मुख्यपृष्ठस्तंभ तीसरा काॅलम : महंगाई, इंडिया और एनडीए!

 तीसरा काॅलम : महंगाई, इंडिया और एनडीए!

जितेंद्र मल्लाह
मुंबई

पीएम नरेंद्र मोदी हर हाल में एक बार फिर से प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं। तीसरी बार पीएम बनने के लिए पीएम मोदी और भाजपा कोई कसर नहीं छोड़ रही है। भाजपा और टीम मोदी के पास भुनाने के लिए राम मंदिर, तीन तलाक और अनुच्छेद ३७० जैसे मुद्दे पहले से ही मौजूद हैं। फिर भी पुलवामा बनाम बालाकोट सर्जिकल स्ट्राइक के जरिए सबसे बड़ा राष्ट्रवादी तो वहीं हिजाब, हलाला, मस्जिदों के भोंगे आदि मुद्दों के जरिए खुद को सबसे बड़ा हिंदुत्ववादी साबित करने का उनका प्रयास चलता रहता है। हिंदुओं को मुसलमानों से डराने और पसमांदा यानी पिछड़े मुसलमानों पर डोरे डालने की उनकी कोशिश भी जारी है। इन सबके बीच साम, दाम, दंड, भेद की नीति के तहत विपक्षी नेताओं को प्रवर्तन निदेशालय (ईडी), सीबीआई, इनकम टैक्स व दूसरी जांच एजेंसियों के जरिए भाजपा और केंद्र सरकार बदनाम करवाती रही है। इस हथकंड़े से अब तक कई बड़े विपक्षी नेताओं, मंत्रियों, सासंदों, विधायकों को डराकर तोड़ने या खत्म करने का प्रयास करनेवाली भाजपा आज दुनिया की सबसे बड़ी और अमीर राजनीतिक पार्टी बन चुकी है। लेकिन पीएम मोदी और उनके विशेष सहयोगी अमित शाह की भाजपा आज डरी हुई है। उसे डर देश में लगभग पिछले १० वर्षों में बेतहाशा बढ़ी महंगाई से लग रहा है। उसे डर उसकी तानाशाही के खिलाफ एक मुट्ठी की तरह मजबूर हो रहे २८ विपक्षी राजनीतिक दलों के गठबंधन ‘इंडिया’ से लग रहा है, जिसकी दो दिवसीय बैठक कल मुंबई में संपन्न हुई।
मुंबई के ग्रैंड हयात होटल में ‘इंडिया’ गठबंधन के नेता २०२४ लोकसभा चुनाव में भाजपा को सत्ता से बेदखल करने के लिए रणनीति बनाने के लिए जुटे थे। पहले ही कर्नाटक विधानसभा चुनाव में मिली करारी शिकस्त से डरी भाजपा ‘इंडिया’ को मिल रहे सकारात्मक प्रतिसाद से बुरी तरह से हिली हुई है। यही वजह है कि अब तक महंगाई से त्रस्त जनता की चीखों की अनदेखी करनेवाले पीएम मोदी और उनकी सरकार अब महंगाई पर नकेल कसने के लिए कदम उठाने को मजबूर हुए हैं। २०२२ में संपन्न हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में मिली कामयाबी को भाजपा ने मनमानी करने का जनादेश माना। उसके बाद पेट्रोल, डिजल, सीएनजी, रसोई गैस के दाम लगातार बढ़े लेकिन मोदी सरकार, अंतरराष्ट्रीय बाजार, तेल कंपनियों के नुकसान की दुहाई देकर आंखे मूंदे बैठे रही। बाद में खाद्य तेल, दूध, दाल, मसाले, सब्जियां, गेहूं, चावल और दूसरे अनाज के दाम भी रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गए। फलस्वरूप लोगों की रसोई का बजट ४० फीसदी तक बढ़ गया है। लेकिन केंद्र की मोदी सरकार कुंभकर्णी नींद में सोती रही।
चावल की महंगाई पर अंकुश लगाने के लिए सरकार ने पिछले महीने गैर-बासमती सफेद चावल के एक्सपोर्ट पर बैन लगा दिया है और पिछले सप्ताह उबले चावल पर २० फीसदी निर्यात शुल्क लगाया गया है. १५ अक्टूबर तक बासमती चावल निर्यात पर १२०० डॉलर प्रति टन का न्यूनतम निर्यात शुल्क लगया गया है। इसी तरह अनाज की कीमतों में महंगाई पर अंकुश लगने तक एफसीआई अपने बचे स्टॉक से लगातार अनाज बेच रहा है। सरकार ने रक्षाबंधन (३० अगस्त) से एक दिन पहले रसोई गैस सिलिंडर की कीमतों में २०० रुपए की कटौती का एलान किया और बहनों (गृहणियों) को तोहफा बता कर भुनाने का प्रयास कर अपने ही जाल में फंस गई क्योंकि इससे र्इंधन की कीमतों में वृद्धि का ठीकरा तेल कंपनियों के सिर फोड़ कर अपना हाथ झटक लेती थी लेकिन अब जब रसोई गैस की कीमतों में २०० रुपए की कटौती का श्रेय मोदी सरकार लेने का प्रयास कर रही है तब सवाल यह उठ रहा है कि वृद्धि से सरकार का कोई संबंध नहीं था, तेल कंपनियां जिम्मेदार थीं तो अब दाम सरकार वैâसे कम कर रही है? लोग यह भी पूछ रहे हैं कि तेल कंपनियों के नुकसान का अब क्या होगा?

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