मुख्यपृष्ठग्लैमरइस अनुभव ने मेरी जिंदगी बदल दी!-माधुरी दीक्षित

इस अनुभव ने मेरी जिंदगी बदल दी!-माधुरी दीक्षित

१९८४ में फिल्म ‘अबोध’ के जरिए फिल्म इंडस्ट्री में डेब्यू करनेवाली ‘धक-धक’ गर्ल माधुरी दीक्षित २०२४ में अपने चार दशक पूरे कर चुकी हैं। मध्यमवर्गीय सुसंस्कृत परिवार से आनेवाली माधुरी दीक्षित ने बिना किसी फिल्मी बैकग्राउंड और बिना किसी गॉडफादर के बॉलीवुड में अपना ऐसा मकाम बनाया, जिसकी कल्पना करना आसान नहीं है। इन दिनों माधुरी दीक्षित कलर्स चैनल पर रियलिटी शो ‘डांस दीवाने’ जज करती नजर आ रही हैं। पेश है, माधुरी दीक्षित से पूजा सामंत की हुई बातचीत के प्रमुख अंश-
-शो ‘डांस दीवाने’ को जज करने की क्या वजह रही?
‘डांस दीवाने’ में मैंने शुरू से ही अद्वितीय प्रतिभाओं का संगम देखा है। कभी-कभी मैंने महसूस किया कि पार्टिसिपेंट्स इतनी एनर्जी कहां से लाते हैं। जब मैं फिल्मों में किसी एक्टर के साथ डांस करती थी, तब कोई भी डांस एक दिन में कभी पूरा नहीं हो पाया। बार-बार टेक और रीटेक होता था। कभी-कभी तो एक डांस गीत की शूटिंग पूरा करने में दस-बारह दिन लग जाते थे। फिल्म ‘तेजाब’ के ‘एक दो तीन चार…’ गीत की शूटिंग को १० दिन लगे थे, जबकि डांस की प्रैक्टिस सरोज खान ने मुझसे १५ दिनों तक करवाई थी। ‘डांस दीवाने’ के सेट पर आए पार्टिसिपेंट्स मात्र ३ मिनट तो कभी ढाई मिनट में जो डांस कर दिखाते हैं, उसकी तारीफ करने के लिए मेरे पास अल्फाज नहीं होते।
-पार्टिसिपेंट्स खुद को कैसे तैयार करते हैं?
शो ‘डांस दीवाने’ की सबसे बड़ी खासियत ये है कि यहां उम्र का कोई बंधन नहीं है। भाग लेनेवाले व्यक्ति में सिर्फ और सिर्फ डांस का जूनून और दीवानगी होनी चाहिए। हर उम्र का व्यक्ति इस शो में हिस्सा ले रहा है और इस शो के बहाने अपने जुनून को एक्सप्लोर कर रहा है। पार्टिसिपेंट्स सेट पर दीवानों की तरह धड़ल्ले से डांस करते हैं। बिना गलती के डांस करना कहां आसान होता है? ये लोग अपने घरों में या अपने डांस गुरुओं से डांस रिहर्सल करते हैं। बिना रिहर्सल के कोई डांस कर ही नहीं सकता। उनका ‘डांस दीवाने’ के सेट तक आने का सफर हैरतअंगेज है।
-क्या कोई अलग थीम है?
थीम है परिवार। एक ही परिवार के सदस्य इस प्लेटफॉर्म पर शिरकत करेंगे, जहां परिवारों से बात की जाएगी। उनके व्यक्तिगत जीवन को जानने के साथ ही उनका पूरा सफर देखेंगे। इसमें यह जानना अद्भुत होगा कि किस तरह से डांस ही उनका पैशन बन गया है।
-अपने को-जज सुनील शेट्टी के साथ आपकी बॉन्डिंग कैसी है?
मुझे तो इस बात का बेहद ताज्जुब है कि हमने इससे पहले क्यों नहीं साथ में काम किया? किसी निर्माता-निर्देशक ने हम दोनों को साथ में क्यों नहीं कास्ट किया? खैर, एक मुद्दत के बाद हमें साथ में काम करने का मौका तो मिला। मैंने यह उम्मीद नहीं की थी कि वो इतनी सहजता से टिप्पणियां करेंगे, उचित राय व्यक्त करेंगे, उनका यह अवतार अविश्वसनीय है। सुनील शेट्टी एक विनम्र और भावुक इंसान हैं।
-आपका कौन-सा डांस आपके लिए सबसे मुश्किल रहा?
फिल्म ‘तेजाब’ का ‘एक दो तीन चार…’ गीत मेरे लिए सबसे मुश्किल इसलिए रहा क्योंकि पहली बार मैं सरोज खान के साथ डांस करनेवाली थी। मेरे लिए ‘डू और डाई’ वाली पोजीशन थी। मैंने ८ वर्षों तक क्लासिकल यानी कत्थक डांस सीखा लेकिन बॉलीवुड के डांस अलग होते हैं, उनकी मूवमेंट्स अलग होती है इसलिए गाने की सिचुएशन को समझकर डांस करना मुझे वाकई टेढ़ी खीर लगा। डांस करते वक्त घुटनों सहित मेरे हाथ और कोहनियां छिल गईं, लेकिन इस अनुभव ने मेरी जिंदगी बदल दी।
-आपका चार दशकों का यह सफर कैसा रहा?
यह सफर बेहद रोमांचक रहा। इतना रोमांचक रहा कि अगर ईश्वर मुझसे पूछे कि अगले जन्म में मुझे कहां और किस रूप में जन्म लेना है तो मैं यही कहूंगी कि मुझे मुंबई में इसी फिल्म इंडस्ट्री में एक कलाकार के रूप में जन्म लेना है। हमारी फिल्म इंडस्ट्री एक भूलभुलैया है। एक बार यहां जो आ जाता है उसकी यहां से जाने की इच्छा कभी नहीं होगी, सच तो यह है कि अभिनय एक ऐसा क्षेत्र है जहां आप पर्दे पर उस रूप में नजर आते हैं, असलियत में आप जो नहीं हैं। ऑन स्क्रीन की जिंदगी असलियत से कोसों दूर है। असलियत में हम जो नहीं हैं उसे परदे पर दिखाना एक जबरदस्त चैलेंज है और यही चैलेंज बार-बार यहां जुड़ने के लिए आकर्षित करता है।

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