मुख्यपृष्ठस्तंभअर्थार्थ : आजादी के बाद अर्थ यात्रा के तीन युग!

अर्थार्थ : आजादी के बाद अर्थ यात्रा के तीन युग!

 पी. जायसवाल
मुंबई
वर्ष १९४७ में मिली आजादी के अर्थ काल को हम मोटा-मोटी तीन भागों में बांट सकते हैं। पहला समाजवादी आर्थिक युग वर्ष १९४७ से १९९१ का चरण। इस आर्थिक युग पर नेहरू जी की नीतियों की छाप थी। दूसरा आर्थिक युग था उदारवाद का युग, जिसके शुभारंभ का श्रेय जाता है तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव और मनमोहन सिंह को तथा तीसरा आर्थिक युग है, जो २०१४ से शुरू हुआ जिस पर मोदी जी की छाप है।
नव राष्ट्र के रूप में जन्म लेते भारत का विकास ठीक उसी तरह हुआ जैसे एक जन्म लेते बच्चे का एक आत्मनिर्भर वयस्क होने तक होता है। एक बच्चे के जन्म काल को हम इस प्रकार बांट सकते हैं। जन्म से पांच वर्ष का समय जिसमें बच्चा अपने पैर पर चलना सीख जाता है। फिर स्कूल में दाखिला, जिसमें शिक्षा के साथ कई मोर्चों पर कोटा परमिशन के साथ साथ ज्ञान व प्रशिक्षण सख्त अनुशासन और निगरानी में दिया जाता है। फिर आता है कॉलेज का दौर, जिसमें उस बालक के प्रति परिवार और कॉलेज थोड़ा उदार होता है। उसे गणवेश से मुक्ति तथा अनुशासन और निगरानी में कुछ उदारता मिलती है। वह अपना दायरा बढ़ाता है, उसे कॉलेज में कई स्कूलों के बच्चे मिलते हैं और उसे दुनियादारी का ज्ञान होता है। इसके बाद आता है पेशेवर पढाई या नौकरी का दौर, जिसमें वह अब तक पढ़े और गढ़े ज्ञान का इस्तेमाल अपने करियर को उड़ान देने में करता है।
ठीक यही चरण भारत का एक राष्ट्र के रूप में जन्म लेने के बाद हुआ। १९४७ से लेकर संविधान बनने तक आप भारत राष्ट्र का बाल्यकाल युग मान लीजिए तथा १९५० से लेकर १९९१ तक भारत के आर्थिक युग का स्कूल पीरियड मान लीजिए, जिसमें समय की प्रगति के साथ-साथ कुछ सुविधाएं बढ़ रही थीं, लेकिन अनुशासन, निगरानी लाइसेंस, परमिट कोटा आदि के रूप में बना हुआ था, जैसे स्कूल के बच्चों के साथ भी पॉकेट मनी से लेकर तमाम प्रतिबंधों के साथ रहना पड़ता है। तीसरा पड़ाव १९९१ से लेकर २०१४ तक का समय आप एक राष्ट्र के रूप में भारत का कॉलेज पीरियड मान लीजिए, जिसमें माता पिता और स्कूल से लेकर समाज भी कुछ उसके प्रति उदार हुआ, उसने दुनिया की इकोनॉमी देखी, कुछ उसे स्वीकार किया, कहीं उसने संगत बनाने के लिए अपने में बदलाव किया, नए-नए दोस्त बनाए, साझेदारियां बनार्इं और नई-नई चीजों की कोशिश की। अब उस पर से लाइसेंस कोटा परमिट जैसे सख्त अनुशासन के नियम कम होते जा रहे थे। उसे अपने सपनों को पूरा करने के मौके मिलते जा रहे थे। चौथा पड़ाव आप २०१४ के बाद का आर्थिक युग मान लीजिए, जिसमें भारत एक राष्ट्र के रूप में अब उत्पादकीय युवा के रूप में परफॉरमेंस के लिए तैयार हो चुका था। अब तक अर्जित और संचित ज्ञान और अनुभव के दम पर वह आर्थिक दुनिया में लगातार निर्णय ले रहा था, जोखिम ले रहा था और आगे बढ़ रहा था। वह देश और दुनिया की किसी भी प्रतियोगिता में हिस्सा ले रहा था और अपना लोहा मनवा रहा था। इतने पड़ावों की कठिन साधना के बाद भारत एक राष्ट्र युवा के रूप में अपने करियर को लेकर उड़ान भरने लगा। अब उसने पुरानी चीजों में समय के साथ बदलाव भी चालू किया चाहे वह परंपरा रही हो या कानून रहा हो।
इस मीमांसा से हमें यही पता चलता है की भारत का लालन पालन और उसकी प्रगति ठीक वैसी ही हुई है, जैसी होनी चाहिए थी। एक युवा जो आज सफल है, उसकी सफलता के पीछे उसके प्राइमरी, हाई स्कूल, इंटर कॉलेज, पीजी, और पेशेवर कोर्स, प्रतियोगिता के शिक्षक सबका योगदान रहता है। प्रतियोगिता के आधुनिक शिक्षक मिलने के बावजूद भी उन पुराने शिक्षकों के महत्व को नकारा नहीं जा सकता। वर्तमान में देश जिन पैरों पर खड़ा है, चाहे जैसे भी खड़ा हो उसमें इन आर्थिक युगों के तत्कालीन आर्थिक नेतृत्व ने भी भूमिका है।
जब २०१४ में नरेंद्र मोदी ने सत्ता में आने पर उदारवाद की नींव पर बने आर्थिक सुधारों को तेज किया तो उसे एक दिशा मिली। अर्थव्यवस्था के मूल ढांचे में बदलाव करते हुए योजना आयोग के स्थान पर नीति आयोग की स्थापना की। मेड इन इंडिया को मेक इन इंडिया में बदला, जिसने यह शर्त रखी कि भारत को बेचना है तो भारत में ही बनाओ। सरकारी साम्राज्यवाद के विरुद्ध उद्योगों और व्यवसाय के दरवाजे निजी क्षेत्रों के लिए खोले गए। सरकार का हस्तक्षेप बिजनेस से कम करते हुए इस नीति का पालन किया कि सरकार शासन करे और व्यापारी व्यापार तथा इस दिशा में देश का अर्थयुग बढ़ने लगा। आज भारतीय अर्थव्यवस्था विश्व की सबसे तेज गति सेबढ़ती अर्थव्यवस्था बन गई है, जिसे अगले पांच वर्षों में दुनिया की तीसरी अर्थव्यवस्था बनने से कोई चमत्कार ही रोक सकता है।
इस तरह जब हम आजादी के ७६ वर्ष का समग्र मूल्यांकन करते हैं तो भारत की अर्थनीति मिश्रित, समाजवाद, पूंजीवाद के बीच झूलती रही, नेहरू जी की जो अर्थनीति शुरू के वर्षों में सराही जा रही थी वह समय की कसौटी पर अपने आपको कस नहीं पा रही थी और अपने लिए उदारवाद की मांग कर रही थी, जिसे १९९१ में कांग्रेस की सरकार के दौरान ही मौका मिला और इस नई कांग्रेसी सरकार ने अपनी ही पूर्ववर्ती सरकारों का आर्थिक गणवेश उतार कर फेंक दिया। आज २०१४ के बाद इसी नींव और रनवे पर हम उड़ान भर रहें हैं।
(लेखक वरिष्ठ अर्थशास्त्री व सामाजिक तथा राजनैतिक विश्लेषक हैं।)

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