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शर्मिंदगी में गुदगुदाहट

कुछ परिस्थितियां ऐसी होती हैं, जो मनुष्य के जीवन की हिस्सा होती हैं। इन परिस्थितियों से बच पाना किसी के लिए मुमकिन नहीं होता। ये परिस्थितियां हमें जीवन में सभी प्रकार के हर्ष-उल्लास, भय, शोक, डर, विस्मय आदि के रूप में आती हैं। यह हमारे जीवन में आती तो कुछ पल, कुछ मिनट, कुछ घंटों और कुछ दिनों के लिए हैं, पर जीवन में बार-बार हमें गुदगुदाती और याद आती रहती हैं।
रमेश उम्र के आठवें पड़ाव पर था। गर्मी का महीना था। एक दिन बड़े जोर की आंधी आई। दिन में अंधकार हो गया। उसी बीच वह अपने मित्रों के साथ भागकर घर से आधा किलोमीटर दूर बगीचे में आम बीनने चला गया। परिवार के सभी लोग ढू़ंढने लगे। आस-पास के कुआं, तालाब सब देख लिए गए, पर सारे प्रयास असफल रहे। उसी बीच उसके किसी मित्र से पता चला कि घर के लोग उसे ढूंढ़ रहे हैं। वह बहुत डर गया। चुपके से घर में घुस कर गेहूं रखनेवाले एक बड़े ट्रंक में छिप गया। बहुत देर तक उसी में छिपा रहा। रात हो गई। जब घर के सभी लोग रोने लगे तब वह भी रोते हुए अंदर से निकला। उसे देखकर उसकी मां के आंसू और हंसी दोनों में स्पर्धा लगी हुई थी। उस समय वह समझ नहीं पाया कि उसकी मां हंस रही है या रो रही है, पर कुछ वर्ष बाद समझा कि यह सब एक मां की ममता थी जो हर मां को अपने पुत्र के लिए ऐसी स्थिति में विवश कर देती है। आज भी उसकी मां उन पलों को जब याद दिलाती है या अकेले में भी उस दिन घटना को कभी वह याद करता है तो वह अपने आप को उसी समय की तरह अपनी मां के सामने शर्मिंदा पाता है। पर वह शर्मिंदगी भी उसे कहीं ने कहीं गुमशुदा देती है। ऐसी अनेक घटनाएं आपके जीवन में भी घटी होंगी जो समय-समय पर गुदगुदा देती होंगी।
रत्नेश कुमार पांडेय, मुंबई

 

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