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आसान नहीं ‘रायसीना’ की राह! भाजपा के पास राष्ट्रपति चुनने के लिए बहुमत नहीं

  • बंगाल-बिहार पर रहेगा विशेष फोकस

सामना संवाददाता / नई दिल्ली
राष्ट्रपति चुनाव से पहले भाजपा को कई राज्यों में क्रॉस वोटिंग का डर सता रहा है, जिसे रोकने के लिए भाजपा सीनियर नेताओं के साथ स्ट्रैटजी बनाकर तिकड़म बनाने में जुट गई है। राष्ट्रपति चुनाव में इस बार कुल वोट वैल्यू करीब १० लाख ९८ हजार है और राष्ट्रपति चुनने के लिए करीब ५ लाख ४९ हजार वोट चाहिए। भाजपा नीत गठबंधन के पास कुल ५ लाख ४५ हजार वोट ही हैं। ऐसे में अगर पार्टी के भीतर ही क्रॉस वोटिंग हो जाए, तो जीत सुनिश्चित कर पाना आसान नहीं होगा।
बंगाल में खतरा, राजस्थान-बिहार में भी डर
बता दें कि बंगाल भाजपा में पिछले कुछ महीने से सबसे ज्यादा उथल-पुथल मची हुई है। एक साल में ७ विधायक और २ सांसद भाजपा छोड़ चुके हैं। पिछले दिनों हल्दिया में एक रैली में तृणमूल कांग्रेस नेता अभिषेक बनर्जी ने दावा किया था कि भाजपा के कई नेता शामिल होने के लिए तैयार हैं। तृणमूल सूत्रों की मानें तो भाजपा छोड़ने वाले नेता राष्ट्रपति चुनाव में क्रॉस वोटिंग कर ममता बनर्जी के प्रति वफादारी साबित कर सकते हैं। ममता साझा विपक्षी उम्मीदवार उतारने के लिए लगातार प्रयास कर रही हैं। इधर राज्यसभा चुनाव में राजस्थान में क्रॉस वोटिंग के बाद पार्टी अलर्ट हो गई है। राज्सथान में व्हिप जारी होने के बावजूद अंतिम वक्त में भाजपा विधायक शोभारानी कुशवाहा ने क्रॉस वोटिंग कर दी थी। वहीं बिहार में भी सहयोगी दल जदयू का रुख भी भाजपा के लिए चिंता का विषय बन चुका है।
विधायक-सांसदों के लिए जारी नहीं होता व्हिप
राष्ट्रपति चुनाव में विधायक और सांसद (मनोनीत को छोड़कर) वोट डालते हैं। इसमें सदस्यों के लिए व्हिप जारी नहीं होता है, जिससे राजनीतिक दलों के लिए क्रॉस वोटिंग का खतरा बना रहता है। २०१७ के चुनाव में रामनाथ कोविंद के समर्थन में कई राज्यों में जमकर क्रॉस वोटिंग हुई थी।

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