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कुछ खास नहीं है जीवन में

अधूरा जीवन…. अधूरी इच्छा
एहसास नहीं है जीवन में
बस चल रहा है वक्त निरंतर गति से
कुछ खास नहीं है जीवन में
आधा सुख, आधी रातें
आधा दिन, आधी शामें
आधी सोच, अधूरा सपना
पूरा कहां है खुद मानव
बस आधा ही तो है अपना
कट रही जिंदगी आधी-आधी
आभास नहीं है जीवन में
बस चल रहा है वक्त निरंतर गति से
कुछ खास नहीं है जीवन में
आधी रोटी आधी भूख
पूर्ण में है अगणित सी चूक
आधा व्रत आधी संतुष्टि
मिले आधे से फिर वैâसे मुक्ति
रख लिया मगर खाता भी है
उपवास नहीं है जीवन में
बस चल रहा है वक्त निरंतर गति से
कुछ खास नहीं है जीवन में
आधी हंसी है चेहरे पर
रोना भी आधा-आधा है
आधी मुस्कान, रूआसी आधी
भला वैâसे खुद को साधा है
आधा सच सह आधा झूठ
विश्वास नहीं है जीवन में
बस चल रहा है वक्त निरंतर गति से
कुछ खास नहीं है जीवन में
आधी नींद, अधूरा सपना
आधा संभलना आधा बहकना
मोह माया में उलझे रहना
आधा जग का आधा हरि का
खुद आधे से पूर्ण प्रभो तक
प्रवास नहीं है जीवन में
बस चल रहा है वक्त निरंतर गति से
कुछ खास नहीं है जीवन में
-सिद्धार्थ गोरखपुरी

मैं क्या करता?

दुखों के भंवर में कोई सहारा नहीं है
तकलीफों के इस भंवर में घिरा हर कोई है
सोचता हूं मैं कि मेरे अराध्य राम न होते तो मैं क्या करता,
प्रभु राम का सहारा ही मुझे सब संकट से दूर कर देता है
वह तो केवट की नाव में चढ़कर गंगा पार गए थे
तभी तो केवट के भव भव के पाप मिट गए थे
जब श्री राम केवट की नाव में गए थे,
शबरी की त्पस्या का प्रतिफल मेरे राम थे
सुग्रीव की मित्रता का परिणाम मेरे राम थे
हनुमान की भक्ति की शक्ति मेरे राम थे
तभी तो में कहता हूं
प्रभु राम का सहारा ही सब संकट दूर कर देता है
सोचता हूं मैं कि मेरे अराध्य राम न होते तो मैं क्या करता?
-हरिहर सिंह चौहान, इंदौर

पल भर को क्यों प्यार किया!

सांस में आरोह, अवरोह उर में
ज्वलित चितवन, मलार सुर में
सम हर, रच अभिनव संसार
अजर ज्वार का शृंगार किया
पल भर को क्यों प्यार किया!
लय छंदों में जग बंध जाता
सित मोती का रेणु उड़ाता
चकित, कुछ कह भी नहीं पाया
चिर विरह स्वीकार किया
पल भर को क्यों प्यार किया!
लघु तृण से, तारों तक बिखरा
मुक्त मलय संग, सारंग निखरा
चिर मुक्त तुम्हीं ने जीवन का
मधु जीवन का आकार दिया
पल भर को क्यों प्यार किया!
तम सागर में अनजान बहा
पुलक-पुलक, अचिर प्यार सहा
जब सपनों का लोक मिटाना था
उर का उर से, व्यापार किया
पल भर को क्यों प्यार किया!
वह पल अजर हुआ है आप
वह नेह मुझे रहा है नाप
चाहे रच लो नव इतिहास
चिर आसव से उद्धार किया
पल भर को क्यों प्यार किया!
-डॉ. वीरेंद्र प्रसाद

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