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गोरों का निकल रहा दम! …. एशिया में मरीज हैं कम

• कैंसर से बढ़ा गम
धीरेंद्र उपाध्याय / मुंबई । विश्व में जहां कैंसर के बढ़ते मामलों से गम बढ़ता जा रहा है, वहीं इसकी जद में आ रहे गोरों का अधिक संख्या में दम निकल रहा है। दूसरी तरफ एशिया में इस जानलेवा रोग के मरीज कम हैं। कैंसर पर आई नई रिसर्च में कई चौंकानेवाली बातें सामने आई हैं। रिपोर्ट के अनुसार अश्‍वेत और एशि‍याई लोगों में कैंसर होने का खतरा कम है, वहीं गोरे लोगों में वैंâसर होने का खतरा ज्‍यादा है। यह दावा कैंसर पर अध्‍ययन करनेवाली संस्‍था कैंसर रिसर्च यूके ने अपनी हालिया रिपोर्ट में किया है। मुंबई टाटा अस्पताल के निदेशक डॉ. राजेंद्र बड़वे ने भी इसकी पुष्टि की है।
२०१३ से २०१७ तक किया गया शोध
शोधकर्ताओं का कहना है कि इंग्‍लैंड में २०१३ से लेकर २०१७ के बीच सामने आए कैंसर के मामलों के आधार पर यह रिसर्च की गई और परिणाम जारी किए गए। परिणाम बताते हैं कि ब्‍लैक और एशियाई लोगों में इस बीमारी का खतरा कितना कम है। गोरों के मुकाबले वैंâसर का खतरा एशि‍याई लोगों में ३८ फीसदी और अश्‍वेत में ४ फीसदी तक कम होता है, वहीं मिश्रि‍त लोगों में यह खतरा ४० फीसदी तक कम रहता है। कहा गया है कि गोरे लोगों में स्कीन वैंâसर का खतरा ज्‍यादा होता है। सूरज की तेज किरणों के कारण गोरे लोगों की स्कीन ज्यादा डैमेज होती है।
लाइफ स्टाइल से रोका जा सकता है
शोध में बताया गया है कि गोरे लोगों के मुकाबले अश्‍वेत और एशियाई लोगों में कैंसर को लेकर असमानताएं हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि ऐसे लोगों में वैंâसर का रिस्‍क अलग-अलग कारणों से होता है। जैसे इंसान की उम्र और उसे पैरेंट्स से मिले जीन्‍स। यूके में कैंसर के ४० फीसदी मामलों को लाइफ स्‍टाइल में बदलाव करके रोका जा सकता है।
स्मोकिंग स्तर कम होने से घटा कैंसर
शोधकर्ताओं के मुताबिक अश्‍वेत और एशि‍याई कम्‍युनिटी वाले लोगों में वैंâसर के मामले अधि‍क न होने का एक बड़ा कारण है, स्‍मोकिंग का स्तर कम होना। यही वजह है कि गोरे लोगों के मुकाबले अश्‍वेत में बॉवेल, ब्रेस्‍ट और फेंफड़ों के कैंसर का खतरा कम है।
महानगरों में ज्यादा मरीज
टाटा अस्पताल के निदेशक डॉ. राजेंद्र बड़वे ने कहा कि यूरोप में हर साल एक लाख लोगों में से ३५० लोग वैंâसर के शिकार होते हैं। यूरोप में सर्वाधिक ५५ मरीज बड़ी आंत के कैंसर से जूझते हैं। इसके साथ ही प्रति लाख पर हर साल प्रोटेस्ट कैंसर के ५०, मुंह के ४ और लंग कैंसर के ६० मरीज मिलते हैं। डॉ. राजेंद्र बड़वे ने कहा कि यदि हिंदुस्थान की बात करें तो महानगरों में मिश्रित वैंâसर मरीजों की यह संख्या १०० है। दूसरी तरफ छोटे शहरों में ७० और ग्रामीणों में हर एक लाख में ४० लोग वैंâसर की चपेट में आते हैं। इनमें सर्वाधिक २४ मुंह के वैंâसर के मरीज मिलते हैं। इसी तरह लंग्स के १०, प्रोटेस्ट वैंâसर के ५, बड़ी आंत में कैंसर के ६ मरीज मिलते हैं।
मोटापे से जुड़े हैं १८ तरह के कैंसर
डॉ. बड़वे ने कहा कि अकेले मोटापे से १८ तरह के वैंâसर होते हैं। उन्होंने कहा कि वैंâसर को रोकने के लिए स्‍मोकिंग से दूरी, वजन को कंट्रोल में रखना और समय से जांच का होना जरूरी है। लाइफ स्‍टाइल में बदलाव करके काफी हद तक वैंâसर के रिस्‍क को कम किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि हिंदुस्थान में वैंâसर के इंफेक्शन का हाईरिस्क कम है।

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