मुख्यपृष्ठस्तंभजिस कलम से चड्डी भी गुलजार हो गई

जिस कलम से चड्डी भी गुलजार हो गई

कविता श्रीवास्तव

‘नाम गुम जाएगा, चेहरा ये बदल जाएगा… मेरी आवाज ही पहचान है…’
इस गीत में लता मंगेशकर की आवाज है, जिन्हें पहचान की कोई आवश्यकता नहीं है। लेकिन इस गीत को रचने वाले गुलजार की पहचान भी कम नहीं है। जादुई असर करने वाले शब्दों को गूंथकर अपनी कलम से हमेशा ही कुछ अद्भुत रचने वाले कलमकार गुलजार को कौन नहीं जानता? मन के भावों और मानवीय संवेदनाओं को व्यक्त करने की लेखन कला को अपनी पहचान बनाने वाले गुलजार ने फिल्म, साहित्य और सामाजिक मंचों को हमेशा ही सुशोभित बाग की भांति गुलजार ही किया है। आंतरिक संवेदनाओं और अनुभूतियों को शब्द देती अनगिनत रचनाएं जिनकी विशिष्ट पहचान हैं वह प्रतिष्ठित कलमकार हैं गुलजार। वर्ष २०२३ का प्रतिष्ठित ज्ञानपीठ पुरस्कार हाल ही में गुलजार को देने की घोषणा की गई है। गुलजार देश के अत्यंत ही लोकप्रिय कवि-गीतकार, पटकथा लेखक, फिल्म निर्देशक, नाटककार और शायर हैं। उनकी रचनाएं हिंदी और उर्दू में हैं। लेकिन उनके लेखन में पंजाबी, खड़ी बोली, ब्रजभाषा, राजस्थानी, हरियाणवी में भी है। उनके लेखन का ही कमाल है कि पुरस्कार गुलजार के पीछे चलते उन तक पहुंच जाते हैं। उन्हें वर्ष २००२ में सहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। २००४ में भारत सरकार का तीसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्मभूषण उन्हें मिला। वर्ष २००९ में डैनी बॉयल निर्देशित फिल्म स्लमडॉग मिलियनेयर में उनके लिखे गीत ‘जय हो…’ के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ गीत का ऑस्कर पुरस्कार मिला। इसी गीत के लिए उन्हें ग्रैमी पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। गुलजार साहब को फिल्मफेयर ने अनेक बार सर्वश्रेष्ठ गीतकार का पुरस्कार दिया। वर्ष २०१३ में दादासाहेब फालके सम्मान से गुलजार नवाजे गए।
पंजाबी परिवार में जन्मे गुलजार का असली नाम संपूरण सिंह कालरा है। उनका जन्म जहां हुआ वह जगह अब पाकिस्तान में है। बंटवारे के बाद उनका परिवार अमृतसर आ गया। लेकिन गुलजार साहब मुंबई चले आए। वर्ली के एक गैरेज में वे मैकेनिक बने। खाली समय में किताबें पढ़ने से लिखने की प्रेरणा मिली। अपनी रचनाएं गुलजार नाम से वे लिखने लगे। कोशिशें कीं तो फिल्म इंडस्ट्री में उन्हें बिमल रॉय, हृषिकेश मुखर्जी और हेमंत कुमार जैसे नामी निर्देशकों के सहायक के तौर पर काम मिला। बिमल रॉय की फिल्म ‘बंदिनी’ के लिए गुलजार ने पहली बार गीत लिखा। उसके बाद उनकी कलम लिखती ही गई।
शायरी उनका पहला प्यार है। उन्होंने पहला फिल्मी गीत ‘मोरा गोरा अंग लई ले’ लिखा तो वे बहुत ज्यादा उत्सुक नहीं थे, लेकिन फिर गाने लिखने का मौका मिलता गया और वे लिखते गए। ‘इस मोड़ से आते हैं कुछ सुस्त कदम रस्ते’, ‘मुसाफिर हूं यारों’, ‘आने वाला पल जाने वाला है’, ‘मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास है’ से लेकर ‘कजरारे-कजरारे’ और ‘बीड़ी जलई ले’ जैसे गाने गुलजार के लेखन का ही कमाल हैं।
निर्देशक के रूप में उनकी पहली फिल्म थी १९७१ में आई ‘मेरे अपने’। इससे पहले आशीर्वाद’, ‘आनंद’, ‘खामोशी’ और अन्य फिल्मों के लिए उन्होंने संवाद और पटकथा लिखे।
१९७२ में संजीव कुमार और जया भादुड़ी अभिनीत ‘कोशिश’ के लिए संजीव कुमार को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला।
इसके बाद गुलजार ने संजीव कुमार के साथ ‘आंधी’, ‘मौसम’, ‘अंगूर’ और ‘नमकीन’ निर्देशित की।
अभिनेत्री राखी से विवाह करने वाले गुलजार की बेटी मेघना भी नामी फिल्म निर्देशक हैं। राखी और गुलजार ने तलाक नहीं लिया है पर वे लंबे समय से अलग रहते हैं।
गुलजार साहब जिंगल्स और टाइटल गीत में भी कलम का जलवा दिखाते रहे हैं। बच्चों के लिए बने दूरदर्शन के सीरियल ‘द जंगल बुक’ का टाइटल गीत ‘जंगल-जंगल बात चली है, पता चला है, चड्डी पहन के फूल खिला है’ गुलजार की कलम से रची गई। चड्डी शब्द पर आपत्ति उठी तो गुलजार साहब नहीं माने और बाद में यही ‘चड्डी’ सुपरहिट सिद्ध हुई। चश्मा लगाए प्रसन्नताभरे चेहरे, खनकते स्वर और कुर्ता-पायजामा की गरिमामय पोशाक में दिखने वाले सादगी के धनी गुलजार साहब को ज्ञानपीठ पुरस्कार मिलना कलम की संजीदगी और भावनाओं की जिंदादिली का सम्मान है। जिंदगी की उम्मीद को लेकर आगे बढ़ने का हौसला देने वाले गुलजार साहब का अभिनंदन उन्हीं के शब्दों के इस भाव के साथ…
‘दिन ढले जहां, रात पास हो
जिंदगी की लौ ऊंची कर चलो
याद आए गर कभी जी उदास हो
मेरी आवाज ही पहचान है…’

 

 

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