मुख्यपृष्ठनमस्ते सामनामुंबई मिस्ट्री : आज का सीएसएमटी जब फांसी तालाब था!

मुंबई मिस्ट्री : आज का सीएसएमटी जब फांसी तालाब था!

विमल मिश्र। माथे पर सिंदूर, गले में माला और गाजे-बाजे के साथ पीछे चलता जुलूस …। नहीं, यह किसी बारात का दृश्य नहीं था। यह नजारा था मुंबई में दुर्दांत अपराधियों को फांसी दिए जाने से ठीक पहले का। इसकी जगह होती थी फोर्ट के बाजार गेट के सामने। यह वधस्थल उस जगह के बिल्कुल पास था, जहां आज भारत का सबसे पहला और सबसे व्यस्त रेलवे स्टेशन व टर्मिनस मौजूद है- विश्व विरासत मुंबई छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस।

मुंबई के सबसे जीवंत स्थान ढूंढ़ने जाएं तो संभवत: सबसे पहला नाम होगा मुंबई छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस। इसे देखकर आज किसे कल्पना हो सकती है कि आज से दो सदी से पहले यहां मरघट का सन्नाटा छाया रहता था। इस जगह दी जाती थी फांसी और यह शहर के सबसे भुतहा और अपशकुनी स्थानों में गिना जाता था।
देश का पहला रेलवे स्टेशन जिस जगह पर शान से सिर तानकर खड़ा है, वहां करीब डेढ़ सौ साल पहले तक फांसी तालाब (‌गिब्बेट गेट) नाम से कुख्यात एक बड़ा-सा तालाब मौजूद था। बाजार गेट के मुहाने पर और आजाद मैदान के बिल्कुल निकट। उस जमाने के प्रसिद्ध इतिहासकार गोविंद नारायण ने अपनी मराठी पुस्तक में पुर्तगाली काल के इस वधगृह का कंपा देनेवाला ब्यौरा दिया है, ‘पुराने जमाने में रीत थी कि खूंखार अपराधियों को सार्वजनिक रूप से और इस हौलनाक ढंग से मौत की सजा दी जाए कि देखनेवालों के दिल में खौफ जम जाए और उनमें खुद ऐसा अपराध करने की हिम्मत न हो।’
गोविंद नारायण लिखते हैं, ‘विदेशी शासकों ने जान-बूझकर वधगृह का स्थान बाजार गेट चुना था, जो किलेबंदी के भीतर मुख्य शहर के चार प्रवेशद्वारों में से एक था। फांसी की सजा पाए अपराधियों को यहां उनके माथे पर सिंदूर पोत, गले में प्याज की माला पहनाकर गधे पर उल्टे मुंह बैठाकर तेज शोर के बीच डुगडुगी के साथ परेड कराते लाया जाता। यहां बने खंभे में बांधकर उन्हें कोड़े लगाए जाते और पिंजड़े में बंद करके गोल-गोल तब तक घुमाया जाता, जब तक वे बेहोश न हो जाएं। लकड़ी का एक यंत्र इस बीच उस पर गोबर उड़ाता रहता। मिट्टी, गोबर, सड़े हुए अंडों, जूतों और पत्थरों की बौछार के बीच बेइज्जती करते हुए अपराधियों को फिर सरे-आम फांसी पर लटका दिया जाता।
पाट दिया गया फांसी तालाब
फांसी तालाब कब तक मौजूद रहा, इसका बहुत दिनों तक ठीक-ठीक पता नहीं चल पाया। महानगरपालिका के सार्वजनिक निर्माण विभाग के रिकॉर्ड में मई, १८७६ में रेलवे के कंसल्टिंग इंजीनियर की वह अर्जी आज तक संभालकर रखी हुई है, जिसमें उसने फांसी तालाब को पाटने के‌ लिए सामग्री हटाने की दरख्वास्त की है। तालाब पाटे जाने के एक वर्ष बाद ही यहां ‌विक्टोरिया टर्मिनस के निर्माण का काम शुरू हो गया।
स्वतंत्रता सेनानियों को भी दिया गया मृत्युदंड
फांसी तालाब पर केवल दुर्दांत अपराधी ही फांसी पर लटकाए जाते थे, ऐसा नहीं था। गोरी सत्ता के खिलाफ बगावत करनेवाले कितने ही स्वतंत्रता सेनानियों को भी यहां सरेआम मृत्यु दंड दिया गया। १८५७ का पहला स्वतंत्रता संग्राम जब मुंबई में भी रंग दिखा रहा था। मुंबई के पुलिस सुपरिटेंडेंट पद पर चार्ल्स फोर्जेट नामक गोरे अफसर ने अपने ऑफिस के सामने ही फांसी की टिकटियां खड़ी कर दी थीं, जहां बैठे-बैठे आजादी के मतवालों को फांसी पर लटकाए जाते देखा करता। पास ही आजाद मैदान था, जहां स्वतंत्रता सेनानियों की पीठें तोप के मुंह से बांधकर उन्हें बहुत निर्ममता से गोलों से उड़ा दिया जाता था।
(लेखक ‘नवभारत टाइम्स’ के पूर्व नगर संपादक, वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं।)

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