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चावल की बिगड़ी ताल! …१० फीसदी की दर से बढ़ती कीमतों ने आम आदमी को किया हलाकान

‘केंद्र’ का व्यापारियों और बिचौलियों पर नहीं है कोई नियंत्रण
आम आदमी की थाली का प्रमुख भोजन चावल है। अमीर हो या गरीब चावल सभी खाते हैं। मगर पिछले साल चावल की कीमतें गजब की रफ्तार से बढ़ीं। पूरे साल के महीनों पर यदि नजर डालें तो इनकी मुद्रास्फीति दोहरे अंकों में बनी रही। (देखें बॉक्स)। मगर हैरानी की बात है कि चावल की कीमतें क्यों बढ़ रही हैं, यह किसी को नहीं मालूम। हालांकि, कीमतें तो गेहूं और दाल की भी बढ़ी हैं, मगर चावल की पैदावार अच्छी हुई है और देश में इसका पर्याप्त स्टॉक मौजूद है, इसके बावजूद यदि कीमतें काबू नहीं हैं तो यह चिंता का विषय है।
चावल की कीमतों की बिगड़ी ताल का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि खुदरा मुद्रास्फीति अभी भी दोहरे अंक में बनी हुई है। एक साल से अधिक समय से सरकार कई उपायों पर विचार कर रही है, पर उसे इसके दामों पर नियंत्रण लाने में सफलता नहीं मिली है। इसमें अपने स्टॉक से अनाज की बिक्री के साथ-साथ खुदरा विक्रेताओं से भी बातचीत शामिल है कि वे अपने ‘मुनाफे’ में कमी करें। अब चावल आपूर्ति की स्थिति की समीक्षा करने के लिए खाद्य मंत्री पीयूष गोयल ने कमान संभाली है। खबर है कि इस संबंध में आगामी १५ जनवरी को निर्यातक और व्यापारियों के साथ एक महत्वपूर्ण बैठक होनेवाली है। चर्चा है कि ‘भारत दाल’ और ‘भारत आटा’ की तर्ज पर ‘भारत चावल’ की संभावनाओं पर विचार किया जाएगा।
बता दें कि पूर्व में ‘भारत आटा’ की बिक्री गेहूं की बढ़ती कीमतों पर अंकुश लगाने के लिए शुरू की गर्इं थी। ऐसे में चावल के लिए भी इस जैसी कोई नई योजना शुरू की जा सकती है।
खाद्य मंत्रालय के एक अधिकारी के अनुसार, ‘भारतीय खाद्य निगम (एफसीआाई) के पास मौजूद स्टॉक, खुदरा विक्रेताओं द्वारा किए जाने वाले ज्यादा मुनाफे पर अंकुश लगाने के लिए जारी किया जा सकता है। वर्तमान में सरकार ‘भारत दाल’ और ‘भारत आटा’ पहल के तहत किसानों के सहकारी नाफेड और एनसीसीएफ और केंद्रीय भंडार स्टोर के माध्यम से चना दाल और आटा (आटा) ६०/ रुपए प्रति किग्रा और २७.५ / रुपए प्रति किग्रा की रियायती दर पर बेच रही है। अधिकारी के अनुसार, इस खरीफ में ‘अच्छी फसल’ हुई है। एफसीआई के पास इसका पर्याप्त स्टॉक है। इसके साथ ही विभिन्न प्रतिबंधों के बावजूद चावल की घरेलू कीमतें ऊंचे स्तर पर हैं। सरकार ने चावल के ऊपर निर्यात शुल्क भी लगा दिया। फिर भी कीमतें काबू में नहीं हैं। अब सरकार व्यापारियों के साथ-साथ एफसीआई द्वारा बेचे जाने वाले सब्सिडी वाले चावल पर भी विचार-वमर्श करके कोई समाधान निकालने की कोशिश में है। पिछले महीने खाद्य मंत्री ने कहा कि मुनाफे में तेज बढ़ोतरी की खबरें हैं। थोक विक्रेताओं और खुदरा विक्रेताओं द्वारा इसका लाभ उठाया जा रहा है, जिसे नियंत्रित करने की आवश्यकता है। चावल उद्योग को यह सुनिश्चित करने की जरूरत है कि घरेलू बाजार में कीमतों को वाजिब स्तर पर लाया जाए और ‘मुनाफाखोरी’ के प्रयासों से सख्ती से निपटा जाए। एफसीआई ने केवल ०.१४ मिलियन टन बेचा है। आवंटन के विरुद्ध पिछले सप्ताह तक खुले बाजार बिक्री योजना के तहत चावल की जुलाई में शुरू हुई साप्ताहिक ई-नीलामी के माध्यम से ५ मीट्रिक टन प्राप्त किया गया। एफसीआई ओएमएसएस के तहत २,९०० रुपए प्रति क्विंटल की दर से चावल बेच रही है। २०२२-२३ के लिए लाभ की आर्थिक लागत से नीचे ३,५३७ रुपए प्रति क्विंटल कीमत रही। १ जनवरी को, एफसीआई के पास १८.०५ मिलियन मीट्रिक टन चावल था, ३३.२७ मीट्रिक टन चावल अभी भी मिलों से प्राप्त नहीं हुआ है।

२०२३ में चावल की खुदरा मुद्रास्फीति
जनवरी १०.४४
फरवरी ११.२२
मार्च ११.५१
अप्रैल ११.३७
मई ११.४६
जून ११.९८
जुलाई १३.०९
अगस्त १२.५४
सितंबर ११.०९
अक्टूबर ११.६४
नवंबर ११.८१
(फीसदी में)

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