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राज्यों पर ‘अप्रत्यक्ष’ कब्जे का जाल! … अब सरकार चलेगी ‘एक देश, एक चुनाव’ की चाल

सामना संवाददाता / मुंबई
केंद्र की मोदी सरकार देश को तानाशाही की ओर ले जाने के लिए एक और कदम उठाने जा रही है। केंद्र सरकार ने चुनावों पर अंकुश लगाने के लिए एक देश, एक चुनाव कराने पर विचार कर रही है। मतलब पांच साल में केवल एक ही बार चुनाव होगा यानी देश में बार-बार चुनाव होनेवाली लोकतांत्रिक प्रक्रिया को पूरी तरह से समाप्त कर दी जाएगी। एक देश एक चुनाव के विरोध में विश्लेषकों का मानना है कि संविधान ने हमें संसदीय मॉडल प्रदान किया है, जिसके तहत लोकसभा और विधानसभाएं पांच वर्षों के लिए चुनी जाती हैं, लेकिन एक साथ चुनाव कराने के मुद्दे पर हमारा संविधान मौन है। संविधान में कई ऐसे प्रावधान हैं, जो इस विचार के बिल्कुल विपरीत दिखाई देते हैं। मसलन अनुच्छेद-२ के तहत संसद द्वारा किसी नए राज्य को भारतीय संघ में शामिल किया जा सकता है और अनुच्छेद-३ के तहत संसद कोई नया राज्य बना सकती है, जहां अलग से चुनाव कराने पड़ सकते हैं।
इसी प्रकार अनुच्छेद ८५(२)(ख) के अनुसार, राष्ट्रपति लोकसभा को और अनुच्छेद १७४(२)(ख) के अनुसार राज्यपाल विधानसभा को पांच वर्ष से पहले भी भंग कर सकते हैं यानी राज्यपाल कभी भी अपने विरोधी दलों की राज्य सरकार को भंग कर सकते हैं और पांच साल तक चुनाव नहीं होंगे। केंद्र के हाथ में राज्य की सत्ता बनी रहेगी। इस प्रकार से ‘अप्रत्यक्ष’ रूप के कब्जे की चाल केंद्र सरकार चल रही है। इसी के तहत एक देश, एक चुनाव लाने के लिए कदम उठा रही है।
अनुच्छेद-३५२ के तहत युद्ध, बाह्य आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह की स्थिति में राष्ट्रीय आपातकाल लगाकर लोकसभा का कार्यकाल बढ़ाया जा सकता है। इसी तरह अनुच्छेद-३५६ के तहत राज्यों में राष्ट्रपति शासन लगाया जा सकता है और ऐसी स्थिति में संबंधित राज्य के राजनीतिक समीकरण में अप्रत्याशित उलटफेर होने से वहां फिर से चुनाव की संभावना बढ़ जाती है। ये सारी परिस्थितियां एक देश एक चुनाव के नितांत विपरीत हैं, वहीं दूसरा तर्क यह दिया जाता है कि यह विचार देश के संघीय ढांचे के विपरीत होगा और संसदीय लोकतंत्र के लिए घातक कदम होगा। लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं का चुनाव एक साथ करवाने पर कुछ विधानसभाओं के मर्जी के खिलाफ उनके कार्यकाल को बढ़ाया या घटाया जाएगा, जिससे राज्यों की स्वायत्तता प्रभावित हो सकती है। भारत का संघीय ढांचा संसदीय शासन प्रणाली से प्रेरित है और संसदीय शासन प्रणाली में चुनावों की बारंबारता एक अकाट्य सच्चाई है। इसके साथ ही तीसरा तर्क यह है कि अगर लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव एक साथ करवाए गए तो ज्यादा संभावना है कि राष्ट्रीय मुद्दों के सामने क्षेत्रीय मुद्दे गौण हो जाएं या इसके विपरीत क्षेत्रीय मुद्दों के सामने राष्ट्रीय मुद्दे अपना अस्तित्व खो दें।

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