मुख्यपृष्ठसंपादकीयरोखठोकचंद्रमा पर स्थित असली स्वर्ग! लेह-लद्दाख का आत्मनिर्भर भारत!

चंद्रमा पर स्थित असली स्वर्ग! लेह-लद्दाख का आत्मनिर्भर भारत!

हमारा देश कैसा है, हिमालय भव्य क्यों है, यह जानना होगा तो हर किसी को कम-से-कम एक बार लेह-लद्दाख की धरती पर आना ही चाहिए। सीमा पर चीन है। चीन लद्दाख में घुस आया है, परंतु लद्दाख की जनता ने अभी भी संयम नहीं छोड़ा है। लद्दाख की जनता पूरी तरह से हिंदुस्थान के साथ है। आत्मनिर्भर हिंदुस्थान की आत्मा लद्दाख की भूमि पर हिमालय के कण-कण में बसती है। लद्दाख के प्रत्यक्ष दौरे पर आधारित रोखठोक।

संजय राऊत – कार्यकारी संपादक। सोमवार से गुरुवार तक लद्दाख की शांत और आध्यात्मिक भूमि पर था। हमारा देश विविधता से भरा हुआ है, ऐसा हम कहते हैं। तब एक भारतीय होने के नाते हमारे कदम लद्दाख की धरती पर पड़ने ही चाहिए। अगर कश्मीर, हिंदुस्थान का नंदनवन है तो लेह-लद्दाख, चांद पर का असली स्वर्ग है। उस स्वर्ग में घूमते हुए हम कुछ देर के लिए अपनी चिंताओं और परेशानियों को भूल जाते हैं। देश में क्या दुनिया में कहीं भी इतनी शांति नहीं है। यह चीन की सीमा से लगा हुआ क्षेत्र है। इस क्षेत्र पर हमेशा चीनी ड्रैगन की टेढ़ी नजर रहती है। फिर भी वहां शांति है। आज केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख के ३८ हजार वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र पर चीन ने अवैध रूप से कब्जा कर लिया है। चीन ने जैसे तिब्बत को निगल लिया, उसी तरह लद्दाख को भी निकलना चाहता है। लेकिन लद्दाख की देशभक्त जनता के कारण चीन के लिए यह संभव नहीं है। चीन की सेना गलवान घाटी में घुस गई, जहां उनका भारतीय सेना से टकराव हुआ। कर्नल बाबू सहित हमारे ४० सैनिक इस झड़प में शहीद हो गए। गलवान के फिंगर  पांच क्षेत्र में चीन की सेना है और वह हिस्सा भी अब विवादित हो गया है। इसका हल निकले इसके लिए बातचीत चल रही है। चीन एक बार घुस गया तो बाहर नहीं निकलता है। उसने लद्दाख में घुसपैठ की है। जिस गलवान घाटी में चीन है, वहां लद्दाख के चरवाहे और खानाबदोश नियमित आते-जाते रहते थे, लेकिन अब भारतीय सेना ने उन्हें वहां जाने से रोक दिया है। ‘ऐसा करने से हम अपने ही क्षेत्र को छोड़ रहे हैं, जैसा होगा। हम वर्षों से इस क्षेत्र में रह रहे हैं। चीन ने घुसपैठ की इसलिए हमें न रोको, यह जमीन हमारी है। ‘कब्जा जारी रखें’, ऐसा लद्दाखी लोगों का कहना है। इस पर रक्षा दल का कहना है कि इससे विवाद बढ़ेगा और शांतिपूर्ण चर्चा में खलल पड़ेगी! वजह चाहे कुछ भी हो लेकिन चीन की सेना लद्दाख में है और पैंगोंग झील परिसर में उसने ब्रिज बनाने का काम शुरू किया है। चीन का स्वभाव आक्रामक और घुसपैठ वाला रहा है। उनके लोग सिर्फ भाषण ही नहीं देते, वे चुपचाप काम भी करते हैं। चीन और हिंदुस्थान के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा आज भी नहीं है। लिहाजा, वे अरुणाचल से लेकर लद्दाख तक के भूभाग पर दावा ठोक रहे हैं। लद्दाख की ३८ हजार वर्ग किलोमीटर की जमीन उसने अपने कब्जे में ले ली है। इसके अलावा १९६३ में ‘चीन-पाकिस्तान’ के बीच हुए सीमा समझौते के अनुसार संविधान के छठवें शेड्यूल में नहीं लाया। ऐसा करने से स्थानीय लोगों को रोजगार और जमीन के लेन-देन में कानूनी सुरक्षा मिलेगी। आज लद्दाख में एक स्वतंत्र हिल काउंसिल है। यानी हमारी महानगरपालिका। उसमें ६० सदस्य हैं। इनमें से १० को मंत्रियों का दर्जा प्राप्त है। फिर भी यहां के लोगों की मांग है कि केंद्र शासित प्रदेश के रूप में यहां विधानसभा अस्तित्व में आए। जब राज्य बनेगा तो कम-से-कम २५ हजार सरकारी नौकरियां पैदा होंगी और लोगों की भागीदारी बढ़ेगी। यह मांग गलत नहीं है।

मराठी सूत्रधार
लद्दाख की प्रशासनिक बागडोर पूरी तरह से एक मराठी व्यक्ति के हाथ में है। लेह हवाई अड्डे पर उतरते ही उसका अनुभव आता है। लेह हवाई अड्डे की सुरक्षा जिसके हाथ में है वे सीआईएसएफ के डिप्टी कमांडर संकेत गायकवाड महाराष्ट्र के हैं। लेह-लद्दाख के पुलिस प्रमुख डीआईजी सतीश खंदारे और लेह के कलेक्टर श्री ससे ये दोनों महाराष्ट्र के सुपुत्र हैं। लद्दाख की सीमा पर आज राष्ट्रीय रायफल है। इसमें मराठा रेजीमेंट के सैनिक अधिक हैं। लेह-लद्दाख में पर्यटकों की भीड़ रहती है। ज्यादातर पर्यटक महाराष्ट्र के और फिर गुजरात के होते हैं। लद्दाख की अर्थव्यवस्था पर्यटन पर निर्भर है। महाराष्ट्र के पर्यटक सबसे अधिक आते हैं। वे सभी मेडिकल प्रोटोकॉल का पालन करते हैं और मुख्य बात यह कि उदारता से खर्च करते हैं। मराठी पर्यटकों का लद्दाख के व्यापारी बहुत सम्मान करते हैं। लद्दाख के लोग बुद्ध की सोच का अनुसरण करते हैं। वे शांतिपूर्ण जीवन जीते हैं। इसलिए लद्दाख में पुलिस व्यवस्था है लेकिन पुलिस का ज्यादा काम नहीं दिखता। अपराध की दर लगभग न के बराबर है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि ऐसा एक प्रदेश जो हिंदुस्थान के नक्शे पर है और वह क्षेत्र देश की नजर में उपेक्षित है! लेह-लद्दाख में आज भी बड़ी संख्या में सैन्य छावनियां हैं, लेकिन कश्मीर की तुलना में कम हैं। लद्दाख की जनता पूरी तरह से हिंदुस्थान की तरफ है। इस अंतर को समझना होगा। जिस प्रदेश की जनता देशभक्त होती है, वहां दुश्मन के लिए पैर रखना आसान नहीं होता।
लद्दाख के मामले में यह सच साबित हुआ। लद्दाख को हिमालयीन क्षेत्र का ताज कहा जाता है। विशाल पहाड़, उस पर हमेशा पहली बर्फ की चादर, ठंडी हवा है फिर भी जमीन में पानी नहीं है और लोगों को पानी के लिए संघर्ष करना पड़ता है। यह वहां की तस्वीर है। बर्फों के पहाड़ दिखाई देते हैं लेकिन पीने के पानी का अभाव, ऐसा विरोधाभास है। आज लद्दाख की भूमि में ‘चाय’ के अलावा सब कुछ उगाया जाता है और उसे सैन्य प्रतिष्ठानों की मदद मिलती है। चीन से लड़ाई एक तरफ, लेकिन लद्दाख की जनता ने सेना को अपना मित्र मान लिया है।

हिमालय की भव्यता
हिमालय की भव्यता की उपमा हम क्यों देते हैं, यह उसकी विशाल पर्वत शृृंखलाओं की यात्रा करते हुए स्पष्ट हो जाता है। हिमालय पर्वत शृंखला की यात्रा रोमांचक है। लद्दाख की सीमा उत्तर में चीन और पूर्व में तिब्बत से लगती है। लेह से लद्दाख की ओर जाते समय समुद्र तल से १८ हजार फीट की ऊंचाई की यात्रा करना दिल दहला देती है। ऑक्सीजन का स्तर कम हो जाता है और कई बार परेशानी होने लगती है। इन दुर्गम पहाड़ियों में हमारे सैनिकों की चौकियां जगह-जगह दिखाई देती हैं। हिमालय पर्वत को तोड़कर ‘बॉर्डर रोड ऑर्गनाइजेशन’ ने सड़कों और पुलों का निर्माण किया। जगह-जगह ये मुश्किल काम दिखाई देते हैं। वहां हमारे सैनिक खड़े हैं। सड़कों का निर्माण शुरू है और इसीलिए हमारा देश सुरक्षित है।
लद्दाख के सिरे पर पैंगोंग की प्रसिद्ध झील है। लेह से वहां पहुंचने में पांच घंटे लगते हैं। सफेद  नीला पानी बेहद पारदर्शी। शाम के समय वह पानी सिर्फ पानी नहीं होता, चंद्रमा की रोशनी में मानो चांदनी का प्रवाह बह रहा है। उसका लुत्फ उठाने के लिए हजारों पर्यटक झील के किनारे टेंट में रुकते हैं। हमारा देश कितना सुंदर और सुखद है, यह पैंगोंग झील के किनारे खड़े होने पर पता चलता है। ‘हनुमान चालीसा’ से लेकर ‘ज्ञानवापी’ मस्जिद तक सभी विवादों को भूल जाएं, ऐसा यहां का खूबसूरत नजारा होता है। इतने खूबसूरत देश को हम विनाश की ओर धकेल रहे हैं, ऐसा एहसास होता है जब हम लद्दाख की धरती पर कदम रखते हैं। सिंधु नदी लद्दाख से होकर बहती है। वर्ष १९४७ में भारत-पाक युद्ध के बाद सिंधु नदी का यह एकमात्र हिस्सा लद्दाख से होकर बहता है। वहां एक सिंधु घाट का निर्माण किया गया है और सिंधु परिक्रमा का आयोजन नियमित किया जाता है। मैंने उस बुद्धभूमि में यह सब होता हुआ देखा। बुद्ध का यह प्रदेश है लेकिन वहां सभी को धर्म की स्वतंत्रता है। हिमालय की गोद में बुद्ध की शांति रहती है। लेकिन सीमा पर दूसरा बौद्ध देश चीन हाथों में बंदूक और बम लेकर हमारे खिलाफ खड़ा हो गया है। लिहाजा, बुद्ध की भूमि पर शांति बनी रहे इसलिए हिंदुस्थान की सशस्त्र सेना खड़ी है।

वांगचूक का स्कूल!
एक युवक सोनम वांगचूक ने लद्दाख की भूमि पर एक शैक्षणिक मॉडल बनाया। इस स्कूल  में मुझे जाने का मौका मिला। इस स्कूल  का बोलबाला आज दुनियाभर में है। सोनम वांगचूक आज लद्दाख की पहचान हैं। देशभर में कई शिक्षा सम्राटों ने अपने साम्राज्य स्थापित किए लेकिन लद्दाख जैसे एक दुर्गम क्षेत्र में वांगचूक द्वारा स्थापित किया गया एसईसीएमओएल संस्थान ने इन सभी साम्राज्यों को मात दे दी। इस स्कूल का परिसर अब एक ‘इको’ गांव के रूप में विकसित हो गया है। यहां शिक्षा व्यवस्था से बाहर हुए, दसवीं में फेल  हुए बच्चों को ही प्रवेश दिया जाता है और इन अस्वीकृत विद्यार्थियों को गढ़ा जाता है। यह एक पारंपरिक स्कूल  नहीं है। यहां राजनीति, सामाजिक मामलों, पर्यावरण, संस्कृति, कौशल विकास, नैतिकता, मानवता और जन्मजात प्रतिभाओं को आगे बढ़ाने की शिक्षा दी जाती है। पूरा शैक्षणिक गांव सौर ऊर्जा से संचालित होता है। सोनम वांगचूक ने पर्यावरण क्षरण को रोकने के लिए कई खोज की है और उनके विद्यार्थी इस कार्य को आगे बढ़ा रहे हैं। सोनम और उनके विद्यार्थियों ने बर्फ और ठंड से बचाव के लिए ‘सोलर हीटेड’ टेंट विकसित किए हैं और लद्दाख की सीमा पर उन्हीं टेंटों का इस्तेमाल सेना ‘माइनस २०’ तापमान में देश की रक्षा के लिए कर रही है। लद्दाख का यह स्कूल आत्मनिर्भर पीढ़ी बनाने का काम कर रहा है। इस स्कूल  का परिसर यानी एक स्वतंत्र देश है। इसकी अपनी संसद है, मंत्री है। एक आत्मनिर्भर देश को लगनेवाली हर वस्तुओं का उत्पादन इन विद्यार्थियों का देश करता है। इस देश का एक स्वतंत्र समय है। खुद के टाइम जोन पर यह देश चलता है। भविष्य में देश का नेतृत्व करनेवाले युवा इस स्वूâल से बाहर निकलेंगे। हिमालय का बर्फ, उस बर्फ में जीनेवाले लोग और उन लोगों में भरी हुई मानवता तथा देशभक्ति इस देश की आत्मा है। लेह-लद्दाख की भूमि में मुझे हिंदुस्थान की सच्ची आत्मा दिखी! एक बार तो सभी वहां जाएं और भव्य हिमालय में शांति का अनुभव करानेवाली उस आत्मा को देखें!

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