मुख्यपृष्ठग्लैमर‘तो मैं कैसे मना करती!’-नुसरत भरूचा

‘तो मैं कैसे मना करती!’-नुसरत भरूचा

धारावाहिक ‘किट्टी पार्टी’ में नजर आईं नुसरत भरूचा की ‘लव सेक्स और धोखा’, ‘प्यार का पंचनामा’, ‘सोनू के टीटू की स्वीटी’, ‘छलांग’, ‘रामसेतु’, ‘छोरी’, ‘सेल्फी’ जैसी कई फिल्में रिलीज हुईं, जिसमें अधिकांश फिल्में सफल रहीं। पिछले दिनों रिलीज हुई फिल्म ‘तू झूठी मैं मक्कार’ में नजर आईं नुसरत अभिनीत फिल्म ‘अकेली’ रिलीज हुई है, जिसमें उनके अभिनय की काफी तारीफ हो रही है। पेश है, नुसरत भरूचा से पूजा सामंत की हुई बातचीत के प्रमुख अंश-

• युद्ध की पृष्ठभूमि पर बनी इस फिल्म को करने के पीछे क्या चैलेंजेस रहे?
लेखक-निर्देशक प्रणय मेश्राम का इस विषय पर रिसर्च जबरदस्त था। उन्होंने बड़ी टाइट स्क्रिप्ट लिखी है, जब पूरे रिसर्च के साथ फिल्म आपकी प्लेट में आए तो निर्माता, कलाकार अपना काम आसानी से कर सकेंगे। मैं तो कहती हूं कि इस तरह की पृष्ठभूमि पर बनी इस फिल्म की तरह और भी फिल्में भारतीय सिनेमा के रुपहले पर्दे पर बनना बेहद आवश्यक है।

• आपने पॉजिटिव, नेगेटिव, नॉन ग्लैमरस जैसे सशक्त किरदार निभाए। क्या आपने सोच-समझकर यह स्टेप लिया?
इंस्टिंक्ट कहूं या किस्मत की बात कहूं? अच्छे और अर्थपूर्ण किरदार मांगे नहीं जा सकते। यह किस्मत से आपके पास आते हैं। बशर्ते मेरी काबिलियत पर निर्देशकों को विश्वास हो। वैसे सुना है फिल्म ‘छोरी’ का ऑफर दूसरी अन्य अभिनेत्रियों के पास गया था लेकिन शायद उन्हें इसमें दिलचस्पी न हुई हो। ‘सोनू के टीटू की स्वीटी’ में मेरा किरदार एंटी प्रोटागोनिस्ट का है, उसे दूसरी जुबान में वैम्प अर्थात खलनायिका कहा जा सकता है, वो तक मैंने निभाया। मैंने अंजाम की परवाह नहीं की। लीक से हटकर किरदारों को पेश करना मुझे पसंद है। हो सकता है इस युग में यह चाह कई कलाकार रखते हों।

• फिल्मों में दिखाए जानेवाले महिलाओं के सशक्त किरदार वास्तविक जीवन की महिलाओं से कितने मेल खाते हैं?
प्रत्यक्ष जीवन में बहुत कम परिवारों में महिलाओं की राय मायने रखती है। मेरे परिवार में मैं अपने माता-पिता और दादी की बहुत लाड़ली हूं। मेरा ओपिनियन क्या मेरी राय मायने रखती है। लेकिन अच्छे-भले पढ़े-लिखे परिवारों में महिलाओं का कोई वजूद नहीं होता, उनकी आवाज दबाई जाती है। उन्हें बोलने नहीं दिया जाता। स्कूली जीवन में मैं कुछ डरपोक किस्म की थी। मैं इतनी दुबली-पतली थी कि हवा का झोंका आते ही उड़ जाऊं। क्लास में पढ़ने वाले बच्चे मेरा मजाक उड़ाया करते थे। लेकिन क्लास के एक लड़के ने मुझे यह कहकर आश्वस्त किया कि मुझे इन बेकार की बातों पर ध्यान नहीं देना चाहिए। दुनिया में हर बड़े व्यक्ति का मजाक उड़ाया गया है। मेरे लिए यह लड़का मेरे बड़े भाई समान महसूस हुआ। मुझमें उसने आत्मविश्वास के पंख जड़ दिए, फिर मैं कभी दुखी नहीं हुई कि मेरा कोई मजाक उड़ा रहा है। दरअसल, अपने ही परिवारों से यह परंपरा शुरू होती है कि तुम अकेले न जाओ, लड़की हो। ज्यादा पैâशन मत करो। लड़कियों को तवज्जो न देने से कई बार उनका रियल व्यक्तित्व निखरकर नहीं आता। उनमें अपनी बात सभी के सामने रखने की हिम्मत नहीं आती।

• नायिका प्रधान फिल्म है ‘अकेली’। क्या सिर्फ हीरोइन ओरिएंटेड फिल्म होना काफी होता है?
नायिका प्रधान फिल्मों की व्यावसायिक सफलता बहुत आवश्यक है, वरना नायिका प्रधान फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर अगर दम तोड़ दिया तो इन्हें बनाने का साहस कौन करेगा? विद्या बालन की फिल्म ‘परिणीता’ हो या ‘तुम्हारी सुलु’ इन फिल्मों को कमर्शियल सक्सेस मिली, जिससे विद्या की सोलो लीड-सेंट्रल करेक्टर वाली फिल्मों का चलन बढ़ गया। अभिनेत्री चाहे कितनी भी काबिल क्यों न हो, शी हैज टु डिलिवर हिट फिल्म! मेरे करियर में लकिली बॉक्स ऑफिस हिट फिल्मों का प्रमाण अच्छा ही रहा है। दर्शकों को थिएटर तक ले आना टेढ़ी खीर है।

• ‘अकेली’ की कहानी सुनकर, शूटिंग करते समय किस तरह की भावनाएं आपके मन में थीं?
आतंकवाद आज एक ग्लोबल इश्यू है। हर दूसरा देश इसके खिलाफ लड़ रहा है। मैं अपने देश हिंदुस्थान में बहुत सुरक्षित महसूस करती हूं। फिल्म ‘अकेली’ की कहानी में नायिका आतंकी हमलों के बीच फंसती है, जूझती है। नायिका ने जो महसूस किया उसे बयां करने के लिए मेरे पास अल्फाज नहीं हैं।

• फिल्म ‘अकेली’ करने की क्या वजह रही?
ये एक यथार्थवादी कहानी है। ऐसी कहानियां लिखनेवाले लेखक तक नहीं मिलते, ऐसी किताबें मुश्किल से लाइब्रेरी में पढ़ने को मिलती है। फिर जब मुझे इस कहानी का महत्वपूर्ण किरदार निभाने का मौका मिला तो मैं वैâसे मना करती?

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