मुख्यपृष्ठग्लैमर‘वहां मेरी पहचान कुछ और है!’-फारिया

‘वहां मेरी पहचान कुछ और है!’-फारिया

अभिनय के लिए कलाकार का सक्षम होना जरूरी होता है फिर चाहे वो साउथ का हो या नॉर्थ का। आज सभी पैन इंडिया स्टार बनना चाहते हैं और स्टार बनने का उन्हें ये मौका बड़ी आसानी से ओटीटी प्लेटफॉर्म दे रहा है। फारिया अब्दुल्ला भी ऐसी ही एक अभिनेत्री हैं, जिन्होंने साउथ के बाद अब ओटीटी और हिंदी फिल्मों में अपने जलवे बिखेरे हैं। पेश है, फारिया से पूजा सामंत की हुई बाचतीत के प्रमुख अंश-

• अपने बारे में आप कुछ बताएंगी?
मेरा नाम फारिया अब्दुल्ला है और मैं हैदराबाद से हूं। मेरी शुरुआत तेलुगू फिल्म इंडस्ट्री से हुई और आगे चलकर मैंने तमिल फिल्में की। उसके बाद मुझे मुझे हिंदी और ओटीटी में मौका मिला। मैं थिएटर के साथ-साथ डांस और पेंटिंग भी करती हूं। कविताओं का भी शौक रखती हूं। हिंदी में लिखी अपनी कविताओं का प्रकाशन करवाना मेरा सपना है।

• अभिनय की तरफ आपका झुकाव कैसे हुआ?
बचपन से ही एक्टिंग का मुझे गहरा पैशन था। मेरी शुरुआत थिएटर से हुई। थिएटर करते हुए मुझे एहसास हुआ कि मेरा झुकाव अभिनय की ओर है। जब आप सुबह-शाम इसके लिए मेहनत करते हो और परफॉर्म करने के बाद जो खुशी मिलती है, उसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। बेशक, मेरे माता-पिता ने बचपन से ही मेरा साथ दिया और मुझे प्रेरित किया क्योंकि उन्होंने मुझमें एक क्षमता देखी। उन्हीं की वजह से मेरी नींव हमेशा से सही रही। २०२१ में मैंने नवीन पॉलिशेटी के साथ हिट तेलुगू फिल्म ‘जाथी रत्नालु’ में डेब्यू किया। उसके बाद कुछ और तेलुगू फिल्में कीं और मैं आगे बढ़ती गई।

• इस मामले में आपका क्या अनुभव रहा?
फिल्म ‘जाथी रत्नालु’ के प्रोड्यूसर हमारे कॉलेज, लोयला अकादमी, हैदराबाद आए थे। उन्होंने मुझे देखा और पूछा कि क्या मैं एक एक्टर हूं। मैं उस समय पहले से ही कुछ एड फिल्मों की शूटिंग कर रही थी, लेकिन वे रिलीज नहीं हुई थीं और उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या मैं एक स्क्रिप्ट के लिए ऑडिशन देना चाहूंगी। एक मीटिंग के बाद हमने इंस्टाग्राम पर एक-दूसरे को फॉलो किया और इस तरह उन्होंने मेरी प्रोफाइल देखी, फिर मैंने ऑडिशन दिया और इस तरह मैंने डेब्यू किया। ईश्वर की कृपा रही कि मुझे स्ट्रगल नहीं करना पड़ा।

• साउथ की फिल्मों में आपका अनुभव कैसा रहा?
साउथ इंडियन फिल्मों में मेरा एक्सपीरिएंस बहुत अच्छा रहा है। उन्होंने मुझे बहुत प्यार और आदर के साथ अपनाया है। हैदराबाद, आंध्र और तेलंगाना में फिल्मों का बहुत क्रेज है। आज भी अगर कोई मुझे वहां देखता है तो चिट्टी के नाम से बुलाता है। वहां मेरी पहचान कुछ और है।

• क्या है आपका किरदार?
प्रिया दास लंदन स्थित फाइनेंशियल एनालिस्ट है। लेकिन उसकी जिंदगी ज्यादातर दिल्ली और ओडिशा में ही गुजरती है। प्रिया के पिता ओडिशा के जाने-माने एक्टिविस्ट होते है और मां ट्राइबल समूह की होती है। लंदन में रहते हुए प्रिया इन सभी चीजों से अलग और दूर हो जाती है और आगे जाकर शो में उसकी जर्नी बहुत बदल जाती है।

• कुछ होमवर्क आपको करना पड़ा?
प्रिया के किरदार को निभाने के लिए मुझे बहुत सारा होमवर्क करना पड़ा। मुझे कहा गया था कि इस रोल के लिए फिजिकली बहुत फिट होना पड़ेगा, क्योंकि शो में मेरे काफी एक्शन स्टंट्स हैं। कुछ को छोड़कर ज्यादातर स्टंट्स मैंने खुद ही किए हैं। बाकी जो इमोशनल जर्नी के लिए होमवर्क था, वह मैंने पहले से ही करके रखा था। इस किरदार के साथ जो भी सीन्स होते हैं वे इमोशनल और ट्रॉमेटिक ही रहते हैं तो वह दिखाना बहुत दिलचस्प था।

• हिंदी इंडस्ट्री में काम करना कितना अलग महसूस हो रहा है?
घर वापसी जैसा लग रहा है। हिंदी भाषा बहुत मधुर है, यह संस्कृत से ही आई है। अगर हिंदी भाषा धीरे से बोलो तो लगता है मानो कानों में कोई शहद घोल रहा हो।

• ‘सोनी लिव’ का यह शो आपने क्यों स्वीकारा?
इसका कारण निश्चित रूप से कहानी और किरदार है। मेरे पास सीखने और आउटपुट देने के लिए बहुत कुछ था और मैं इसे लेकर बहुत उत्साहित थी। एक कलाकार को अच्छा कंटेंट, अच्छा निर्देशक और प्रोडक्शन चाहिए होता है और यह सब इस शो में मौजूद था। मैं यह मौका अपने हाथ से नहीं जाने देना चाहती थी। दो दिन में सब फाइनल हो गया था। मुकेश छाबड़ा ने हैदराबाद से मुझे यहां बुलाया और मेरा सिलेक्शन भी बहुत जल्द हो गया था।

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