए और कश्मीरी पंडित वापस अपने घर जा नहीं पाए। राम को मंदिर तो मिल गया, लेकिन तंबू में रह रहे पंडितों का वनवास बरकरार है। मोदी की डींगबाजी का कोई अंत नहीं है!
हमारे प्रिय प्रधानमंत्री जहां भी जाते हैं, वहां बेधड़क झूठ बोलते हैं। १० सालों की यह अखंड परंपरा है। झूठ बोलने के लिए हिम्मत लगती है। इतनी हिम्मत प्रधानमंत्री मोदी के पास आती कहां से है? यह सवाल हमारे देशवासियों का है। मोदी भरपूर राजनीतिक डींगबाजी करें, लेकिन कम से कम राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े विषयों पर झूठ न बोलें, यही अपेक्षा है। पुलवामा हमले के पीछे का सच प्रधानमंत्री मोदी ने कभी सामने नहीं आने दिया। पुलवामा हमले में ४० जवान शहीद हुए और उनकी शहीदी पर राजनीति करके भाजपा ने लोगों से वोट मांगा, लेकिन हमला हुआ कैसे? ४० किलो आरडीएक्स आया कहां से? जिस गाड़ी में आरडीएक्स का विस्फोट हुआ, उस गाड़ी का संबंध गुजरात से था क्या? इस पर श्रीमान मोदी मौन हैं। बालाकोट में हुआ सर्जिकल स्ट्राइक भी संदेह के घेरे में है। इस तरह का कोई भी ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ पाकिस्तान में होने का कोई सबूत उपलब्ध न होने की जानकारी अब सामने आई है। प्रधानमंत्री मोदी जम्मू-कश्मीर और धारा ३७० को लेकर भी अब फरेब करने लगे हैं। मोदी मंगलवार को जम्मू गए। उन्होंने कहा, ‘धारा ३७० जम्मू-कश्मीर के विकास में सबसे बड़ी दीवार थी। यह दीवार भाजपा सरकार ने गिरा दी। इस धारा के हटने के बाद राज्य की जनता को संतुष्टि मिली। धारा ३७० हटने के बाद महिलाओं को अधिकार मिला, जो इससे पहले कभी नहीं मिला था।’
प्रधानमंत्री मोदी से तमाम देशवासियों का एक ही सवाल है। दीवार गिरा दी है तो शरणार्थी शिविरों में बुरी हालत में जी रहे सैकड़ों कश्मीरी पंडितों की अब तक घरवापसी क्यों नहीं हुई? पंडितों की घरवापसी के अलावा प्रधानमंत्री मोदी कश्मीर के विकास की गप हांकते हैं, ये झूठेपन का लक्षण है।
घरवापसी क्यों नहीं?
जम्मू-कश्मीर से धारा ३७० हट गई, लेकिन धारा ३७० हटाने के बावजूद भी पंडितों की ‘घरवापसी’ सरकारी लालफीताशाही में अटकी हुई है। फिर मोदी ने कौन-सी दीवार गिराई? साल २०१४ में मोदी ने पंडितों की घरवापसी का सपना दिखाकर देशभर के हिंदुओं को भावनात्मक दुहाई दी। मोदी सत्ता में आ गए, लेकिन पंडित और उनके परिवार शरणार्थी छावनी में ही रह गए। अपने ही देश में उन पर शरणार्थी शिविरों में रहने की नौबत आ गई। इस काल में अयोध्या में श्रीराम के लिए मंदिर बनाया गया। तंबू के वनवासी राम को हक का आशियाना मिला, लेकिन उन्हीं राम के भक्त जम्मू में शरणार्थी छावनियों में गंदा जीवन जी रहे हैं। धारा ३७० हटाकर भी मोदी पंडितों के जीवन की नरक यातना को खत्म नहीं कर पाए। पंडितों का पुनर्वास कागजों पर ही है और मोदी सरकार उसमें जालसाजी कर रही है। जो सच्चाई अब सामने आई है, वो धक्कादायक है। यह घटनाक्रम देखिए-
– ४१९ पंडितों के परिवारों ने बिना सरकारी मदद और सुरक्षा के कश्मीर घाटी में वापस लौटने का साहस दिखाया। इन सबकी तरफ से केंद्रीय गृह मंत्रालय को सूचना दी गई, लेकिन पांच साल के बाद भी इन परिवारों के आवेदन पर गृह मंत्रालय की तरफ से एक साधारण जवाब भी नहीं मिला। इसे कहते हैं मोदी गारंटी।
– ये ४१९ पंडित उन्हीं ६० हजार परिवारों में से हैं, जिन्होंने १९८९ में आतंकवादी हमले के बाद घाटी से पलायन किया था। इन परिवारों को धारा ३७० हटाने के बाद भी सरकार की ओर से कोई सहायता नहीं मिली।
 २०२१ में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने राज्य सरकार को स्पष्ट निर्देश दिया है कि पंडितों की कश्मीर में ‘वापसी’ और पुनर्वास में उचित सहयोग करे। पंडितों के पुनर्वसन में राज्य के बजट का २.५ फीसदी हिस्सा खर्च करें, लेकिन केंद्र शासित बनाए गए जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने पंडितों के पुनर्वास के लिए एक कौड़ी भी अब तक खर्च नहीं की।
– धारा ३७० हटने के बाद जम्मू-कश्मीर के संपूर्ण राज्य का दर्जा खत्म कर दिया गया। इसलिए कश्मीर घाटी में आवेश है। धारा ३७० हटने के बाद भी मोदी सरकार जम्मू-कश्मीर घाटी में विधानसभा चुनाव कराने की हिम्मत नहीं दिखा पाई। यही प्रमाण है कि वहां कुछ भी ठीक नहीं है। २०१९ से वहां राज्यपाल का शासन है। बजट का पैसा केंद्र से ले. गवर्नर के पास और उसके बाद वित्त विभाग में आता है। विगत तीन सालों में केंद्र की तरफ से जम्मू-कश्मीर राज्य को ३.३८ लाख करोड़ रुपए मिले। इस बजट का २.५ फीसदी पैसा भी पंडितों के पुनर्वास के लिए इस्तेमाल किया जाता तो ८ हजार ४६५ करोड़ रुपए पंडितों के विकास-पुनर्वास के लिए मिले होते, लेकिन प्रशासन ने वैसा कुछ नहीं किया। प्रावधान होते हुए भी पंडितों के पुनर्वास के लिए पैसे नहीं दिए। यह धोखाधड़ी ही है।
– १९८९ में उत्तर कश्मीर के बारामुल्ला जिले में रहनेवाले भरत कचरू अब जम्मू में रहते हैं। वे कहते हैं, हम पुन: कश्मीर में जाकर रहने को तैयार हैं। अब चाहे जो होना है, सो हो। सरकार को पुनर्वास के ल्िाए हमने तीन जगह दिखाए। हमें सरकार का पैसा भी नहीं चाहिए। केवल जमीन उपलब्ध करा दो। हम खुद अपना घर बना लेंगे, पुनर्वास करेंगे। हमारे पुनर्वास के काम में मदद करने के लिए एक नोडल अधिकारी तो नियुक्त करो, लेकिन सरकार ने इसमें भी कुछ नहीं किया। सरकार पंडितों का सुनना ही नहीं चाहती है।
– धारा ३७० हटाकर मोदी सरकार ने केवल राजनीति की। बतौर ‘हिंदू’ पंडितों का कोई भी लाभ नहीं हुआ। किसी तरह का ‘पैकेज’ नहीं, कोई लाभ नहीं। सुरक्षा तो बिल्कुल भी नहीं। कश्मीर से पलायन करके सरकारी नौकरीवाले जो पंडित जम्मू गए, उनके वेतन भी रोक दिए गए, जिससे पंडितों का परिवार मुश्किल में आ गया। राज्य के बजट का २.५ फीसदी हिस्सा पंडितों के पुनर्वास पर खर्च हो, यह निर्देश प्रत्यक्ष रूप से अमल में आया ही नहीं। धारा ३७० हटाने के बाद भी कश्मीर घाटी में अशांति, अस्थिरता, पंडितों का वनवास और सैनिकों पर हमले कायम हैं। फिर मोदी ने किया क्या?
पुन: फिल्म
‘कश्मीर फाइल्स’ फिल्म में पंडितों पर हुए अत्याचारों का आर्थिक और राजनीतिक लाभ कइयों ने उठाया। वो एक तरह की प्रचारकी फिल्म थी। अब एक और फिल्म ‘धारा ३७०’ प्रदर्शित हो रही है। प्रधानमंत्री मोदी ने उस फिल्म का प्रचार शुरू कर दिया है। ‘आर्टिकल ३७०’ फिल्म के कारण घाटी के पंडितों की देशभर में जय- जयकार होगी, ऐसा प्रधानमंत्री मोदी ने कहा। अर्थात उस जय-जयकार में ‘पंडित’ शामिल नहीं होंगे। क्योंकि उनका ठगा जाना और कश्मीर मुद्दे पर प्रधानमंत्री का गप हांकना जारी ही है। सच्चाई यही है कि श्रीराम को घर मिला, लेकिन राम के भक्त कश्मीर के पंडित आज भी ‘तंबू’ में हैं।
धारा ३७० हटाकर उनका क्या विकास हुआ?
जाते-जाते एक ऐतिहासिक जानकारी देकर यह कश्मीर फाइल बंद करता हूं।
संविधान सभा में धारा ३७० प्रावधान के विरोध में कितने सदस्यों ने मतदान किया?
उत्तर : केवल १।
क्या वो सदस्य श्यामाप्रसाद मुखर्जी थे?
उत्तर : नहीं!
फिर धारा ३७० का विरोध करनेवाला वो असली देशभक्त कौन था?
उत्तर : मौलाना हसरत मोहानी।
मुखर्जी ‘भारत छोडो’, ‘चले जाओ’ आंदोलन में शामिल थे?
उत्तर : नहीं!
फिर मुखर्जी क्या कर रहे थे?
उत्तर : उन्होंने उस समय ब्रिटिशों को एक पत्र लिखकर ‘चले जाओ’ आंदोलन को पुलिस बल से कुचल देने की मांग की। देश जब लड़ रहा था, तब वे बंगाल में मुस्लिम लीग की सरकार में शामिल हुए और आनंद में थे!
अर्थात कश्मीर के लिए मुखर्जी ने बलिदान दिया और धारा ३७० को मुखर्जी का विरोध था, ये मामला थोड़ा झूठा लगता है!
धारा ३७० हटाकर मोदी सरकार ने क्या भला किया? समस्याएं जस की तस हैं और कश्मीरी पंडित भी तंबू में जिंदगी जी रहे हैं! हमेशा के झूठेपन की वजह से प्रधानमंत्री मोदी बेनकाब हो गए हैं। उनका तंबू उखड़ जाएगा, ऐसा वातावरण देश में है!

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