मुख्यपृष्ठस्तंभआज और अनुभव : संत के गिरते ही शांत हुई गाय

आज और अनुभव : संत के गिरते ही शांत हुई गाय

कविता श्रीवास्तव

पिछले दिनों व्हॉट्सऐप पर एक वीडियो आया था, जिसमें सड़क पर घूम रही एक लावारिस गाय को एक बच्ची ने छेड़ क्या दिया उस गाय को क्रोध आ गया। गाय ने पलटकर अपनी सींगों से उस लड़की को उठाकर पटक दिया और फिर अपने पैरों से लड़की को कुचलने लगी। कुछ देर बाद गाय ने लड़की को एक बार फिर सींगों से उठाकर पटका और अंतत: उसे कुचलकर मार डाला। सीसीटीवी में दिखा कि आसपास के लोग चिल्लाने के साथ-साथ ही गाय पर पत्थर भी बरसाते रहे लेकिन गाय फिर भी शांत नहीं हुई। जब लोगों ने गाय को लाठियों से दौड़ाया तो वह भाग गई। इस बीच देखते ही देखते उस बच्ची की मौत हो गई। उस वीडियो के संदेश में लिखा था कि पशुओं से सावधान रहें। पता नहीं कब वे हिंसक हो जाएं। सच कहें तो ये बात बिलकुल सही है क्योंकि पशुओं से बचना ही चाहिए। कुछ वर्ष पहले दिल्ली में एक युवक चिड़ियाघर की सैर के दौरान शरारत के चक्कर में शेर के बाड़े में गिर गया था। शेर उसके सामने आ खड़ा हुआ। कुछ देर दोनों का आमना-सामना होता रहा। युवक शेर के आगे हाथ जोड़े बैठा रहा। शेर कोई मनुष्य तो था नहीं, जो उसे अपने बाड़े में आने पर माफ कर देता। खैर, शेर ने थोड़ी देर तक इधर-उधर देखा। अंतत: युवक की गर्दन अपने जबड़ों में जकड़कर उसे उठा ले गया और मार डाला। कुछ साल पहले एक समाचार पढ़ा था कि मुंबई में एक सर्पमित्र को उसके ही घर में उसके द्वारा पकड़े गए सर्प ने डस लिया और उसकी मौत हो गई। हम देखते हैं कि लोग शौक से कुत्ते पालते हैं और उनका खयाल भी रखते हैं। फिर भी लोगों को कुत्ते अक्सर काट ही लेते हैं। क्योंकि पशुओं के स्वभाव का आकलन नहीं लगाया जा सकता है। हमारे घर के समीप ही मंदिर परिसर और संतों का एक आश्रम है। उसमें गौशाला भी है। उसकी देखभाल सेवाधारी लोग एवं साधु-संत स्वयं करते हैं। करीब ६०-७० गाय वहां नियमित रहती हैं। एक दिन हम वहां दर्शन-पूजा करने पहुंचे। पूजा के बाद अक्सर गाय को घास खिलाने हम गौशाला की ओर भी चले जाते हैं। उस दिन हम पहुंचे तो हमें गौशाला की ओर थोड़ा शोरगुल सुनाई पड़ा। हमने देखा की एक नंदी और एक गाय आमने-सामने खड़े होकर एक-दूसरे को बहुत ही क्रोध में घूर रहे थे। नंदी की रस्सी छूट गई थी और गाय पहले से ही बिना बंधे खड़ी थी। दोनों एक-दूसरे पर आक्रमण करते जा रहे थे। एक-दूसरे को सींग धंसाने के चक्कर में थे। यह देखकर दौड़ते हुए उन्हें संभालने वाले साधु वहां पहुंचे। उन्होंने नंदी के गले की रस्सी हाथ में पकड़ी और गाय को हिदायत देकर पीछे करने का प्रयत्न करने लगे। वे इन गायों के स्वभाव से परिचित थे। इसलिए उन्हें ऐसी परिस्थितियां संभालने का अनुभव था। लेकिन तभी उनका पैर फिसल गया और वह धड़ाम से नीचे गिर पड़े। उनके कंधे, कमर और पैर में गंभीर चोट लग गई और प्रैâक्चर हो गया। वे उठ भी नहीं पा रहे थे। यह देखते ही क्रोध में खड़े नंदी और क्रोध में खड़ी गाय दोनों एकदम शांत हो गए। वे भी उन्हें रोजाना नहलाने-धुलाने, बांधने और चारा खिलाने वाले साधु से भली-भांति परिचित थे। उनके गिरते ही दोनों पालतू पशु सकपका गए और एकदम शांत खड़े हो गए। इतना ही नहीं, एक साधारण से व्यक्ति ने आकर नंदी की रस्सी पकड़कर उसे खूंटे से बांध दिया। इसका नंदी ने कोई विरोध नहीं किया। इसी तरह गाय को कुछ महिलाओं ने एक तरफ जाने को कहा और गाय चुपचाप चली भी गई। फिर साधु को उठाकर लोग एक तरफ ले आए। बाद में उन्हें अस्पताल भेजा गया। वे कुछ दिनों अस्पताल में ही रहे। यह देखकर एक बात समझ में आई की पशु केवल हिंसक ही नहीं होते, बल्कि वे मनुष्य से संवेदना भी रखते हैं और उनके अंदर भी दया भाव होता है। क्योंकि संत जैसे ही गिरे नंदी और गाय दोनों का क्रोध एकदम शांत हो गया और दोनों एकटक उन्हें निहारने लगे। जैसे कोई मनुष्य किसी को चोट पहुंचने पर द्रवित होता है, इस तरह वे दोनों द्रवित भी हो गए। इतना ही नहीं, अन्य लोगों के बड़े ही सहजता से एक तरफ जाने को कहने पर वे दोनों अपने खूंटों की ओर भी चले गए। इसीलिए मनुष्य ने पशुओं को हिंसक और पालतू दो श्रेणियों में रखा है। हिंसक पशुओं को रिहायशी परिसर में पालना ही गलत है। उनसे तो सदा बचकर रहना होता है। जंगल ही उनका ठिकाना है। पशु संवर्धन परिसर और चिड़ियाघर के प्रशिक्षित लोग ही उन्हें संभाल सकते हैं, परंतु छोटी गलतियों से उन्हीं के शिकार बन जाने की खबरें भी हम सुनते हैं। पालतू पशुओं को संभालने के लिए भी अच्छा अध्ययन और अनुभव जरूरी है। पशु मनुष्य के मित्र हो सकते हैं। इसके बावजूद फालतू पशु भी कभी-कभी हिंसक हो उठते हैं। इसलिए पशुओं से मित्रता के साथ ही बहुत ही सावधानी भी रखनी चाहिए।
(लेखिका स्तंभकार एवं सामाजिक, राजनीतिक मामलों की जानकार हैं।)

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