मुख्यपृष्ठधर्म विशेषपुरानी परंपराएं हैं सांस्कृतिक पहचान!...कपड़ा फाड़ होली की भी रहती है धूम

पुरानी परंपराएं हैं सांस्कृतिक पहचान!…कपड़ा फाड़ होली की भी रहती है धूम

अजय भट्टाचार्य। यूं तो पूरी दुनिया में होली किसी-न-किसी रूप में मनाई जाती है लेकिन उत्तर प्रदेश के पीलीभीत जिला स्थित पूरनपुर के घुंघछाई में होली पर्व कुछ अलग तरह से मनाया जाता है। रंग खेलने के बाद युवाओं की टोली कपड़ा फाड़ होली खेलती है। राह में जो कोई भी मिलता है उसकी तरफ दौड़ पड़ते हैं और उसके कपड़े फाड़ देते हैं। खास बात यह है कि युवाओं की इस हरकत का लोग विरोध नहीं करते और कपड़ा फटने के बाद एक-दूसरे को गले लगाकर पर्व की शुभकामनाएं देते हैं। होली पर्व पर पुरानी परंपराएं आज भी निभाई जा रही हैं। ग्रामीण क्षेत्र में होली का पूजन करने के लिए युवतियां और किशोरियां पहुंचती हैं। हर घर से होलिका में डालने के लिए उपले भेजे जाते हैं।

पुरानी परंपराओं को जीवंत रखने के लिए ग्रामीण अंचलों में फगुआ गीत गाकर पर्व मनाया जाता है। घुंघचाई गांव में पिछले कई सालों से कपड़ा फाड़ होली मनाई जा रही है। एक दिन पहले शाम को महिलाएं लोकगीत गाकर होलिका का पूजन करती हैं। होलिका में आखत डालने के बाद युवाओं की टोलियां रंग-गुलाब खेलती हैं। इसके बाद कपड़ा फाड़ होली का सिलसिला शुरू हो जाता है। सबसे पहले युवा अपने मिलनेवालों के कपड़े फाड़ते हैं। इसके बाद चौराहे, तिराहे पर मिलनेवाले अन्य लोगों के साथ ऐसा करते हैं। इससे लोग घरों में छिपते देखे जाते हैं। कपड़ा फाड़ने के बाद एक-दूसरे को गले लगाकर होली की शुभकामनाएं दी जाती हैं। प्रयागराज में भी तीन दिवसीय होली में एक दिन कपड़ा फाड़ होली खेली जाती है। कपड़ा फाड़ होली का एक अन्य स्वरूप राजस्थान के पुष्कर में देखने को मिलता है, जहां होली के रंग १२ दिन पहले से ही दिखने लगते हैं। जब यह समाचार पत्र आपके हाथों में होगा तब तक पुष्कर होली के रंगों में भीग चुका होगा। इस बार होली १७-१८ मार्च को है। वैसे तो रंगों का यह पर्व मुख्यत: दो दिन का होता है, जिसमें पहले दिन होलिका दहन होता है और अगले दिन रंगों से होली खेली जाती है। लेकिन पुष्कर में १२ दिन का होली महोत्सव मनाया जाता है। इस दौरान दूर-दराज से लोग होली महोत्सव में शामिल होने पहुंचते हैं। वैसे इस १२ दिवसीय होली उत्सव की शुरुआत ७ मार्च से होली महोत्सव से हो चुकी है, जो १८ मार्च तक चलेगी। राजस्थान के अजमेर में पुष्कर नाम का हिंदू तीर्थ स्थल है। भगवान ब्रह्मा का एकमात्र मंदिर पुष्कर में ही स्थित है। यहां लाबेला होली मंडल के तत्वावधान में पुष्कर के प्रधान वराह घाट चौक पर हर दिन होली उत्सव होता है। इस दौरान १२ दिनों तक रोजाना संगीतमय प्रस्तुति, रंगारंग कार्यक्रम, राजस्थान का पारंपरिक गैरनृत्य डांडिया, चंग की थाप पर नृत्य आदि का आयोजन होता है। महोत्सव में शामिल होने के लिए स्थानीय लोगों के साथ देशी-विदेशी पर्यटक आते हैं। होली के मौके पर इस साल पुष्कर में ख्याति प्राप्त नगाड़ा वादक नाथूलाल सोलंकी का समूह कार्यक्रम करेगा। इसके बाद स्थानीय ढोल, सिंधी ढोल और नासिक के ढोलों पर पारंपरिक गैर नृत्य डांडिया का आयोजन मध्य रात्रि में होगा। १७ मार्च को होलिका दहन और १८ मार्च को विश्व प्रसिद्ध पुष्कर की होली खेली जाएगी। पुष्कर की होली एक और कारण से मशहूर है। पुष्कर में भी हर साल कपड़ा फाड़ होली खेली जाती है।
बंगाल का ‘दोल उत्सव’
बंगाल में देश के बाकी हिस्सों के मुकाबले, एक दिन पहले ही होली मना ली जाती है। राज्य में इस त्यौहार को ‘दोल उत्सव’ के नाम से जाना जाता है। इस दिन महिलाएं लाल किनारी वाली सफेद साड़ी पहनकर शंख बजाते हुए राधा-कृष्ण की पूजा करती हैं और प्रभात-फेरी का आयोजन करती हैं। इसमें गाजे-बाजे के साथ, कीर्तन और गीत गाए जाते हैं। दोल शब्द का मतलब झूला होता है। झूले पर राधा-कृष्ण की मूर्ति रखकर महिलाएं भक्ति गीत गाती हैं और उनकी पूजा करती हैं। इस दिन अबीर और रंगों से होली खेली जाती है, हालांकि समय के साथ यहां होली मनाने का तरीका भी बदला है। पहले यह `दोल उत्सव’ एक सप्ताह तक चलता था। इस मौके पर जमीदारों की हवेलियों के सिंहद्वार आम लोगों के लिए खोल दिए जाते थे। उन हवेलियों में राधा-कृष्ण का मंदिर होता था। वहां पूजा-अर्चना और भोज चलता रहता था। देश के बाकी हिस्सों की तरह, कोलकाता में भी `दोल उत्सव’ के दिन नाना प्रकार के पकवान बनते हैं। इनमें पारंपरिक मिठाई संदेश और रसगुल्ला के अलावा, नारियल से बनी चीजों की प्रधानता होती है। अब एकल परिवारों की तादाद बढ़ने से होली का स्वरूप कुछ बदला जरूर है, लेकिन इस `दोल उत्सव’ में अब भी वही मिठास है, जिससे मन (झूले में) डोलने लगता है। कोलकाता की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां मिली-जुली आबादी वाले इलाकों में मुसलमान और ईसाई तबके के लोग भी हिंदुओं के साथ होली खेलते हैं। वे राधा-कृष्ण की पूजा से भले दूर रहते हों, रंग और अबीर लगवाने में उनको कोई दिक्कत नहीं होती। कोलकाता का यही चरित्र यहां की होली को सही मायने में सांप्रदायिक सद्भाव का उत्सव बनाता है। शांतिनिकेतन की होली का जिक्र किए बिना ‘दोल उत्सव’ अधूरा ही रह जाएगा। काव्यगुरु रवींद्रनाथ टैगोर ने वर्षों पहले वहां बसंत उत्सव की जो परंपरा शुरू की थी, वो आज भी जस की तस है। विश्वभारती विश्वविद्यालय परिसर में छात्र और छात्राएं आज भी पारंपरिक तरीके से होली मनाती हैं। लड़कियां लाल किनारीवाली पीली साड़ी में होती हैं और लड़के धोती और अंगवस्त्र जैसा कुर्ता पहनते है। वहां इस आयोजन को देखने के लिए बंगाल ही नहीं, बल्कि देश के दूसरे हिस्सों और विदेशों तक से भी भारी भीड़ उमड़ती है। इस मौके पर एक जुलूस निकालकर अबीर और रंग खेलते हुए विश्वविद्यालय परिसर की परिक्रमा की जाती है। इसमें अध्यापक भी शामिल होते हैं। आखिर में, रवींद्रनाथ की प्रतिमा के पास इस उत्सव का समापन होता है। इस मौके पर सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं। शांतिनिकेतन और कोलकाता स्थित रवींद्रनाथ के पैतृक आवास, जादासांको में आयोजित होनेवाला बसंत उत्सव बंगाल की सांस्कृतिक पहचान बन चुका है।
कब है होली?
हिंदू संस्कृति में होली का त्योहार, दो दिवसीय पर्व होता है। इसकी शुरुआत होलिका दहन से होती है। होलिका दहन फाल्गुन मास की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है। इस वर्ष होलिका दहन १७ मार्च गुरुवार को पूरे विधि-विधान अनुसार मनाया जाएगा। होलिका दहन के अगले दिन, होली का त्योहार मनाए जाने का विधान है। होली इस बार १८ मार्च को पड़ रही है। होली से पहले ही ९ मार्च से होलाष्टक लग गए हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, होलाष्टक के दौरान कोई भी मांगलिक कार्य जैसे कि शादी, विवाह, वाहन खरीदना या घर खरीदना जैसे कार्य नहीं करने चाहिए। लेकिन इसके साथ ही होलाष्टक के दौरान पूजा-पाठ करने और भगवान का स्मरण और उनके भजन करने को शुभ फलदायक माना गया है।
होलिका दहन का मुहूर्त
शुभ मुहूर्त ९ बजकर २० मिनट से १० बजकर ३१ मिनट तक रहेगा। ऐसे में लोगों को होलिका दहन की पूजा के लिए लगभग सवा घंटे का ही समय मिलेगा।

दहन के नियम
• होलिका दहन उसी दिन किया जाता है, जिस दिन भद्रा न हो।
• पूर्णिमा सूर्यास्त के पश्चात, तीनों मुहूर्तों में होनी चाहिए।
• भूलकर भी सूर्यास्त से पूर्व अथवा चतुर्दशी तिथि को होलिका दहन नहीं करना चाहिए।
होलिका दहन विधि
होलिका पूजा के पश्चात, पुन: जल अर्पित करें। मुहूर्त के अनुसार होलिका में स्वयं अथवा परिवार के किसी वरिष्ठ सदस्य से अग्नि प्रज्जवलित कराएं। इस आग में किसी भी फसल को सेंक लें और अगले दिन उसे सपरिवार ग्रहण करें। मान्यता है कि ऐसा करने से परिवार पर कोई बुरा साया नहीं पड़ता एवं साथ ही सदस्यों को रोगों से मुक्ति भी मिलती है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और देश की कई प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में इनके स्तंभ प्रकाशित होते हैं।)

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