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कर्ज के ‘मर्ज’ में डूब रही है मोदी सरकार! …सरकारी कर्ज जीडीपी को कर सकता है पार

• अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ने हिंदुस्थान को दी चेतावनी

इस समय मोदी सरकार देश की अर्थव्यवस्था के ४ ट्रिलियन डॉलर की होने का ढिंढोरा पीट रही है। ऐसा लग रहा है मानो देश में पैसे की कोई कमी नहीं है और देश की अर्थव्यवस्था पटरी पर सरपट दौड़ रही है। मगर हकीकत इससे बिल्कुल उलट है। सरकार अपना खर्च चलाने के लिए कर्ज पर कर्ज लेती जा रही है। न सिर्फ केंद्र सरकार बल्कि कई राज्यों की सरकारों ने भी खूब कर्ज लिया है। ऐसे में कर्ज चुकाने की बात तो दूर है, उसका ब्याज चुकाने में ही सरकार को पसीना छूट रहा है। अब इस मामले पर आईएमएफ (अंतर्राष्ट्रीय मुद्र कोष) ने भी मोदी सरकार को चेतावनी दी है। आईएमएफ का कहना है कि हिंदुस्थान के ऊपर कर्ज के जोखिम का खतरा मंडरा रहा है। इसके साथ ही कुल सरकारी कर्ज जीडीपी के १०० फीसदी से पार जा सकता है। ऐसे में हिंदुस्थान के ऊपर आर्थिक बोझ काफी बढ़ जाएगा।
दरअसल, आईएमएफ ने हिंदुस्थान को चेतावनी दी है कि केंद्र और राज्यों को मिलाकर देश का सामान्य सरकारी ऋण मध्यम अवधि में ‘जीडीपी’ के १०० फीसदी से ऊपर पहुंच सकता है। उसने चेतावनी देते हुए कहा है कि लंबी अवधि में कर्ज चुकाने में दिक्कत भी हो सकती है, क्योंकि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लक्ष्य हासिल करने में देश को बहुत निवेश करना होगा। मगर केंद्र सरकार मानती है कि सरकारी ऋण से जोखिम काफी कम है, क्योंकि ज्यादातर कर्ज हिंदुस्थानी रुपए में ही है। उधर आईएमएफ का कहना है कि हिंदुस्थान विदेशी मुद्रा में हस्तक्षेप भी करता है। इस पर आरबीआई का जवाब है कि मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप का मकसद अत्यधिक उतार-चढ़ाव को रोकने का है। हिंदुस्थान की अर्थव्यवस्था पर टिप्पणी करते हुए आईएमएफ ने अपने वार्षिक परामर्श रिपोर्ट में कहा है कि लंबी अवधि का जोखिम बहुत अधिक है, क्योंकि हिंदुस्थान को जलवायु परिवर्तन से निपटने के लक्ष्य तक पहुंचने और जलवायु पर दबाव से उबरने की क्षमता बढ़ाने में बहुत निवेश करना होगा। इसके लिए रकम के नए और रियायती स्रोत ढूंढने होंगे तथा निजी क्षेत्र का निवेश भी बढ़ाना होगा।’ बता दें कि यह रिपोर्ट आईएमएफ के सदस्य देशों की सहमति वाली निगरानी प्रक्रिया का हिस्सा है।’ हालांकि आईएमएफ में हिंदुस्थान के कार्यकारी निदेशक केवी सुबमण्यन इससे सहमत नजर नहीं आते। उनका कहना है कि आईएमएफ का यह दावा अतिशयोक्ति जैसा है कि मध्यम अवधि में ऋण जीडीपी के १०० फीसदी से अधिक पहुंचने का खतरा है। सरकारी कर्ज पर बहुत कम जोखिम है, क्योंकि ज्यादातर कर्ज स्थानीय मुद्रा में हैं। बीते दो दशकों में विश्व अर्थव्यवस्था को लगे झटकों के बावजूद हिंदुस्थान का सरकारी ऋण और जीडीपी का अनुपात २००५-०६ के ८१ फीसदी से बढ़कर २०२१-२२ में ८४ फीसदी हुआ और २०२२-२३ में वापस घटकर ८१ फीसदी हो गया।
गौरतलब है कि आईएमएफ ने कहा था कि हिंदुस्थानी रुपए और अमेरिकी डॉलर की विनिमय दर अक्टूबर २०२२ व अक्टूबर २०२३ के बीच बहुत छोटे दायरे में रही। इसका मतलब है कि केंद्रीय बैंक ने बाजार की स्थिति संभालने के लिए विदेशी मुद्रा के साथ शायद जरूरत से ज्यादा दखल दे दिया। इसके जवाब में भारत सरकार ने कहा आईएमएफ का यह विश्लेषण ठीक नहीं है और उचित मानदंडों पर आधारित नहीं है। उसने कहा कि विश्लेषण के लिए अवधि का चयन मनमाने ढंग से किया गया है। दूसरी तरफ आरबीआई ने भी अपने अंदाज में आईएमएफ को जवाब दे दिया है। रिजर्व बैंक ने इस आकलन से भी तगड़ी असहमति जताई कि बाजार को संभालने के लिए जरूरी स्तर से भी अधिक विदेशी मुद्रा हस्तक्षेप किया गया होगा। इस मामले में सुब्रह्मण्यन का कहना है कि विश्लेषण का दायरा बढ़ा दिया जाए तो रुपए और डॉलर की विनिमय दर में उतार-चढ़ाव निर्धारित मार्जिन से अधिक हो जाता है।

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