" /> मीडिया कर्मियों को फ्रंटलाइन वॉरियर्स न मानने की भूल?

मीडिया कर्मियों को फ्रंटलाइन वॉरियर्स न मानने की भूल?

इसमें कोई दो राय नहीं कि मीडिया कर्मियों को कोरोना का प्रâंटलाइन वॉरियर्स न मानना सरकार की बड़ी भूल रही है? केंद्र सरकार के लिए टीवी एंकर रोहित सरदाना की मौत, पीछे एक ऐसा सवाल छोड़ गई है, जिसका जवाब दे पाना शायद मुश्किल होगा? सवाल ये कि आखिर सरकार ने मीडिया कर्मियों को प्रâंटलाइन वॉरियर्स से बाहर क्यों रखा? क्यों उनके योगदान को कमतर आंका? क्यों उन्हें वैक्सीन की डोज देना मुनासिब नहीं समझा? ऐसे कई सवाल हैं, जो जवाब मांग रहे हैं। वैक्सीनेशन के तरीकों में जो खामियां रहीं उनका खामियाजा सबसे ज्यादा हमारे पत्रकार साथियों को उठाना पड़ा। जबकि पत्रकार पहले दिन से मोर्च पर थे, कोरोना के संभावित संक्रमित क्षेत्रों में जैसे अस्पतालों, कोविड अधिकृत क्षेत्रों, चुनावी सभाओं-रैलियों, कुंभ आयोजन की कवरेज व भीड़-भाड़वाली जगहों से अपनी जान को जोखिम में डालकर रिपोर्ट करना। जिसका नतीजा ये निकला कि कोविड काल में भारी तादाद में पत्रकारों की बलि चढ़ गई।
पत्रकारों की मौत का सिलसिला तेजी से जारी है। रोजाना किसी-न-किसी मीडिया संस्थान से किसी-न-किसी पत्रकार के न रहने की खबरें सुनने को मिल रही हैं। रोहित सरदाना बड़े मीडिया संस्थान से ताल्लुक रखते थे इसलिए उनके निधन की खबर आग की तरह पैâली, राष्ट्रपति से लेकर प्रधानमंत्री, गृहमंत्री सभी ने दुख प्रकट किया। लेकिन रोहित के अलावा उन सैकड़ों पत्रकारों को कोई पूछता नहीं है, जो कोरोना से अपनी जान गवां रहे हैं। दिल्ली के कई नामचीन पत्रकार कोरोना की भेंट चढ़ चुके हैं। दरअसल, दिल्ली के हालात हैं भी अच्छे नहीं? कोरोना ने बीते दो सप्ताह से कहर मचाया हुआ है। चारों तरफ चीखें सुनाई दे ही हैं। सड़कों पर सन्नाटा छाया हुआ है सिर्फ एंबुलेंस के सायरनों की आवाजें ही सुनाई पड़ती हैं। माहौल किसी डरावनी हॉरर मूवी की तरह हो गया है। लोग इस कदर डर चुके हैं कि अब शहर छोड़कर दूसरी जगहों पर पनाह लेने लगे हैं।
राजधानी में अन्य प्रांतों के रहनेवाले लोगों के शहर छोड़ने का सिलसिला जारी है। वहां इस समय दूसरे सप्ताह का लॉकडाउन जारी है। जब पहले सप्ताह लॉकडाउन लगा था, तभी लोगों ने पलायन करना शुरू कर दिया था। कह सकते हैं स्थिति इस वक्त वुहान से भी बदतर हो चुकी है। समूचा दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र त्रासद काल में गोते लगा रहा है। लॉकडाउन के दौरान भी रोजाना पच्चीस हजार से ज्यादा संक्रमण के केस निकल रहे हैं। जबकि मौत पर सरकार का अधिकृत आंकड़ा पौने चार सौ के आसपास रह रहा है। श्मशान घाटों में शवों के अंतिम संस्कार के लिए कतारें लगी हैं। अंतिम संस्कार के लिए टोकन वितरण किए जा रहे हैं। सुबह पहुंचने वाले शवों का नंबर शाम ढलने के बाद आता है। ऐसी त्रासदी शायद किसी ने सपने भी नहीं देखी होगी। संक्रमण और मौत के आंकड़ों को देखकर दिल्लीवासी इस समय सहमे हुए हैं। अस्पतालों में बेड्स, ऑक्सीजन, दवा आदि सुविधाएं नदारद हैं। संकट की इस घड़ी में न कोई नेता काम आ रहा है और न कोई अधिकारी।
गौरतलब है कि कोविड-१९ और कोविड-२१ में खासा अंतर है। पहले दौर में सरकार ने उन लोगों को प्रâंटलाइन कोरोना वॉरियर्स माना जो मैदान में थे, उनमें पत्रकारों को छोड़ दिया। जबकि पत्रकार सबसे अग्रणी थे, बावजूद इसके उनके योगदान को नकारा गया और उन्हें प्रâंटलाइन वॉरियर्स नहीं माना? यही कारण है कि कोरोना के खूनी कहर में पत्रकार बड़ी तादाद में हताहत हो रहे हैं। कोई ऐसा दिन नहीं जाता, जब किसी-न-किसी पत्रकार की मौत न हो रही हो। कोई महानगर, शहर, कस्बा ऐसा नहीं, जहां से पत्रकारों के निधन की खबरें न आ रही हों। पत्रकार साथियों की मौत की खबर देखकर सिस्टम पर गुस्सा आता है। अपने साथियों को बचाने के लिए हम कुछ कर भी नहीं पा रहे। समूचे हिंदुस्थान में भय और मातम का तांडव है। सहारा समय की एंकर निकिता सिंह तोमर का भी बीतों दिनों निधन हो गया। उन्हें समय पर इलाज नहीं मिला, जिससे उनकी जान चली गई। वेंटिलेटर की जरूरत थी लेकिन जब तक इंतजाम हुआ, बहुत देर हो चुकी थी। वहीं जनता टीवी एंकर साकेत सुमन, वीडियो जर्नलिस्ट मनोज सिंह भी कोरोना की भेंट चढ़ गए।
उत्तर प्रदेश में बड़े स्तर पर पत्रकारों की मौत हो रही है। इसके अलावा बिहार, महाराष्ट्, मध्यप्रदेश आदि प्रदशों के पत्रकार भी अपना फर्ज निभाते-निभाते मौत को गले लगा रहे हैं। इंडिया न्यूज के संपादक राणा यशवंत कुछ दिनों से कोरोना से आहत लोगों की जान बचाने के लिए मुहिम छेड़े हुए हैं। पत्रकारों व आम लोगों की सेवा के लिए अस्पताल, बेड्स व ऑक्सीजन मुहैया कराने की कोशिशों में लगे हैं। खुद बताते हैं कि पत्रकारों के घर में बैठकर खुद को बचाने की गुंजाइश उनके पास नहीं होती या शायद वह ऐसा चाहते भी नहीं? जो लोग टीवी या अखबारों में काम करते हैं उनको यह बात ठीक से समझ में आएगी कि चाहे वह सेटकॉम में बैठा साथी हो या मैदान पर काम करता रिपोर्टर, सबका जोखिम कमोबेश एक जैसा है। आप घर से बाहर निकलते हैं और खतरे के दायरे में आ जाते हैं। आपकी जिंदगी वहीं से मौत से खेलने लगती है। काम के दौरान तमाम एहतियात बरतने के बावजूद आपके सिर पर खतरा मंडराता रहता है। रोजाना आपके साथी पॉजिटिव होते रहते हैं और आप अपने धराशायी होने तक काम करते रहते हैं। चारों ओर कोहराम-सा है लेकिन पत्रकार जो बचा है, वह डटा है।
बातचीत में उन्होंने बताया कि इस दौर में जब इंसान घर के अंदर भी मौत के आतंक से दहला हुआ है, उस समय जो लोग निकलकर अपना काम पूरी शिद्दत से कर रहे हैं, दरअसल वे जिगर वाले लोग हैं। उनका दूसरा कोई इम्तिहान हो ही नहीं सकता। उनके लिए इससे बड़ा कोई और सर्टिफिकेट भी नहीं। ये सारे लोग मौत की आंख में आंख डालकर काम करते हैं। लेकिन हैरत इस बात पर है कि सरकार ने जब प्रâंट वॉरियर्स तय किए तो उसमें पत्रकारों को क्यों नहीं रखा? वैक्सीन जिनको उम्र की सीमा के बगैर लगनी थी उनमें पत्रकार नहीं थे। डॉक्टर, नर्सिंग स्टाफ, सफाईकर्मी, पुलिसवाले वगैरह तो उस दायरे में आए लेकिन जो तबका दिन-रात सड़क पर रहा, अस्पतालों के बाहर, लोगों के बीच रहा, उसको हाशिए पर डाल दिया गया। यह एक तरह की अमानवता और नाइंसाफी है। हुकूमतें ऐसा हमेशा से करती आई हैं, जब पत्रकार बिरादरी को उन्होंने महज एक हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया हो। बावजूद इसके पत्रकारों ने कभी किसी जोखिम या खतरे की परवाह नहीं की। पत्रकार सुविधाओं के लिहाज से हमेशा हाशिए पर रहे। उनके जीवन बीमा, स्वास्थ्य बीमा, यात्रा सुविधा जैसी सहूलियतों पर भी मुकम्मल रूप से सरकारों ने कभी खयाल नहीं रखा। प्रâंट वॉरियर्स मानना तो दूर की बात है।
(लेखक राष्ट्रीय जन सहयोग एवं बाल विकास संस्थान, भारत सरकार के सदस्य, राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार हैं।)