मुख्यपृष्ठनए समाचारसुप्रीम कोर्ट की सुस्त है रफ्तार ... नौ दिन चले अढ़ाई कोस!

सुप्रीम कोर्ट की सुस्त है रफ्तार … नौ दिन चले अढ़ाई कोस!

संविधान पीठ में दशकों से लटके हैं कई मामले
३१ साल से लंबित है सबसे पुराना मामला

न्याय पाने का हक हर नागरिक को है। पर इस देश में न्याय पाना इतना आसान है क्या? देश के न्यायालयों में जिस तरह से मुकदमों का बोझ है, उसमें न्याय की प्रक्रिया काफी धीमी हो चली है। कई ऐसे केस हैं जो एक या दो दशक से भी ज्यादा समय से पेंडिंग पड़े हैं। एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार देश के विभिन्न छोटे से बड़े न्यायालयों में करीब पांच करोड़ केस पेंडिंग पड़े हैं। बहुत सारे कोर्ट में न्यायाधीशों के पद खाली पड़े हैं। न्याय की रफ्तार इतनी सुस्त है कि कई केस में दूसरी पीढ़ी आ गई है। एक रिपोर्ट के अनुसार सिर्फ
सुप्रीम कोर्ट में आखिरी बार हुई गिनती के वक्त सुनवाई के लिए ६९,७६६ मामले लंबित थे। खैर, यह तो हुई सामान्य केसों की बात, संविधान पीठ से जुड़े मगर महत्वपूर्ण केसों की स्थिति भी अच्छी नहीं है।
हाल ही में आई एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार सुप्रीम कोर्ट में संविधान पीठ के सामने लंबित मामलों की संख्या २९ है। यह तो हुई संख्या की बात अब अगर समय की बात की जाए तो इसमें सबसे पुराना मामला ३१ साल से लंबित है। यह मामला पांच जजों की संविधान पीठ के सामने है। एक मामला सात जजों की पीठ के पास है। इसकी सुनवाई २९ वर्षों से लटकी पड़ी है। इसी तरह, ९ जजों की संविधान पीठों के सामने पांच मामले लंबित हैं। ये वर्ष १९९९ के बाद से सबसे पुराने मामले हैं। दो अन्य मामले २१ वर्षों से लंबित हैं। कुल मिलाकर २९ मामले संविधान पीठों में सुनवाई के इंतजार में पड़े हैं।
न्यायाधीशों की बढ़ी संख्या
२६ जनवरी, १९५० को जब सुप्रीम कोर्ट का गठन किया गया था, तब हिंदुस्थान के मुख्य न्यायाधीश सहित आठ न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या थी। १९५६ में इसकी संख्या बढ़ाकर ११ और १९६० में १४ कर दी गई। १९७७ में न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या को बढ़ाकर १८ और फिर १९८६ में २६ कर दी गई। अगली वृद्धि २३ वर्षों के बाद हुई, जब जजों की संख्या बढ़ाकर ३१ कर दी गई। लंबित मामलों की बढ़ती संख्या से निपटने के लिए २०१९ में सुप्रीम कोर्ट की क्षमता बढ़ाकर ३४ जजों की कर दी गई। मगर लगता है दुनिया की सबसे बड़ी आबादी १४० करोड़ की जनसंख्या वाले देश में इतने जजों से काम नहीं चलनेवाला। केंद्र सरकार को लंबित मामलों और बढ़ते केसों की संख्या देखकर न्यायपालिका की संरचना को और ज्यादा प्रासंगिक व मजबूत बनाने की जरूरत है। इसके लिए बजट में प्रावधान करने की जरूरत है ताकि इस देश में आम आदमी को न्याय प्रक्रिया सहज सुलभ हो सके।

संवैधानिक न्यायालय
सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट को संवैधानिक न्यायालय कहा जाता है क्योंकि उनके निर्णय संवैधानिक प्रावधानों की व्याख्या करते हैं और वो व्याख्या अधीनस्थ अदालतों के लिए मामलों की सुनवाई के वक्त नजीर की तरह काम करते हैं। हालांकि, हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट, नियमित मामलों से अटे पड़े हुए हैं। ये सेवा, जमानत आदि से संबंधित मुद्दे हैं। कानून मंत्रालय के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के सामने लंबित २९ मामलों में से १८ पांच न्यायाधीशों की पीठ के पास हैं, जिनमें अनुच्छेद ३७० को निरस्त करने की चुनौती भी शामिल है। छह मामले सात न्यायाधीशों की पीठों के सामने लंबित हैं, जबकि पांच ९ न्यायाधीशों की पीठों के समक्ष लंबित हैं। इनमें सबसे पुराना केस २४ साल, दो अन्य २१ साल और चौथा १६ साल से लंबित है।

पहले तेज गति से होती थी सुनवाई
ऐसा नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हमेशा से इसी तरह सुस्त रही है। पहले काफी तेजी के साथ मामले निपटाए गए हैं। संविधान पीठों ने १९५० से १९५९ के दौरान ४४० और १९६० से १९६९ के दौरान ९५६ मामलों का निपटारा किया था। हाल के वर्षों में, निपटान दर में भारी गिरावट आई है। इन पीठों ने २०१० से २०१९ के दौरान केवल ७१ मामलों और २०२० से २०२३ के दौरान १९ मामलों पर पैâसला दिया है। ऐसा इसलिए भी हो सकता है क्योंकि अब बहुत कम मामले संविधान पीठों को भेजे जा रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट में सात जजों की पीठ के पास एक मामले की सुनवाई २९ वर्षों से लटकी पड़ी है। इसी तरह ९ जजों की संविधान पीठों के सामने पांच मामले लंबित हैं। ये वर्ष १९९९ के बाद से सबसे पुराने मामले हैं।’

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