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रोखठोख : महाराष्ट्र में भालुओं की गुदगुदी : शिंदे मुख्यमंत्री क्यों नहीं बने?

संजय राऊत – कार्यकारी संपादक 

श्री एकनाथ शिंदे व चालीस विधायकों की बगावत का मतलब भूकंप नहीं है। ऐसे कई भूकंप के झटकों से गुजरने के बावजूद शिवसेना का अस्तित्व बरकरार रहा है। विधायक आते हैं और जाते हैं। पार्टी संगठन दृढ़ रहता है। श्री शिंदे को मुख्यमंत्री बनना है। वे निश्चित तौर पर बन गए होते, परंतु उनका मुख्यमंत्री पद किसने रोका? महाराष्ट्र में राजनीतिक उथल-पुथल तीव्र हो गई है। 

शिवसेना के चालीस के आसपास विधायक एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में बाहर निकल गए। वे पहले सूरत में जाकर रहे। बाद में गुवाहाटी पहुंच गए। इन सभी का नेतृत्व श्री शिंदे कर रहे हैं, फिर भी इस ड्रामे के असली सूत्रधार भाजपा के निर्देशक हैं, इसका श्री शिंदे ने ही खुलासा किया है। भाजपा की महाशक्ति अपने साथ है, ऐसा इकरार उन्होंने किया है। सूरत के ‘मेरिडियन’ होटल में शिवसेना के विधायकों की रक्षा के लिए महाराष्ट्र के भाजपाई उपस्थित थे। गुजरात में भाजपा की सरकार है। पूरे सरकारी तंत्र का इस्तेमाल ‘अलग हुए’ विधायकों की खातिरदारी के लिए किया गया। सूरत से इस जत्थे को विशेष चार्टर विमान से असम की राजधानी गुवाहाटी पहुंचाया गया। असम में भाजपाई सरकार ने इस जत्थे के लिए तमाम व्यवस्था की। इस पूरे प्रकरण का यदि भाजपा से संबंध नहीं था, यह शिवसेना का अंतर्गत मामला था तो फिर इस जत्थे के लिए इतनी चाक-चौबंद व्यवस्था करने की वजह क्या है? दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि जत्था गुवाहाटी पहुंचने पर कुछ विधायक मुंबई से निकले वे सीधे गुवाहाटी जाने की बजाय पहले सूरत गए। वहां से गुवाहाटी गए। इसका रहस्य क्या है? सूरत की भूमि पर ऐसा कौन-सा मंत्र इन विधायकों को दिया गया। जो विधायक बाद में गुवाहाटी गए उन्हें भी ‘वाया’ सूरत जाना पड़ा। यह शोध का विषय है।
खुली बगावत!
श्री एकनाथ शिंदे ने पार्टी के खिलाफ खुली बगावत की और उन्हें शिवसेना के ४० विधायकों का समर्थन मिला। नारायण राणे व छगन भुजबल को भी उनकी बगावत के समय विधायकों का इतना समर्थन नहीं मिला था। छगन भुजबल ने पार्टी छोड़ी तब शिवसेना सत्ता में नहीं थी, परंतु ग्रामीण क्षेत्रों में शिवसेना फल-फूल रही थी। भुजबल की बगावत मनोहर जोशी के खिलाफ थी और भुजबल के साथ लोगों की भारी सहानुभूति होने के बाद भी खुद भुजबल मझगांव विधानसभा क्षेत्र से चुनाव हार गए और उनके साथ गए लगभग सभी विधायक चुनाव में पराजित हुए। कई लोगों का राजनीतिक करियर ही खत्म हो गया। नारायण राणे ने बगावत की, उस समय भी उनके साथ करीब दस विधायक नहीं थे। राणे का उस समय कोकण में महत्वपूर्ण स्थान था। राणे की बगावत के कारण महाराष्ट्र में उपचुनाव हुए। उसमें कुछ लोग जीते परंतु बाद में मध्यावधि चुनाव में श्री राणे के साथ गए लगभग सभी विधायक कोकण में पराजित हुए व उनका करियर हमेशा के लिए खत्म हो गया। शिवसेना से जो बाहर निकला उनके लिए राजनीति में खड़ा होना मुश्किल हो गया। इसलिए आज जो चालीस विधायक सूरत, गुवाहाटी, गोवा ऐसा पर्यटन कर रहे हैं उनका राजनीतिक भविष्य दांव पर लग गया है। बगावत में शामिल हुए मराठवाड़ा का एक भी विधायक दोबारा चुनकर नहीं आएगा यह पहला व उससे पहले उनके विधायक के पद पर अपात्रता की तलवार चल सकती है ऐसा कानून कहता है, यह दूसरी बात। विधिमंडल पक्ष में फूट पड़ गई। इसलिए स्वतंत्र समूह स्थापित करके राजनीति नहीं कर सकते हैं। विधिमंडल पक्ष में फूट पड़ गई मतलब मूल पार्टी टूट गई, ऐसा नहीं है। पार्टी में फूट पड़ना व विधिमंडल में फूट पड़ना ये दो अलग बातें हैं। शिवसेना यह पार्टी एकजुट है, ऐसा अब तक कई बार सिद्ध हो चुका है।
निश्चित तौर पर क्या हुआ?
श्री शिंदे शिवसेना के वर्तमान समय के महत्वपूर्ण नेता थे। उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में शिवसेना ने श्री शिंदे को फडणवीस के दौर में और ठाकरे सरकार में महत्वपूर्ण विभाग दिए। नगर विकास विभाग मुख्यमंत्री अपने पास रखते हैं। उद्धव ठाकरे ने इसे शिंदे को सौंप दिया। इस विभाग का दायरा व आर्थिक व्यवहार बड़ा होता है। मुख्यमंत्री बनाने के लिए उद्धव ठाकरे ने शिंदे को वचन दिया था, ऐसा कहा जाता है। इससे यह बगावत हुई। मुख्यमंत्री पद को लेकर वचन हो सकता है, परंतु भारतीय जनता पार्टी के साथ हुए ‘ढाई साल’ के मुख्यमंत्री पद के करार को भाजपा ने तोड़ दिया। यह करार पूरा हुआ होता तो निश्चित तौर पर श्री शिंदे ही मुख्यमंत्री बने होते। उद्धव ठाकरे ने उनका नाम आगे किया होता। शिंदे के साथ भाजपा ने घात किया। उसी भाजपा के साथ शिंदे व उनके साथी विधायकों को अब जाना है, यह हैरानी की बात है। श्री उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री बने। वे नए सिरे से गठित महाविकास आघाड़ी की जरूरत के रूप में। खुद शरद पवार व सोनिया गांधी ने उनसे आग्रह किया व मुख्यमंत्री के पद पर बैठाया। परंतु शिंदे का मुख्यमंत्री पद चूक गया तो सिर्फ  भाजपा के वचन तोड़ने के कारण ही। वही भाजपा उन्हें महाशक्ति लगती है।
असली कौन?
शिवसेना से आज जो विधायक बाहर निकले हैं उनमें से कुछ विधायक मूलरूप से शिवसेना के नहीं हैं। अब्दुल सत्तार का कौन-सा हिंदुत्व महाविकास आघाड़ी के कारण खतरे में पड़ा? दीपक केसरकर कांग्रेस, राष्ट्रवादी का सफर करते हुए शिवसेना में आए व मंत्री भी बने। उनका भाजपा व हिंदुत्व की डींग मारते हुए सूरत के रास्ते गुवाहाटी पहुंचना यह मजेदार ही है। तानाजी सावंत, सुहास कांदे घुमक्कड़ ही हैं। ‘जहां की चाय वहां का न्याय’, ऐसी उनकी नीति रही है। ऐसे कई लोग हैं। प्रताप सरनाईक, यामिनी जाधव, लता सोनावणे इन विधायकों पर ईडी व जाति सत्यापन के संदर्भ में तलवार लटक रही थी। गुवाहाटी में जाने से पहले फौरी तौर पर उन्हें अभय दिया गया। अब श्री किरीट सोमैया क्या करेंगे? ‘मेरे ईडी के सभी केस क्लीयर हो गए। मैं छूट गया। इसलिए मैं भाजपा जो कहेगी वह कर रहा हूं’, ऐसा कहकर ठाणे के एक विधायक सूरत गए। पीछे-पीछे यामिनी जाधव, लता सोनावणे पहुंच गईं। गुलाबराव पाटील खुद को शिवसेना का बाघ वगैरह कहते थे। पान की गुमटी चलानेवाले आम शिवसैनिक को शिवसेना ने विधायक व कैबिनेट मंत्री कैसे बनाया, इसका वीरश्रीयुक्त कथन सार्वजनिक सभाओं में करते हैं। परंतु वही गुलाबराव पाटील इन्हें किसी के द्वारा ईडी की कार्रवाई की खोखली धमकी दिए जाते ही भाग खड़े हुए। संदीपान भुमरे को मोरेश्वर सावे की उम्मीदवारी काटकर उस समय पैठण की उम्मीदवारी दी गई। शिवसैनिकों की मेहनत से वे लगातार जीतते रहे। आज ठाकरे सरकार में वे कैबिनेट मंत्री बने। पैठण के एक शक्कर कारखाने के गेट पर वॉचमैन की नौकरी करनेवाला यह व्यक्ति शिवसेना के कारण ३० वर्षों से सत्ता में है व मौका आते ही भाग खड़ा हुआ। दादा भुसे से लेकर कई विधायक जो सिर्फ शिवसेना के कारण विधायक व मंत्री बने वे फडणवीस के मंत्रिमंडल में थे। उस समय उन्हें भाजपा से परेशानी थी और आज महाविकास आघाड़ी में हैं तो उन्हें कांग्रेस-राष्ट्रवादी से परेशानी हो रही है।
लोकतंत्र की गंदगी
भारतीय लोकतंत्र की घिनौनी तस्वीर पहले मध्य प्रदेश में नजर आई व अब महाराष्ट्र में दिख रही है। मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया गुट के २२ विधायकों ने पहले इस्तीफा दिया और उन्होंने चुनाव का सामना किया। महाराष्ट्र में शिवसेना द्वारा दी गई विधायकी के साथ लोग भाग गए। उन्हें विधायक के पद से इस्तीफा देकर फिर से जनता का जनादेश लेना चाहिए। विधायकों को इस राज्य से उस राज्य व इस होटल से उस होटल में दौड़ाते रहना यह कैसा  लोकतंत्र है? चालीस विधायक व उनके नेता मुंबई में रहकर भी अपनी भूमिका रख सकते थे तथा महाराष्ट्र के अनेक लोगों को जिस तरह केंद्र ने सुरक्षा उपलब्ध कराई है वैसी सुरक्षा इन विधायकों को भाजपा ने उपलब्ध कराई ही होती, परंतु विधायकों को भगाया जा रहा है। चार्टर्ड विमानों से, वाहनों से होटलों पर असीमित खर्च लोकतंत्र बचाने के नाम पर किया जा रहा है। यहां एक बात ध्यान में रखनी चाहिए कि शिवसेना छोड़कर छगन भुजबल व नारायण राणे दोबारा मुख्यमंत्री नहीं बन सके। श्री एकनाथ शिंदे भी बनेंगे क्या? शिवसेना में रहकर ही उनके मुख्यमंत्री बनने की गुंजाइश अधिक थी। आज चालीस विधायकों की फौज उनके साथ है। इस आंकड़े में पैसों के भूखे बाजार में मिलनेवाले सेवक ही अधिक दिख रहे हैं। ‘ईडी’ के डर से सालों-साल की निष्ठा बेचनेवाले कल श्री शिंदे को छोड़कर भी भाग जाएंगे। बगावत का इतिहास यही कहता है।
आंसुओं का सैलाब
महाराष्ट्र में आज ठाकरे परिवार को लेकर जबरदस्त आस्था व कृतज्ञता है। बालासाहेब ठाकरे के प्रति श्रद्धा है। बालासाहेब की आत्मा जिन्होंने दुखाई उनका राजनीतिक श्राद्ध भी महाराष्ट्र ने कर दिया। २२ जून की शाम श्री उद्धव ठाकरे ने जनता को संबोधित करते हुए एक भावुक भाषण दिया। इससे महाराष्ट्र के घर-घर में आंसुओं की धारा बही। सांझ के समय श्री ठाकरे व उनके परिवार ने ‘वर्षा’ बंगले से सामान निकालकर ‘मातोश्री’ की ओर प्रस्थान किया तब रास्ते में ठाकरे की मानवंदना के लिए दोतरफा भीड़ थी। शाम के समय बालासाहेब के पुत्र को घर छोड़ना पड़ा इसका प्रचंड संताप लोगों में खासकर महिला वर्ग में था। उस एक घटना से महाराष्ट्र दहल उठा। आंसुओं में बड़ी ताकत होती है यह आनेवाला समय ही सिद्ध करेगा!
इन तमाम घटनाक्रमों के सूत्रधार देवेंद्र फडणवीस होंगे तो उन्होंने एक बार फिर गलत निर्णय लिया है। शिवसेना में बागियों को प्रोत्साहन देकर फडणवीस सरकार बनानेवाले होंगे तो वह सरकार टिकेगी नहीं। इन सभी विधायकों की भूख विकराल है। उन्होंने मां को छोड़ा नहीं, तो फडणवीस का साथ क्या देंगे?
अलगाववादियों के साथ सरकार बनाना मतलब भालुओं की गुदगुदी सिद्ध होगी!
महाराष्ट्र इसे स्वीकार नहीं करेगा!

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