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रोटी-रोटी के होंगे वांदे! … ७ साल के रिकॉर्ड न्यूनतम स्तर पर पहुंचा देश में गेहूं भंडार

सामना संवाददाता / नई दिल्ली
जहां एक ओर देश में बढ़ती महंगाई ने हिंदुस्थानियों की कमर तोड़कर रख दी है, वहीं दूसरी ओर बढ़ती बेरोजगारी ने युवाओं की बेबसी बढ़ा दी है। २०१४ में केंद्र में भाजपा की सत्ता आने से पहले भाजपा द्वारा `अच्छे दिन आएंगे’ के वादे किए गए थे लेकिन आम जनता को अच्छे दिन की बजाय `महंगे दिन’ ही देखने को मिले हैं। दिन-ब-दिन बढ़ती महंगाई ने क्या खाएं और क्या पकाएं की चिंता पैदा कर दी है। इसी कड़ी में अब सामान्य जनता की थाली से बहुत जल्द ही दो जून की रोटी भी गायब होनेवाली है और रोटी-रोटी के भई वांदे होनेवाले हैं। क्योंकि सरकारी गोदामों में गेहूं का स्टॉक लगातार घट रहा है। दरअसल, देशभर के सरकारी गोदामों में गेहूं का भंडार सात साल के निचले स्तर पर पहुंच गया है। ऐसे में गेहूं की कमतरता के चलते रोटी और महंगी हो सकती है।
आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, भारतीय खाद्य निगम और राज्य एजेंसियों के पास १ जनवरी, २०२४ तक गेहूं का कुल भंडार १६३.५ लाख टन था, जो सात साल में सबसे नीचे है। इससे पहले साल २०१७ में देशभर के गोदामों में १३७.५ लाख टन गेहूं का भंडार रिकॉर्ड किया गया था। घरेलू गेहूं उत्पादन को कृषि मंत्रालय के ११२.७४ मिलियन मीट्रिक टन के रिकॉर्ड अनुमान से कम से कम १० प्रतिशत कम होना बताते हैं।
पिछले साल दुनिया के दूसरे सबसे बड़े गेहूं उत्पादक देश भारत ने गेहूं का निर्यात बंद कर दिया था, क्योंकि गर्मी के कारण गेहूं की पैदावार पर्याप्त नहीं हो पाई थी और रूस द्वारा यूक्रेन पर आक्रमण के कारण वैश्विक कीमतें बढ़ गई थीं। २०२३ में अमेरिकी गेहूं की कीमतें ३५ प्रतिशत से ज्यादा गिर गर्इं, निर्यात प्रतिबंध के बावजूद हाल के महीनों में भारत में गेहूं की कीमतें २० प्रतिशत से ज्यादा बढ़ गई हैं।
केंद्र सरकार की नीतियां जिम्मेदार
मौजूदा गेहूं स्टॉक में कमी आने के कई कारण हैं। गेहूं का उत्पादन तो कम हो ही गया है। सरकार किसानों को गेहूं उत्पादन में प्रोत्साहन नहीं दे पा रही है। वहीं गेहूं के न्यूनतम मूल्य भी किसानों को नहीं मिल रहे हैं। केंद्र सरकार की नीतियां बहुत हद तक जिम्मेदार हैं। यही वजह रही कि लगातार १५ महीनों तक मुद्रास्फीति डबल डिजिट में रहने के बाद दिसंबर में खुदरा अनाज की कीमतें साल-दर-साल ९.९३ प्रतिशत बढ़ी हैं। इस गिरावट का कारण लगातार दो सालों में कम गेहूं उत्पादन है, जिससे राज्य संचालित एजेंसियों को निजी संस्थाओं को ज्यादा बेचने के लिए मजबूर होना पड़ा है।

 

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