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आज और अनुभव : दूसरों की जय से पहले खुद की जय करें

कविता श्रीवास्तव

निर्वाचन आयोग ने चुनावी प्रचार में बच्चों को शामिल करने पर रोक लगाई है। आयोग ने सभी राजनीतिक दलों और प्रत्याशियों के लिए निर्देश जारी करते हुए कहा है कि चुनावी रैलियों, जुलूसों में बच्चों को शामिल न करें। उन्हें पोस्टर, बैनर लगाने, नारेबाजी करने से दूर रखने को कहा है। चुनाव प्रचार की गाड़ियों पर बच्चों को बैठाने पर भी मनाही रहेगी। चुनाव आयोग का यह फरमान चुनाव में बच्चों के बेजा इस्तेमाल को रोकने के लिए जारी किया गया है। इसका उल्लंघन करने पर बालश्रम (प्रतिबंध एवं नियमन) कानून के तहत कार्रवाई होगी। यह आचरण आचार संहिता प्रावधानों के दायरे में आएगा। चुनाव आयोग ने संभवत: बच्चों से काम करवाने की प्रथा को रोकने के लिए ही यह कदम उठाया है, क्योंकि हमने हमेशा देखा है कि चुनाव के वक्त प्रचार के दौरान पदयात्राओं से लेकर जुलूसों, रैलियों और सभाओं में भी बच्चे सबसे आगे रहते हैं। बैनर उठाने से लेकर झंडा लहराने, पर्चे बांटने और नारेबाजी करने में भी बच्चे बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। बचपन में हमने भी इसका खूब मजा लिया है। अपने स्कूली दिनों में ही मैंने ढेर सारी पार्टियों के पर्चे घर-घर बांटे हैं। हम बच्चे टोलियों में इकट्ठा होकर कभी पर्चे बांट देते थे तो कभी झंडा उठाकर नारेबाजी कर देते थे। रैलियों, जुलूसों, सभाओं में हमेशा आगे रहते थे। हमें इससे कोई मतलब नहीं था कि प्रत्याशी कौन है? दल कौन-सा है? उनकी नीतियां, उनके मुद्दे और उनके सिद्धांत क्या हैं? हम तो बस चुनाव को किसी उत्सव के रूप में लेते थे और खेलने-कूदने, आनंद उठाने के जोश में भीड़ का हिस्सा बन जाते थे। बचपन के दिनों में हम गणेश उत्सव, दही-हंडी और नवरात्रि के सार्वजनिक आयोजनों में भी इसी तरह बच्चों की टोलियां बनाकर शामिल हो जाते थे और खूब आनंद उठाते थे। बचपन में सभाओं, भजन-कीर्तन, पूजा, प्रवचन हर तरह के सार्वजनिक कार्यक्रम हमारे लिए उत्सव ही होते थे। हमारे लिए वे आनंद का अवसर होते थे। बचपन में चुनावी प्रचार का दौर भी हमारे लिए इसी तरह ढेर सारे लोगों के साथ आनंदित होने का अवसर ही रहा है। मैंने तो बचपन से ही लोकसभा, विधानसभा, नगरपालिकाओं के चुनावों में पूरी सक्रियता से भाग लिया है। इसलिए मुझे चुनावी प्रचार के बारे में काफी अच्छा अनुभव और जानकारी भी है। वोटिंग कार्ड लिखने और उसे घर-घर बांटने के काम में भी मैं शामिल हुई हूं। हमने पोस्टर भी चिपकाए हैं और बैनर भी लगाए हैं। प्रचार बूथ पर बैठकर माइक थामे नारेबाजी भी की है। हमने चुनाव के दौरान काउंटिंग एजेंट का काम भी किया है। मुझे याद है कि चुनावी प्रचार का काम करते वक्त हमें वडापाव, शरबत, नाश्ता और खाना भी मिल जाया करता था। इसकी अपार खुशी होती थी। चुनावी प्रचार के दौरान गाड़ियों में बैठकर घूमने का शौक भी कई बार पूरा किया है। चुनावी प्रचार में लोगों से सम्मान मिलने पर भी बहुत अच्छा लगता है। ढेर सारे लोगों से जान-पहचान बढ़ती है। प्रचार में शामिल होने पर राजनीतिक लोग बहुत मान भी देते हैं। मेरा व्यक्तिगत अनुभव है कि कभी भी हमें जबरन चुनाव प्रचार में नहीं लगाया गया। हमने हर बार चुनावी प्रचार में स्वेच्छा से भाग लिया है। शौकिया तौर पर सबके साथ शामिल होकर लोगों के साथ काम करने का अपना ही मजा है। सार्वजनिक जीवन में रहने की बचपन से आदत रही है। इसलिए मेरा अनुभव है कि जब भी हम चुनाव प्रचार के काम में आनंद उठाने के लिए शामिल हुए हैं, हमें कभी भी रोका नहीं गया। न घरवालों ने मना किया, न किसी भी दल ने अपने यहां आने से रोका। बच्चों की इस तरह की सक्रियता बाल श्रम कानून के तहत का मामला भले हो, लेकिन मुझ जैसे स्वभाव के बच्चे अब इस सुविधा से वंचित हो जाएंगे। हो सकता है कि आज के बच्चे भी यदि इसी तरह चुनाव की रैली में, जुलूस में, सभा में स्वेच्छा से जाकर कुछ सीखना-समझना चाहते हैं तो उन्हें मौका न मिले। हालांकि, निर्वाचन आयोग ने स्पष्ट किया है कि जो बच्चे अपने माता-पिता अभिभावक के साथ शामिल होंगे, उन पर यह प्रतिबंध लागू नहीं होगा। हां, यह जरूरी है कि बच्चों को जबरन चुनाव प्रचार के काम में न लगाया जाए। मेरे मन में अब सवाल उठने लगा है कि चुनावी प्रचार में किसी उत्सव में शामिल होने के भाव से पहुंचे बच्चे अब क्या करेंगे? हो सकता है प्रत्याशी किसी कार्रवाई के भय से बच्चों को दूर कर दें। वे जश्न के रूप में उसमें शामिल न हो पाएं, क्योंकि आज भी जब मैं बच्चों को चुनावी रैलियों में देखती हूं तो यही समझ आता है कि उन्हें आज भी राजनीतिक पार्टियों, व्यक्तियों, नेताओं किसी से कोई लेना-देना नहीं है। वे केवल आनंद उठाने और अगर मिल जाए तो नाश्ता करने का मजा लेकर कुछ खुशी पाने के लिए हर भीड़ में पहुंच ही जाते हैं। यह उनका बचपना ही तो है, लेकिन यह भी सही है कि बच्चे चुनावी प्रचार में दूसरों की जय करने से पहले अपना भविष्य उज्ज्वल बनाने पर ज्यादा ध्यान दें, ताकि लोग उन होनहार-गुणवान बच्चों की जय करें।
(लेखिका स्तंभकार एवं सामाजिक, राजनीतिक मामलों की जानकार हैं।)

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