मुख्यपृष्ठटॉप समाचारविधानसभा चुनावों के बाद लगेगा झटका... पहले पैसा, फिर बिजली!

विधानसभा चुनावों के बाद लगेगा झटका… पहले पैसा, फिर बिजली!

-एक करोड़ ७० लाख ग्राहकों पर जबरन प्रीपेड स्मार्ट मीटर थोपने की तैयारी

सामना संवाददाता / मुंबई

विधानसभा चुनाव के बाद महावितरण अपने करीब एक करोड़ ७१ लाख ग्राहकों को जोर का झटका देने वाली है।  महावितरण ने  ‘प्रीपेड स्मार्ट मीटर’ लगाना शुरू कर दिया है। इसके कड़े विरोध के कारण ‘प्रीपेड’ के बजाय ‘पोस्टपेड’ वाले स्मार्ट मीटर लगाने का महत्वपूर्ण निर्णय लिए जाने की  जानकारी उच्च पदस्थ अधिकारियों ने दी है। अधिकारियों ने बताया कि ‘स्मार्ट मीटर’ अभी भी अनिवार्य है। विधानसभा चुनाव के बाद ग्राहकों को प्रीपेड पर स्थानांतरित कर दिया जाएगा। इससे ग्राहकों को पहले पैसा देना पड़ेगा तब उन्हें बिजली मिलेगी।
बता दें कि जब विदर्भ के नागपुर, वर्धा इलाके में प्रीपेड स्मार्ट मीटर लगाने की शुरुआत हुई तो कई संगठनों और आम नागरिकों ने इसका कड़ा विरोध किया। कुछ जगहों पर आंदोलन की तैयारी चल रही है। लोकसभा चुनाव खत्म होने के तुरंत बाद यह जबरदस्ती शुरू हो गई, जिससे नाराजगी और बढ़ गई। लेकिन सत्ताधारी पार्टी को डर है कि इसका असर अक्टूबर में होने वाले विधानसभा चुनाव पर पड़ेगा। वर्तमान में महावितरण ने केवल स्मार्ट मीटर लगाकर पोस्ट पेड बिलिंग प्रणाली को जारी रखने और ग्राहकों को इसकी आदत पड़ने पर इसे धीरे-धीरे प्रीपेड सिस्टम में बदलने का निर्णय लिया है। ऐसे में साफ है कि स्मार्ट मीटर की जरूरत अभी भी बनी हुई है। महाराष्ट्र बिजली ग्राहक संघ के अध्यक्ष प्रताप होगाड़े ने कहा है कि उपभोक्ताओं को स्मार्ट मीटर की जरूरत नहीं है।
महावितरण के स्वतंत्र निदेशक विश्वास पाठक ने बताया कि ग्राहकों को पारदर्शी और सटीक सेवाएं प्रदान करने के लिए स्मार्ट मीटर समय की मांग है। शुरुआत में, महावितरण के ग्राहकों और नई तकनीक के एकीकृत होने तक स्मार्ट मीटर पोस्टपेड होंगे। आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल इस तरह किया जाएगा कि ग्राहकों को सहूलियत महसूस हो।
‘स्मार्ट मीटर’ क्यों अनिवार्य?
केंद्र सरकार के ग्रामीण विद्युतीकरण कॉर्पोरेशन  (आरईसी) और पॉवर फाइनेंस कॉरपोरेशन (पीएफसी) ने ‘महावितरण’ को लगभग २६ हजार करोड़ रुपए और ‘बेस्ट’ को ४ हजार करोड़ रुपए का कर्ज  स्वीकृत किया है। कर्ज स्वीकृत करते समय प्रीपेड स्मार्ट मीटर लगाने की शर्त है। चूंकि महावितरण और बेस्ट  ने कर्ज  लिया है, इसलिए उनके ग्राहक प्रीपेड स्मार्ट मीटर लेने के लिए मजबूर हैं, लेकिन अडानी और टाटा बिजली कंपनी के ग्राहकों पर दबाव  नहीं दे रहे हैं। पश्चिम बंगाल, केरल जैसे कुछ राज्यों ने ग्राहकों पर दबाव डालने से इनकार करते हुए कर्ज भी नहीं लिया है। उत्तर प्रदेश जैसे भाजपा शासित राज्यों में भी प्रीपेड स्मार्ट मीटर का विरोध हो रहा है।

विशेषज्ञ अशोक पेंडसे ने बताया कि सरकारी, अर्धसरकारी और निजी बिजली कंपनियों के ग्राहकों के बीच भेदभाव करना और केंद्रीय ऋण के कारण ग्राहक से प्रीपेड या पोस्टपेड सेवा लेने का अधिकार छीनना ठीक नहीं है। राज्य विद्युत नियामक आयोग को इस संबंध में ध्यान देने की जरूरत है।

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