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इस्लाम की बात : इंसानों को समझो आदम की औलाद …यही है इंसानियत की फरियाद!

सैयद सलमान
इस ९ अक्टूबर यानी रविवार को ईद मिलादुन्नबी का पर्व है। इस सप्ताह दशहरा का पर्व भी मनाया गया। श्रीराम की असत्य पर की गई जीत के रूप में इसे मनाया जाता है। जिस प्रकार दशहरा बिरादरान-ए-वतन के लिए उत्साहजनक होता है, उसी तरह मुस्लिम समाज के लिए ईद मिलादुन्नबी का बड़ा महत्व है। यह दोनों पर्व इस देश की दो बड़ी धाराओं, हिंदू-मुस्लिमों को जोड़ने के पर्व के रूप में मनाए जा सकते हैं लेकिन दुर्भाग्यवश यह मखसूस तबके द्वारा मनाए जाते हैं। इसके लिए दोनों धर्मों के रहनुमाओं को सिर जोड़कर बैठना चाहिए कि आखिर श्रीराम की जीत का पर्व मुस्लिम क्यों न मनाएं और पैगंबर मोहम्मद साहब के जन्मदिन को आखिर मुसलमान अकेला क्यों मनाए? हालांकि खुद मुस्लिम समाज में ही ईद मिलादुन्नबी पर्व को मनाने, न मनाने को लेकर कई बार मतभेद भी उभरकर आते हैं लेकिन इस बात में सच्चाई है कि ईद-उलफित्र और ईद-उल-अजहा के बाद ईद मिलादुन्नबी ही तीसरा ऐसा पर्व है, जिसे बड़े पैमाने पर मनाया जाता है। इस्लामिक वैâलेंडर के तीसरे महीने रबी-उल-अव्वल की १२ तारीख को इसे मनाया जाता है। माना जाता है, इस दिन मक्का शहर में ५७१ ईस्वी में पैगंबर मोहम्मद साहब का जन्म हुआ था।
पिछले कुछ वर्षों में बढ़ते धार्मिक भेदभाव और बिगड़ते सामाजिक माहौल में ईद मिलादुन्नबी के बहाने मुस्लिम समाज से जुड़ी कई गलतफहमियों को मिटाने के प्रयास भी हो रहे हैं। इसके लिए पैगंबर मोहम्मद की जयंती पर ‘पैगंबर फॉर ऑल’ नामक अभियान शुरू किया गया है। कई प्रमुख इस्लामी संगठन और मुस्लिम समाज के बुद्धिजीवी अन्य धर्मावलंबियों के बीच इस्लाम और मोहम्मद साहब के बारे में गलतफहमी और कई गलत धारणाओं को दूर करने का प्रयास करेंगे। इस अभियान में दो सौ के आस-पास गैर सरकारी संगठन, मुस्लिम उलेमा और गैर मुस्लिम बुद्धिजीवियों को शामिल किया गया है। अभियान के दौरान पैगंबर का जन्मदिन अन्य धर्मों के लोगों के घर जाकर मनाने और उन्हें अपने घर आमंत्रित करने की योजना है। दरअसल गैर मुस्लिम बंधुओं में मोहम्मद साहब की नकारात्मक छवि गढ़ने का भरपूर प्रयास हुआ है। इंटरनेट के युग में यह काम और आसान हो गया है। इंटरनेट पर सत्य से परे कई बातें ऐसी परोस दी गई हैं कि व्हॉट्सऐप यूनिवर्सिटी वाले उसी को सत्य मान बैठते हैं। ऐसे में इस पहल का स्वागत किया जाना चाहिए, बल्कि ऐसा सभी धर्म के माननेवालों को करना चाहिए। तमाम ईशदूत, पैगंबर किसी एक धर्म की जागीर होकर क्यों रहें? क्यों न बताया जाए कि श्रीराम पूर्ण नैतिक और सामाजिक व्यवहार प्रदर्शित करनेवाले मर्यादा पुरुषोत्तम हैं। वे बुराई पर अधिकार की जीत के प्रतीक हैं। उन्होंने विषम परिस्थितियों में भी हमेशा मर्यादा का पालन किया, स्वयं के सुखों से समझौता कर न्याय और सत्य का साथ दिया। इसी प्रकार सभी को क्यों न बताया जाए कि मोहम्मद साहब इंसानियत के पैरोकार, धार्मिक सहिष्णुता के प्रतीक और सौहार्द के संदेशवाहक थे। श्रीराम जी और मोहम्मद साहब अपने-अपने दौर में मोहब्बत की महक का पर्याय रहे हैं। एक शबरी के झूठे बेर खाकर समानता का महत्व समझाते हैं और दूसरे हब्शी बिलाल को काबा शरीफ से अजान देने का मौका देकर समता का पाठ पढ़ाते हैं।
पैगंबर मोहम्मद साहब की सुन्नतों में भूखों को भोजन कराना, बीमारों की अयादत करना, उनकी तीमारदारी करना, पड़ोसी को भूखे न सोने देना, उनसे सौहार्दपूर्ण रिश्ते रखने जैसे अमल शामिल हैं। मोहम्मद साहब ने सबसे बढ़कर इंसानियत, अखलाक और तालीम पर जोर दिया। मजहबी तहजीब, तमीज, आला किरदार और उनके उसूलों के साथ इन सुन्नतों को जिंदगी में न उतारनेवाला शख्स मुकम्मल मुसलमान नहीं हो सकता। मोहम्मद साहब समानता के बड़े पक्षधर थे। करीब ६२२ ईस्वी के आस-पास, उन्होंने दस्तूर-अल-मदीना नमक दस्तावेज तैयार किया था, जो एक तरह का संविधान था। इसमें अलग-अलग जनजातियों के बीच चली आ रही दुश्मनी और लड़ाइयों को खत्म कर मुसलमानों, यहूदियों और अन्य धर्म के अनुयायियों को एक सामाजिक समुदाय बताया गया था। साथ ही एक-दूसरे के प्रति उनकी जिम्मेदारियों को भी तय किया गया था। उन्होंने जकात को भी सीधे-सीधे समानता का व्यावहारिक रूप पेश करते हुए उसे भीख नहीं, बल्कि सभी मुसलमानों का धार्मिक कर्तव्य बताया। संपन्न मुसलमानों को अपनी आय का एक हिस्सा गरीबों, यात्रियों और जरूरतमंदों को देना उनके धर्म का हिस्सा इसलिए बताया ताकि जकात से जरूरतमंदों की मदद हो सके। मोहम्मद साहब के समय में अरब जगत में संतान के रूप में बेटों की इच्छा बहुत ज्यादा थी और बेटियों को पैदा होते ही मार दिया जाता था। उन्होंने इस कुप्रथा के खिलाफ कड़ा कदम उठाया और उसे भी धर्म से जोड़ दिया। बीबी फातिमा उन्हीं की लाड़ली बेटी हैं, जिनसे मोहम्मद साहब का वंश आगे चला।
हजरत मोहम्मद का व्यक्तित्व सत्य और सद्भावना का संस्कार है तो कृतित्व इस संस्कार के व्यवहार का विस्तार। मोहम्मद साहब चूंकि सामाजिक सहिष्णुता के पक्षधर थे, लिहाजा किसी भी किस्म के सामाजिक सौहार्द के ताने-बाने को छिन्न-भिन्न करनेवाले दंगा-फसाद को सख्त नापसंद फरमाते थे। वे अम्नो-सुकून के हिमायती थे और मानते थे कि समाज की खुशहाली की इमारत बंधुत्व की बुनियाद पर ही निर्मित हो सकती है। इसके लिए वे अन्य धर्मों के धर्मगुरुओं से मस्जिद-ए-नबवी में बैठकर चर्चा भी करते थे। आज तो मस्जिदों को एक मुस्लिम फिरका दूसरे मुस्लिम फिरके के लिए बंद करने पर आमादा है। यह कटुता और फसाद एकता और सौहार्द के लिए किसी जहर से कम नहीं है। पवित्र ग्रंथ कुरआन में अल्लाह का फरमान है ‘ला युहिब्बुल्लाहु मुफसिदीन’ (-अल-कुरआन ५.६४) अर्थात अल्लाह फसाद करनेवालों से मोहब्बत नहीं करता। इसी कुरआन-ए-पाक की एक और आयत है, ‘इन्नल्लाहु हिब्बुल मोहसीनीन’ (अल-कुरआन २.१९५) अर्थात‌ अल्लाह अहसान करनेवालों यानी सौहार्द बढ़ानेवालों से मोहब्बत करता है। जरा मुसलमान गौर फरमा लें कि कुरआन कह क्या रहा है? मुसलमान कर क्या रहा है? गैर मुस्लिम भाइयों में संदेश जा क्या रहा है?
मोहम्मद साहब ने इंसानियत के लिए अखलाक को महत्वपूर्ण दर्जा दिया। नबूवत के एलान से पहले उनके अखलाक के ही चर्चे थे। जिन लोगों ने नबूवत के एलान के बाद उन्हें अपना दुश्मन समझा, वह भी उनके अखलाक के कायल थे। यही वजह है कि उनकी जिंदगी को तमाम आलम के लिए बेहतरीन नमूना बताया गया। मोहम्मद साहब ने फरमाया कि इस कायनात में बसनेवाले सभी इंसान आदम की औलाद हैं इसलिए आपस में भाई-भाई हैं। उन्होंने धर्म या ऊंच-नीच के आधार पर किसी को भी तकलीफ देने से मना किया। बिना किसी भेदभाव के एक ही पंक्ति में नमाज पढ़ने की ताकीद की। उन्होंने लोगों से बेहतर बर्ताव करने की हिदायत दी। मोहम्मद साहब ने शिक्षा दी कि धर्म किसी का दिल तोड़ने की इजाजत नहीं देता। उनकी जिंदगी एक आदर्श जिंदगी थी, काश मुसलमान इस बात को समझ पाते। ऐसे पैगंबर के जन्मदिन पर शोर-शराबा करने, डीजे बजाने या फिर किसी प्रकार का दिखावा करने के बजाय सभी धर्मों का सम्मान करना, मोहब्बत बांटना और एक साथ शांति से रहने का संकल्प लेना उनके प्रति सच्ची श्रद्धा होगी। ईद मिलादुन्नबी का पर्व मुसलमान चाहे कितनी ही धूमधाम से मना लें, लेकिन जब तक वह मोहम्मद साहब के पदचिह्नों पर न चले, उनकी सुन्नतों पर अमल न करे तब तक उसके द्वारा किया गया हर कृत्य केवल दिखावा है। ‘पैगंबर फॉर ऑल’ अभियान के तहत अनाथालयों, स्कूलों, अस्पतालों और मंदिरों का दौरा करने की शुरुआत करना एक अहम कदम है। यह समय की मांग है कि पैगंबर के बारे में गलतफहमी को दूर किया जाए। इसके लिए ईमानदार कोशिश की जरूरत है। पर्व तभी सार्थक होते हैं जब उसमें सभी शामिल हों।
(लेखक मुंबई विश्वविद्यालय, गरवारे संस्थान के हिंदी पत्रकारिता विभाग में समन्वयक हैं। देश के प्रमुख प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

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