मुख्यपृष्ठग्लैमर‘तो हर पैसे वाले का लड़का बड़ा स्टार होता!’-संजय मिश्रा

‘तो हर पैसे वाले का लड़का बड़ा स्टार होता!’-संजय मिश्रा

अभिनेता संजय मिश्रा किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। फिल्मोद्योग में अपनी अलग पहचान बनानेवाले संजय मिश्रा ने अपनी बेहतरीन अदाकारी के बल पर अपना लोहा मनवाया है। ‘ओह डार्लिंग ये है इंडिया’, ‘सत्‍या’, ‘दिल से’, ‘साथिया’, ‘गोलमाल’ जैसी फिल्मों से लेकर इस वर्ष ऑस्कर में नामित हुई ‘गिद्ध’ जैसी फिल्मों में उन्होंने विभिन्न भूमिकाओं में दर्शकों का दिल जीता है। पेश है, संजय मिश्रा से हिमांशु राज की हुई बातचीत के प्रमुख अंश-

आपकी अभिनय यात्रा कितनी पूर्ण हुई?
अभी तो सफर शुरू हुआ है। कलाकार की यात्रा सतत चलती रहती है। पूर्णता जैसा कुछ नहीं होता। अपनी कला के माध्यम से कलाकार स्वप्न को साकार रूप देता है। कला अनंत है और न खत्म होनेवाली एक सृजनात्मक यात्रा। मैं अभी भी सफर में हूं।

कैसी रही आपकी संघर्ष यात्रा?
नित्य नवीन संघर्ष हैं, नई चुनौतियां हैं। मेरा जन्म दरभंगा में हुआ। पिता शंभुनाथ मिश्रा पेशे से जर्नलिस्ट थे। ९ साल में ही परिवार वाराणसी शिफ्ट हो गया था। मैंने अपनी पढ़ाई वाराणसी के केंद्रीय विद्यालय बीएचयू कैंपस से की है। बैचलर डिग्री वर्ष १९८९ में पूरी करने के बाद १९९१ में नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा, दिल्ली से अभिनय का कोर्स किया। मुंबई आने के बाद अब तक संघर्ष जारी है। संघर्ष की एक खासियत है, अगर आपने सही मायने में संघर्ष किया है तो वह आपकी प्रतिभा को निखार देता है। प्रतिभा है तो यात्रा अनवरत रहेगी, आपको कोई रोक नहीं सकता।

क्या आपका बनारसी मिजाज मुंबई से मेल खा गया?
बनारस का कोई विकल्प नहीं। बनारस मिजाजों का शहर है। चलती-फिरती फिल्म है बनारस। मुंबई मेरी कर्मस्थली है। जो मिजाज बनारस ने दिया, उसे मुंबई ने स्वीकारा व निखारा। मुंबई में शुरुआती दौर में मैं अपने बड़े भाई सुमंत मिश्र जो कि पत्रकार थे, के कहने पर कई लोगों से काम के सिलसिले में मिलता था। संघर्ष था, काम न मिलने पर कष्ट भी होता था, पर बनारसी मिजाज उस कठिन दौर का साथी था।

आपका फक्कड़पन लिए स्वाभाविक संवाद अदायगी व अभिनय के पीछे का क्या रहस्य है?
आपके प्रश्न में ही मेरा उत्तर है। मेरा प्रयास रहता है कि जितना स्वभाविक हो सके मैं उतना स्वाभाविक ही रहूं। अल्हड़, मस्ती, फक्कड़पन मेरे शहर बनारस का मिजाज है। मैं अपनी हर सांस में बनारस को जीने का प्रयास करता हूं।

क्या उपलब्धियां आपको रोमांचित करती हैं?
पहले करती थीं, पर अब उपलब्धि मुझे शांत कर देती है। कुछ भी पूर्ण नहीं है। कलाकार हूं और कुछ नया करने का रोमांच जरूर रहता है। आज जो उपलब्धि है, वो कल किसी अन्य उपलब्धि के समक्ष गौण हो जाएगी। ‘आंखों देखी’, ‘मसान’, ‘कड़वी हवा’, ‘वध’ जैसी फिल्मों ने मुझे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मान दिया और स्थापित किया।

आपके नजरिए से इन फिल्मों में क्या खास था?
नि:संदेह फिल्मों की कहानी और निर्देशन। बाकी आप एक अभिनेता के तौर पर कितने ईमानदार हैं, ये बहुत मायने रखता है। खास यही था कि इन फिल्मों में किरदार कहीं-न-कहीं हमारे जीवन से जुड़े थे। आप अपने अभिनय में जितने नैसर्गिक होते हैं वास्तविक जीवन की तरह, जनता अपने को आपसे आसानी से जोड़ लेती है।

पिताजी द्वारा कमाए गए हजार रुपए और आपके द्वारा अर्जित किए लाख रुपए में आप क्या अंतर पाते हैं?
पिता जीवन में वटवृक्ष जैसे होते हैं। उनका न रहना अर्थात सिर से छाया और छत का चला जाना है। हर पिता की इच्छा होती है कि उसे उसके पुत्र के नाम से जाना जाए, पर मेरी इच्छा है कि लोग मुझे मेरे पिताजी के नाम से जानें। पिताजी द्वारा कमाए जानेवाले हजार तो क्या मैं सौ रुपए की भी बराबरी नहीं कर सकता।

छोटे शहर से आए कलाकार आज अपने आपको फिल्मों में स्थापित कर रहे हैं। क्या कहना चाहेंगे?
सभी बड़े कलाकार छोटे शहरों से आए हैं। अमिताभ बच्चन, मनोज वाजपेयी, नवाजुद्दीन से लेकर पंकज त्रिपाठी तक। ये इंडस्ट्री टैलेंट को ही स्वीकारती है। आप हजारों-करोड़ खर्च कर किसी को अभिनेता नहीं बना सकते। अगर ऐसा होता तो हर पैसे वाले का लड़का बड़ा स्टार होता।

सब कुछ जल्दी पाने की होड़ में लगी नई पीढ़ी के कलाकारों के लिए कोई संदेश?
दो मिनट में मैगी बनती है और पांच मिनट में खा के खत्म हो जाती है, पर इससे जीवन नहीं चलता। क्षणिक कामयाबी का समय भी छोटा होता है। अपनी प्रतिभा को निखारें, लगे रहें और संघर्ष करें। सफलता आज नहीं तो कल स्वत: मिलती है और दीर्घकालिक होती है।

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