मुख्यपृष्ठटॉप समाचारपीएम मोदी की आलोचना करने पर पड़ेंगे छापे... हो जाएगी जेल...! पूर्व...

पीएम मोदी की आलोचना करने पर पड़ेंगे छापे… हो जाएगी जेल…! पूर्व जस्टिस बी.एन. श्रीकृष्णा ने खोली केंद्र सरकार की पोल

  • जनता को उठानी चाहिए इसके खिलाफ आवाज

सामना संवाददाता / नई दिल्ली
लोकतंत्र में सभी को अभिव्यक्ति की आजादी है। लोकतंत्र में सरकार पर टिप्पणी करना लोगों का मूलभूत अधिकार माना जाता है। कोई इस अधिकार को छीन नहीं सकता। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यह कहते हुए आलोचना कर दी जाए कि उनका चेहरा मुझे पसंद नहीं है तो छापे पड़ेंगे, गिरफ्तारी होगी और कोई कारण न बताते हुए जेल में डाल दिया जाएगा। वर्तमान में देश के हालात को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश बी.एन. श्रीकृष्णा ने ऐेसा खरी-खरी सुनाते हुए केंद्र सरकार और भाजपा की पूरी पोल खोल दी है।
पूर्व न्यायाधीश श्रीकृष्णा ने एक दैनिक अखबार को साक्षात्कार देते हुए कहा कि देश में वर्तमान स्थितियां बेहद खराब हैं। वो किसी चौराहे पर खड़े होकर प्रधानमंत्री मोदी की आलोचना नहीं कर सकते।
आपातकाल के बारे में क्यों नहीं बोलते?
केंद्रीय कानून मंत्री किरण रिजिजू पूर्व जस्टिस श्रीकृष्णा के एक बयान पर नाराजगी जताई है। उन्होंने इमरजेंसी की याद दिलाते हुए कहा कि यह मंडली जनता द्वारा चुने गए पीएम नरेंद्र मोदी की गाहे-बगाहे आलोचना करती रहती है। कांग्रेस द्वारा लादे गए आपातकाल के बारे में मुंह नहीं खोलते। ये लोग कुछ राज्यों के मुख्यमंत्रियों के बारे में कुछ नहीं बोलते। अगर वो कहे कि उन्हें प्रधानमंत्री का चेहरा पसंद नहीं है तो ऐसा करने पर छापे पड़ेंगे, न जाने किस जुर्म में पकड़कर उन्हें जेल में डाल दिया जाएगा। कोई उन्हें ये तक नहीं बताएगा कि उनका कसूर क्या था? पूर्व न्यायाधीश श्रीकृष्णा ने कहा कि देश में जो भी माहौल दिख रहा है वो सही नहीं कहा जा सकता। लोकतंत्र में प्रधानमंत्री अथवा सरकार की आलोचना करना नैसर्गिक होता है। इसके लिए किसी पर बंदिशें नहीं लगाई जा सकतीं। ये लोगों का मूलभूत अधिकार है और सरकार इसे दबाकर नहीं रख सकती। जनता को अब इसके खिलाफ आवाज उठानी चाहिए।
बिलकिस बानो केस मामले में आईएएस अधिकारी सबरवाल द्वारा किए गए ट्वीट के बारे में पूछे जाने पर पूर्व न्यायाधीश श्री कृष्णा ने कहा कि उनकी चिंता कानून और उसके सरकारी इस्तेमाल को लेकर थी। उन्होंने केरल हाईकोर्ट के दो फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि कानून के दायरे में रहकर इच्छाएं व्यक्त की जा सकती हैं। लेकिन सरकारी सेवा में शामिल होने के बाद उस पर लगने वाले बंधनों को स्वीकार किया जाना चाहिए। मौजूदा स्थिति क्या है? सरकारी अधिकारियों को केवल सरकार की भलाई के लिए विचार व्यक्त करने की छूट है। दुर्भाग्य है कि उन्हें कोई बात पसंद नहीं है तो उसके प्रतिकुल विचार व्यक्त करने की स्वतंत्रता नहीं है।

अन्य समाचार