मुख्यपृष्ठस्तंभपढ़ाई का कोई पर्याय नहीं!

पढ़ाई का कोई पर्याय नहीं!

विशाल ओमप्रकाश
मुंबई
मोबाइल और कंप्यूटर आज इंसानों की मूलभूत जरूरतों में शामिल हो चुके हैं। मगर इनके चलते अखबार, पत्र-पत्रिकाओं और किताबों को पढ़ने-लिखने का जो चलन है, वह खत्म होता जा रहा है और यह किसी भी समाज और सभ्यता के लिए चिंता का विषय है। अब आप कहेंगे कि क्या फर्क पड़ता है, ज्ञान तो ज्ञान है चाहे वह पढ़कर आए, देखकर आए या मात्र सुनकर आए। जी नहीं, यह एक ही बात नहीं है। इसे आप अपने ऊपर एक प्रयोग करके समझ सकते हैं। आप टीवी पर, लैपटॉप पर, मोबाइल पर, दुनिया भर की चीजें देखते और सुनते रहते हैं। ऐसा लगता है आप बहुत कुछ जानते हैं और आपके पास बहुत कुछ बताने को या कहने को है तो ऐसा कीजिए कि आप कागज और कलम लेकर एक विषय पर कुछ लिखना शुरू कीजिए, आप पाएंगे कि आपकी कलम बहुत मुश्किल से चल रही है और अगर आप लिख भी लेंगे तो पाएंगे कि आप एक बात कहने चले थे और लिखते-लिखते चौथी या पांचवी बात कहने लगे। अगर सारा काम कहने-सुनने से ही हो जाता तो आज भी बड़ी-बड़ी यूनिवर्सिटी और नौकरियों के लिए ओरल यानी मौखिक के साथ-साथ रिटन यानी लिखने वाला टेस्ट नहीं लिया जाता। बच्चा जब छोटा होता है तो मां या दादी उसे कहानी सुनाती है और वही बच्चा जब बड़ा हो जाता है तो बाप उसे पुस्तक लाकर दे देता है। कहता है बेटा अब खुद पढ़ो, खुद सोचो, खुद कल्पना करो। क्योंकि जब दादी कहानी सुनाती है तो घोड़े का रंग सफेद बताती है, यह कहानी सुनाने वाली उस दादी की कल्पना या पसंद पर निर्भर करता है, मगर जब आप लिखी हुई कहानी पढ़ते हैं तो अपनी कल्पना और तजुर्बे के आधार पर घोड़े को काला या लाल भी सोच सकते हैं। बस यही फर्क है देखने, सुनने और पढ़ने का। पढ़कर इंसान खुद अपनी एक सोच विकसित करता है। मगर देख और सुनकर दूसरे की सोच को ही आधार मान लेता है। उदाहरण के तौर पर देख लीजिए, यह जितने भी अलग-अलग टीवी चैनलों पर बैठे दादा और दादी, रोज शाम को समाचार के नाम पर आपको कहानियां सुना रहे हैं घोड़ों को अपनी मर्जी और अपनी सोच के हिसाब से सफेद, नीला, हरा, केसरी बता रहे हैं और आप उनकी सोच से अनजाने में ही प्रभावित हो रहे हैं। इसी को कहते हैं फिफ्थ जेनरेशन वॉर या प्रोपेगेंडा वॉर फेयर।
जरा सोचिए कि डुगडुगी बजाकर, लच्छेदार बातें करके, भीड़ इकट्ठा करके, जादू दिखाने वाले बाजीगर की बातें अगर सीधे उस बाजीगर के मुंह से न कहकर, एक कागज पर लिखकर आपको दी जाएं, तो शायद ही आप कभी उस बाजीगर के खेल का हिस्सा बनेंगे क्योंकि लिखी बात आदमी अपने दिमाग से तसल्ली से पढ़कर उस पर चिंतन-मनन कर सकता है। दिनभर न्यूज चैनलों और भांति-भांति के सोशल साइट पर अपना एजेंडा चलानेवाले लोगों की कही बातों को अगर आप एक बार लिखा हुआ पढ़ें, तो आपकी बुद्धि खुद ही बता देगी, इसमें कितना सत्य है, कितनी बकवास। इसीलिए अपने साथ-साथ आपके अपनों में भी पढ़ने की आदत विकसित कीजिए। रोटी, कपड़ा और मकान के लिए दिनभर सबकी सुनते हैं। कम-से-कम अपनी सोच अपने विचार तो खुद के बनाइए। कोई भी सभ्यता और समाज सिर्फ ज्ञान के बल पर ही समृद्ध हुआ है। आज के जमाने में तो यह बात और भी तर्कसंगत हो जाती है। आपको क्या लगता है, अमेरिका की सबसे बड़ी ताकत क्या है? फौज, हथियार, पैसा, एटम बम। यह तो औरों के पास भी है, बेशक अमेरिका से थोड़ा कम ही सही, अमेरिका की सबसे बड़ी ताकत है उसकी रिसर्च। अमेरिका में स्कूल, कॉलेजों से ही रिसर्च पर बड़ा जोर दिया जाता है। नतीजा ये है कि वह दुनिया को नई-नई चीजें देता है, जो दूसरे नहीं दे सकते। और इसी वजह से ज्यादातर जगह बस अमेरिका की ही मोनोपोली चलती है। पढ़कर अपनी स्वयं की बुद्धि से अर्जित किया ज्ञान जो आपको स्वयं की बुद्धि से सही-गलत सोचने-समझने की ताकत दे, यह कितना जरूरी है इसे एक उदाहरण से समझने की कोशिश करते हैं। बहुत ही प्रसिद्ध लेखक है ‘टॉम प्रâीडमैन’ जिन्होंने किताब लिखी है ‘द वर्ल्ड इज फ्लैट’। इन्हीं ‘टॉम प्रâीडमैन’ ने सन २००१ में ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ समाचार पत्र में एक लेख लिखा था। आप जानकर आश्चर्य करेंगे उस लेख का शीर्षक था ‘कंपैरिजन बिटवीन इंफोसिस एंड अल कायदा’ मतलब अलकायदा जो एक आतंकवादी संगठन है और इंफोसिस जो एक बहुत बड़ी आईटी कंपनी है, दोनों की तुलना। अब आप कहेंगे भाई इन दोनों की तुलना वैâसे की जा सकती है? जी हां, की जा सकती है। पहला पॉइंट- दोनों एक ही समय पर अस्तित्व में आए, मतलब एक ही समय शुरू हुए, दूसरा पॉइंट- दोनों ही में नौजवान, युवा शक्ति का भरपूर योगदान रहा, तीसरा पॉइंट- दोनों में समर्पित युवा थे, टैलेंटेड युवा थे, चौथा पॉइंट- दोनों ने पूरी दुनिया में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई, मतलब पूरी दुनिया में पैâले। मगर फर्क क्या था? एक दुनिया बर्बाद कर रहा था और दूसरा दुनिया आबाद कर रहा था। एक मिटा रहा था, दूसरा बना रहा था। इसलिए इंफोसिस से मिलियन कमाकर ‘नारायण मूर्ति’ बनते हैं और अलकायदा से ‘ओसामा बिन लादेन’ बनते हैं। इसका मतलब ज्ञान और जानकारी जरूरी है, मगर अपनी बुद्धि, विवेक और आत्मा से जानकर-समझकर सही-गलत ज्ञान और जानकारी का चुनाव ज्यादा जरूरी है। आज एक नेता इतिहास की किसी महान शख्सियत पर कोई टिप्पणी कर देता है या किसी विषय को अपने फायदे के लिए तोड़ -मरोड़कर पेश कर देता है और साथ ही यहां-वहां की चार सपोर्टिंग बातें बता देता है, अपनी बात को सत्य बताने के लिए, अपनी सोच लोगों पर थोपने के लिए, साथ ही यह डुगडुगी बजानेवाले मदारी प्रोपेगेंडा मशीन चालू हो जाती हैं, आपको अपने हिसाब से जानकारी देने के लिए और आप इस सबके बीच कंफ्यूज तमाशबीन बन जाते हैं। अब आप कहोगे हम इसके अलावा कर भी क्या सकते हैं? आप अपनी जिंदगी का मात्र एक घंटे देकर किसी किताब, नई-पुरानी पत्र-पत्रिकाओं को खुद पढ़कर उस विषय पर अपनी एक सोच डेवलप कर सकते हैं। मर्म की बात यह है कि खुद के अर्जित किए गए ज्ञान की जगह कोई नहीं ले सकता, पढ़ने की आदत डालिए।
(लेखक फिल्म अभिनेता और सम सामयिक विषयों के जानकार हैं।)
(उपरोक्त आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं। अखबार इससे सहमत हो यह जरूरी नहीं है।)

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