कुछ सोच न्यारी

कुछ आचरण कुछ सोच न्यारी
बन ग‌ई जीवन की क्यारी
कुछ पढ़ा है फिर लिखा कुछ
है जिंदगी अपनी संवारी
चट्टानों पर चलना सीखा
बढ़ने लगी अपनी सवारी
आकाश की देखी ऊंचाई
पूरी निष्ठा उछाल मारी
हमको मिला पूरा फलक है
रब ने जड़ें गहरे उतारी
हम पूरा जतन करते रहे
अपनों के संग-संग गुजारी
तुम आजमाकर देख लेना
मां धरा पर ईश्वर हमारी
हंसते-गाते कट जाएगी
जिसने सदा सच को पुकारी
‘उमेश’ से मिलती है दुनिया
है सत्य शिव सुंदर हमारी
– डॉ. उमेश चंद्र शुक्ल

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