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…तो क्या बेरोजगार हो जाएंगे इजरायली सेना में शामिल!

दिल्ली डिस्पैच
महेश सागर
हरियाणा ने हाल में युद्धग्रस्त इजरायल में दस हजार भर्तियों का विज्ञापन देकर चौंका दिया। इजरायल में ७ अक्टूबर को हमास के हमले के बाद छिड़े युद्ध के बीच खबर आई थी कि इजरायल में काम कर रहे करीब एक लाख फिलिस्तीनियों के वर्क परमिट रद्द किए गए हैं। तभी से ये बातें चल रही थीं कि हिंदुस्थान श्रमिकों की आपूर्ति कर सकता है। हालांकि, भाजपा सरकार ने संसद में कहा कि इजरायल और भारत के बीच श्रमिकों की आपूर्ति के लिए कोई बात नहीं चल रही। कनिष्ठ विदेश राज्यमंत्री वी मुरलीधरन ने कांग्रेस सांसद केसी वेणुगोपाल के एक सवाल के जवाब में कहा था कि केंद्र की इजरायल से फिलिस्तीनी श्रमिकों के स्थान पर भारतीय श्रमिकों को भेजने के संबंध में कोई बात नहीं चल रही। लेकिन उसके तुरंत बाद हरियाणा सरकार का भर्तियों के लिए यह आवेदन आया।
इसने कई सवालों को जन्म दिया है। गौरतलब है कि बेरोजगारी के मामले में हरियाणा देश में लगभग शीर्ष पर ही रहता है, तो क्या हरियाणा सरकार ने स्वीकार कर लिया है कि बेरोजगारी का संकट भीषण है? हरियाणा विधानसभा के चल रहे शीतकालीन सत्र में बेरोजगारी के मुद्दे पर मुख्यमंत्री मनोहर लाल ने हालांकि, दावा किया कि उनकी सरकार ने पिछले नौ साल में एक लाख से ज्यादा नौकरियां दी हैं।
स्थानीय मीडिया में यह सरकारी दावे भी किए गए हैं कि अगले छह महीने में (२०२४ के अंत में ही हरियाणा विधानसभा चुनाव भी होने वाले हैं) ६० हजार भर्तियां की जानी हैं। ये घोषणाएं बताती हैं कि प्रदेश में बेरोजगारी की समस्या कितनी गहरी है। स्थानीय युवाओं को निजी नौकरियों में ७५ फीसदी आरक्षण को कुछ महीने पहले पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने निरस्त कर दिया था, जो सरकार के लिए एक झटका ही था। विपक्ष सरकार को रिक्त पद न भरने, आउटसोर्सिंग, निजीकरण और लगातार पर्चे लीक होने को लेकर घेर रहा है।
इससे पहले विधानसभा के मानसून सत्र में सरकार द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, लगभग साढ़े पांच लाख सुशिक्षित बेरोजगार विभिन्न जिलों के रोजगार कार्यालयों में पंजीकृत थे।
इजरायल के निर्माण क्षेत्र के लिए ये भर्तियां हरियाणा कौशल रोजगार निगम ने निकाली हैं। निगम, जिसकी स्थापना २०२१ में निजी क्षेत्र में स्थानीय युवाओं को नौकरी दिलाने के लिए की गई थी, ने कुछ महीने पहले ही विदेशों में श्रमिकों की भर्तियां करवाने की घोषणा इस आधार पर की थी कि निजी एजेंट लोगों को ठगते हैं, जो कुछ हद तक सही भी है, लेकिन एजेंट के रूप में पहले बड़े पैâसले के तौर पर इजरायल जैसे युद्धग्रस्त क्षेत्र को चुना है। सवाल है कि इन श्रमिकों की सुरक्षा की क्या गारंटी है? नौकरियां फिलिस्तीनियों से छीनकर दी जानेवाली हैं, उससे भी इन श्रमिकों के खिलाफ दुर्भावना पैदा हो सकती है।
इसका एक और चौंकानेवाला पहलू यह है कि श्रमिकों को भारतीय रुपयों में लगभग सवा लाख रुपए का मासिक पारिश्रमिक मिलेगा, लेकिन उसका एक हिस्सा उन्हें हर माह भुगतान नहीं किया जाएगा बल्कि बैंक खाते में जमा किए जाएंगे और एकमुश्त इजरायल में अनुबंध समाप्त होने के बाद दिया जाएगा। जबकि खाने- पीने की व्यवस्था उन्हें इस दौरान खुद करनी होगी। महीने में २६ दिन और दिन में नौ घंटे काम करना होगा। इसके अतिरिक्त छुट्टी नहीं मिलेगी। वहां जाने की टिकट का खर्च भी खुद वहन करना होगा। क्या यह बंधुआ मजदूरी नहीं हुई?
अपने नागरिकों को रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार मुहैया कराना सरकार की जिम्मेदारी है लेकिन हरियाणा सरकार का यह कदम और बहुत संभव है कि और भी प्रदेशों की खासकर भाजपा शासित राज्यों की सरकारें इसका अनुसरण करें, यह सवाल पूछने पर मजबूर करता ही है कि क्या अब सरकारें युवाओं को अपने प्रदेश-देश में रोजगार मुहैया कराने की जिम्मेदारी से पल्ला झाड़कर विदेशों में सस्ता श्रम मुहैया कराने का काम करेंगी?

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