मुख्यपृष्ठस्तंभराजधानी लाइव : बुलडोजर नीति का राजनीति शास्त्र?

राजधानी लाइव : बुलडोजर नीति का राजनीति शास्त्र?

डाॅ. रमेश ठाकुर।  बुलडोजर ने इस वक्त अच्छा खासा खौफ का माहौल बनाया हुआ है, विशेषकर उत्तर प्रदेश में जहां अपराधी खुद थाने पहुंचकर सरेंडर कर रहे हैं। जिला आंबेडकर नगर में गैंगरेप के पांच आरोपी खुद थाने पहुंचकर अपनी गिरफ्तारी देते हैं। बुलडोजर का इस्तेमाल अब न सिर्फ उत्तर प्रदेश में हो रहा है, बल्कि राजधानी दिल्ली में भी खलबली मचाई हुई। इसके अलावा मध्य प्रदेश, राजस्थान व उत्तराखंड में भी इसका जोर है। सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल बुलडोजर पर रोक लगा दी है। वजहें कई हैं, अव्वल तो यही है, कि बिना कोर्ट के आदेश से अनैतिक तौर पर बुलडोजर का इस्तेमाल गैर जरूरी कार्यों में न किया जाए। कोर्ट ने यह संज्ञान दिल्ली के जहांगीरपुरी हिंसा को लेकर लिया। पिछले सप्ताह हिंसाग्रस्त क्षेत्र में एमसीडी ने अवैध कब्जे को लेकर बुलडोजर से कार्यवाही की, जिस पर वृंदा करात ने विरोध जताया और चलते बुलडोजर के सामने खड़ी हो गर्इं। कई घंटों वहां राजनीतिक ड्रामा होता रहा। लेकिन बुलडोजर जब रुका तो उससे पहले कई लोगों के अरमानों को तहस-नहस कर चुका था। खोके, स्टॉन, ढाबे, छोटी-छोटी दुकानों को तोड़ चुका था।
दिल्ली हिंसा का बुनियादी सवाल खोजना अभी बाकी है? सवाल है कि क्या हिंसा सुनियोजित थी? या फिर ये ट्रेलर मात्र है, पिक्चर अभी शेष है? या इसकी नींव राजनीतिक स्वार्थ को ध्यान में रखकर राजनैतिक शास्त्र ने रखी। ऐसे कुछ सवाल हैं, जो घटना थमने के बाद दिल्लीवासियों के जेहन में उठ रहे हैं। सवाल उठने भी चाहिए, आखिर ऐसा क्या है जो किस्तों में कुछ अंतराल के बाद राजधानी में ऐसे फसाद होते रहते हैं। और तब तो और जब चुनावों की सुगबुहाटें होने लगती हैं। कुछ समय बाद दिल्ली में एमसीडी चुनाव होने भी हैं। इसलिए कड़ियां आपस में काफी हद तक मेल खाती भी हैं? खैर, ये तो आम इंसान के लिए सारे काल्पनिक अंदेशें मात्र हैं, जो होना होता है वो क्षण में हो ही जाता है। कमोबेश, वैसा हो भी रहा है। लेकिन हिंसा के राजनीतिक शास्त्र को अब आम जनता को बुनियादी रूप से समझने की जरूरत है।
राजधानी की हिंसा सुनियोजित थी या नहीं? ये सवाल पुलिस पर छोड़ देते हैं। पर, दूसरे सवाल हमें खुद में खोजने होंगे? कौन है जो सौहार्दपूर्ण माहौल में जहर घोल रहा है। १६ अप्रैल की शाम को जब दिल्ली में हिंसा हो रही थी, उसी वक्त सोशल मीडिया पर दो बेहद खूबसूरत तस्वीरें हम सबको दिख रही थी, जिसमें हनुमान जन्मोत्सव के दौरान मुस्लिम समुदाय के लोग रैली में शामिल लोगों पर फूल बरसा रहे थे, कोल्ड ड्रिंक और पानी की बोतलों का वितरण कर रहे थे। वो तस्वीरें उत्तर प्रदेश के शामली और नोएडा की हैं। शामली में हिंदू-मुस्लिम भाईचारा कई समय बाद दिखा। दरअसल हमें ऐसा ही तो हिंदुस्थान चाहिए, जो आजादी से पहले था, जब एक ही थाली में सभी धर्म के लोग खाना खाते थे। पर, अब न जाने किसकी नजर लग गई है। दोनों धर्म के लोग एक-दूसरे के खून के प्यासे हुए पड़े हैं।
घटना वाला इलाका जहांगीरपुरी दिल्ली का ऐसा आवासीय क्षेत्र है, जहां बेहद गरीब तबके लोग रहते हैं। दिहाड़ी-मजदूरी करके अपना पेट पालते हैं, उन्हें राजनीति, दंगा-फसादों से कोई मतलब नहीं लेकिन हनुमान जन्मोत्सव के दिन लोगों ने उन्हें उकसाकर ये कारनामा कर दिया। जहां हिंसा हुई, वहां दोनों तरफ आमने-सामने मंदिर और मस्जिद हैं, हिंदू-मुसलमान आपस में प्यार से रहते हैं। एक-दूसरे के बनी-बिगड़ी और सुख-दुख में साथी होते हैं, आपस में हाथ बंटाते हैं। किसी तरह की कोई आज तक दिक्कतें नहीं हुर्इं। घटना वैâसे हुई, इस बात को वहां के लोग समझ नहीं पाए हैं, आखिर ये हुआ वैâसे? हिंसक घटना के बाद से समूचा इलाका भयभीत है। हर तरह के काम धंधे बंद हैं, पुलिस ने सबको घरों में वैâद किया हुआ है। सुरक्षा की दुष्टि से कोई कहीं आ-जा न सके इसके लिए केंद्र सरकार ने इलाके को छावनी में तब्दील कर धारा १४४ लगा दी है। गलियों के गेट पर ताला जड़ दिया है। स्कूल, प्रतिष्ठान, दुकानें, बाजारें सब बंद पड़ी हैं। लोग घरों में सहमे हुए हैं।
बहरहाल, घटना के पीछे किसका समाजशास्त्र था, उसकी तस्वीर अब दिखने लगी है। हिंसा को लेकर जमकर सियासत होनी शुरू गई है। पक्ष-विपक्ष की ओर से आरोप-प्रत्यारोप का दौर चल पड़ा है। जबकि इस वक्त सिर्फ और सिर्फ समाधान की बात होनी चाहिए। पर, नहीं, लोग अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने की फिराक में हैं। कोई एक दल नहीं, बल्कि सभी पार्टियां मौके का फायदा उठाना चाहती हैं। लेकिन धरातल पर अंदरूनी खाने राजधानी के हालात अच्छे नहीं हैं। इसके बाद भी कुछ अंदेशें ऐसे दिखते हैं जो सुखद नहीं? आगे भी हालात बिगड़ते नजर आते हैं। ये तय है कि जो हिंसा हुई, वह अचानक से घटने वाली घटना नहीं थी, बल्कि उसकी पटकथा पहले ही लिखी गई थी। इलाके के कई लोग तो खुलेआम बोल ही रहे हैं कि अगर पुलिस सतर्क होती तो घटना होती भी नहीं? प्रत्यक्षदर्शी बताते हैं जब लोग हिंसक हो रहे थे, तब पुलिसकर्मी तमाशबीन बने हुए थे। लोगों के हाथों में धारदार हथियार थे, पत्थर थे। फसाद की जड़ तक जाने की जरूरत है। घटना की जांच में तीन टुकड़ियां लगी हैं। ड्रोन कैमरे भी लगे हैं जिन घरों से पथराव शुरू हुआ, उनकी जांच हो। हर एंगल से जांच की जाए। ईमानदारी और राजनीतिक चश्मे के बिना कड़ाई से जांच होगी, तभी प्रत्येक वर्ष होने वाले दंगों से राजधानी मुक्त हो पाएगी।
(लेखक राष्ट्रीय जन सहयोग एवं बाल विकास संस्थान, भारत सरकार के सदस्य, राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार हैं।)
(उपरोक्त आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं। अखबार इससे सहमत हो यह जरूरी नहीं है।)

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