मुख्यपृष्ठस्तंभनाम गुम जाएगा... चल पड़ता है नामकरण समारोहों का सिलसिला!

नाम गुम जाएगा… चल पड़ता है नामकरण समारोहों का सिलसिला!

विमल मिश्र
मुंबई

चुनाव पास आते ही जानी -मानी शख्सियतों के नाम पर सड़कों, गलियों और नाकों के नामकरण या नामांतरण के प्रस्ताव धड़ा-धड़ रखे जाने लगते हैं। राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई के बीच नामकरण तल्ख मुद्दा बन जाता है। ऐसे में कई बार हास्यास्पद गलतियां हो जाती हैं।

चुनाव जैसे ही पास आते हैं, उसका फायदा उ’ाने के लिए जानी-मानी शख्सियतों के नाम पर सड़कों, गलियों और नाकों के नामकरण या नामांतरण के प्रस्ताव धड़ा-धड़ रखे जाने लगते हैं। यह तांता तब तक चलता है, जब तक चुनाव की तारीखों की घोषणा नहीं हो जाती और आचार संहिता राजनीतिज्ञों और उनके दलों के हाथ नहीं बांध देती। मुंबई मनपा ढेरों प्रस्तावों को हरी झंडी दिखाती है और नामकरण समारोहों का सिलसिला चल पड़ता है। सिफारिशें देने में कोई भी पीछे नहीं रहता। कुछ वर्ष पहले तो कुछ उदारमना नगरसेवकों ने पुलिस के जासूसी कुत्ते ‘जंजीर’ के नाम पर एक सड़क के नामकरण का प्रस्ताव भी मनपा के सामने रख दिया था। कुछ वर्ष पहले गिरगांव चौपाटी का नाम लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के सम्मान में ‘स्वराज भूमि’ रखने की तैयारी हुई थी पर यह हुआ नहीं। पूर्व शिवसेना विधायक अरविंद नेरकर का कहना है, ‘लोकमान्य तिलक हमारे लिए भी आदरणीय हैं, पर लोगों के जेहन में तो ‘गिरगांव चौपाटी’ नाम ही है। उसके नाम का संरक्षण तो होना ही चाहिए।’ नामकरण के लिए चले आंदोलन के प्रमुख लोकमान्य तिलक स्वराज्य भूमि स्मारक समिति के अध्यक्ष प्रकाश सिलम क्षुब्ध होकर बताते हैं, ‘यह नामकरण लोकमान्य बालगंगाधर तिलक के बलिदान को श्रद्धांजलि होता। पर, पार्टियों को तो केवल वोटों की चिंता है!’
सिलम की यह शिकायत आज आम है और इसकी जिम्मेदार केवल स्थानीय निकाय ही नहीं, सरकारें भी हैं। दरअसल, नामकरण में भौगोलिक और सांस्कृतिक आवश्यकता से ज्यादा राजनीतिक प्रतिबद्धताओं का रोल हो गया है। अब स्टेशनों, सड़कों और हवाई अड्डों के ही नाम नहीं बदलते, हर आने वाली सरकार महत्वपूर्ण संस्थाओं और सरकारी योजनाओं के नाम भी बदल देती है।
उपनिवेशी नामों वाले लैंडमार्क स्थानों के नाम बदलने का जो सिलसिला चला है, उसने इतिहासकारों को भी नाराज कर दिया हैं। मसलन, ‘गेटवे ऑफ इंडिया’ का नाम ‘भारत द्वार’ करने की फरमा‌‌इश। एक मुंबई प्रेमी नागरिक का कहना है कि ‘ब्रिटिश काल के नामों को हटाकर क्या हम अपने ही इतिहास को मिटाने का काम नहीं कर रहे? कुछ साल पहले माहिम के बॉम्बे स्कॉटिश स्कूल के एक चौराहे का नाम १९८६ के विमान अपहरण कांड की नायिका नीरजा भनोट के नाम पर रखा गया। बाद में पता चला कि घाटकोपर में इस नाम का चौक पहले से ही है। हालांकि, एक ही व्यक्ति के नाम पर दो नामकरण नहीं होने चाहिए, ऐसा कोई नियम नहीं है। ऐसे नामकरणों में शर्त बस, इतनी है कि ये दोनों चौक एक ही जगह नहीं होने चाहिए। मुंबई का पुराना डिवेलपमेंट प्लान-जिसे व्यापक विरोध के बाद रद्द कर दिया गया-उसमें अन्य विसंगतियों के साथ मुंबई के प्रचलित नामों में गड़बड़ी पाई गई थी। मसलन, असल्फा को ‘असाल्पे’ और अंबोली को ‘अंबावली’, बना दिया गया है। कुछ गलतियां तो हास्यास्पद हैं। मसलन, विले पार्ले की चर्च रोड को जुहू में दिखा दिया गया था और चकाला की कार्डिनल ग्रेशियस रोड को विले पार्ले (पूर्व) में। मनपा इस तरह की गलतियों का ठीकरा ठेकेदारों पर फोड़कर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेती है। दूसरी ओर कुछ नामकरण ऐसे हैं, जिन पर मनपा को शाबासियां मिलनी चाहिए। मसलन, भोईवाड़ा से दादर-पूर्व को जोड़ने वाली सड़क का नाम हिंदुस्थान को ओलंपिक का पहला वैयक्तिक पदक दिलाने वाले जाने-माने पहलवान खाशाबा जाधव के नाम पर रखना।
नामांतर की मांग
मलबार‌ हिल : ‘राम नगरी’। जहां राम और लक्ष्मण आए थे।
चर्चगेट : ‘सी. डी. देशमुख’ -अर्थशास्त्री और भारतीय रिजर्व बैंक के पहले गवर्नर के नाम पर।
ग्रांट रोड : ‘अगस्त क्रांति’ या ‘गांव देवी’।
रे रोड : ‘घोड़पदेव’।
करी रोड : ‘लाल बाग’ होने के कारण
दादर : ‘चैत्यभूमि’ होने की वजह से।
खार : ‘विवेक नगर’।
माटुंगा : ‘मरुबाई’ – स्थानीय देवी स्थान के नाम पर।
बांद्रा टर्मिनस : सूफी संत ‘मखदूम माहिमी’ के नाम पर।
कोपरखैरणे : ‘धीरुभाई अंबानी’ के नाम पर।
मुंबई में इस बीच कुछ नए स्टेशनों की भी गूंज होने लगी है। भायखला और सैंडहर्स्ट रोड स्टेशनों के बीच ह्यूम स्कूल और जे. जे. हॉस्पिटल के बीच रिचर्डसन और क्रुडास कंपनी की जगह पर मदनपुरा नामक स्टेशन कायम करने की मांग ने भी जोर पकड़ा है। इस स्टेशन के पीछे तर्क है भिंडी बाजार, मदनपुरा और नागपाड़ा जैसे भीड़-भाड़ वाले इलाकों को ट्रैफिक की समस्या से निजात दिलाना। मुलुंड और ‘ाणे के बीच नया स्टेशन (प्रस्तावित नाम ‘श्री स्थानक’) अगले वर्ष के अंत तक खोलने की पूरी तैयारी है। रेलवे के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, ‘नाम बदलने में हमारी कोई भूमिका नहीं होती। इसका निर्णय राज्य सरकार और गृह मंत्रालय के ऊपर होता है।’
यह है नामकरण की प्रक्रिया
मुंबई में नामकरण के प्रस्तावों की एक निर्धारित प्रक्रिया है। नामकरण का प्रस्ताव प्रभाग समिति के बाद स्थापत्य समिति से पास होते हुए यह मनपा सभागृह में जाता है, जहां इसे मंजूरी मिलनी जरूरी होती है। प्रक्रिया आगे बढ़ती है जब इस पर कमिश्नर के रिमार्क आ जाएं। भारत सरकार के सर्वेयर जनरल के कार्यालय को आम तौर पर नाम बदलने की २० से २५ अर्जियां हर साल मिलती हैं। इनमें सबसे ज्यादा रेलवे स्टेशनों के नाम बदलने की होती हैं। प्रस्ताव राज्य विधान मंडल के पास भेजा जाता है। यहां प्रस्ताव पारित होने के बाद केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय को भेजा जाता है। यह केंद्र सरकार पर है कि वह यह प्रस्ताव पारित करे या नामंजूर कर दे। (समाप्त)
(लेखक ‘नवभारत टाइम्स’ के पूर्व नगर
संपादक, वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं।)

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