मुख्यपृष्ठनए समाचारआज और अनुभव : बरखा रानी बच के रहना रे बाबा...

आज और अनुभव : बरखा रानी बच के रहना रे बाबा…

कविता श्रीवास्तव
पानी ने इन दिनों कई राज्यों में तबाही मचा रखी है। हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, हरियाणा, जम्मू-कश्मीर, राजस्थान और दिल्ली में कई जगहें जलमग्न हैं। भारी बारिश और जमीन धंसने से अब तक कई लोगों की मौत हो चुकी है। पानी का सैलाब इमारतें ढहा रहा है। गांव-शहर बहा ले जा रहा है। तूफानी बारिश के कारण पहाड़ धंसने, पुल टूटने, रिहायशी इलाके डूबने आदि घटनाओं से अनेक जिंदगियां तबाह हो चुकी हैं। अनगिनत लोगों की जानें जल सैलाब के आगोश में समा गई हैं। हमने तो हमेशा ही देखा है कि कुछ घंटों की भारी बारिश भी मुंबई की गतिविधियों को प्रभावित कर देती है। इस बार भी मौसम की पहली ही अतिवृष्टि में यह नजारा हम बीते दिनों देख चुके हैं। मुंबई की सड़कों पर उभरे गड्ढे यूं तो मूड ही बिगाड़ देते हैं। लेकिन बारिश में जब सड़कों पर पानी भर जाता है तो गड्ढे तो दिखते भी नहीं। बस पानी ही पानी नजर आता है। ऐसे में अंडरग्राउंड नालों के मैनहोल, सड़कों के गड्ढे, खुली गटर ये सब कहां-कहां हैं पता ही नहीं चलता। इन्हीं की चपेट में आकर वाहनों समेत कई जिंदगियां इनका शिकार बन जाती हैं। मुंबई में कुछ वर्षों पहले सड़कों पर बारिश का पानी जमा होने से मैं भी धोखा खा चुकी हूं और जान जाते-जाते बच गई। मुझे अच्छी तरह याद है कि लगातार चार-पांच दिनों तक बारिश होती ही रही और हम घर से बाहर नहीं निकल पाए। घर के लिए कुछ सामग्रियां लाना बहुत ही आवश्यक था। लेकिन बारिश इतनी ज्यादा थी कि बाहर निकलना संभव ही नहीं था। वर्षा रानी थम ही नहीं रही थी। चार दिनों बाद जब बारिश थोड़ा हल्की हुई तो हमने स्कूटी पर निकलकर फौरन सामग्रियां खरीदकर वापस लौटने का मन बनाया। बारिश के धीमा होते ही हम घर से स्टेशन की ओर निकल पड़े। हमने सामान तो खरीद लिया, लेकिन लौटने तक शाम का अंधेरा भी हो गया था और बारिश भी तेज होने लगी थी। हम उसी बरसात में घर लौटने लगे, इस डर से कि कहीं बारिश और भी तेज न हो जाए। हमने शॉर्टकट रास्ते पर अपनी स्कूटी आगे बढ़ाई। लेकिन यह क्या? आगे तो पूरी सड़क ही लबालब भरी हुई थी। इस तरफ हम थे, उस तरफ हमारा इलाका और बीच में पानी भरा हुआ था। हमने हिम्मत करके उस पानी में ही स्कूटी चला दी। लेकिन स्कूटी बीचों-बीच रुक गई। हमने स्कूटी को एक तरफ सरकाकर सुरक्षित किया। फिर मजबूरन घुटने तक पानी में किनारे से चलने लगे। संभलकर चलते हुए घर की तरफ हम आगे बढ़ने लगे, तभी अचानक मैं एक गहरे गड्ढे में गिर पड़ी। यह तो कुदरत का करिश्मा था कि मेरे हाथ फैल गए और मैं अगल-बगल की जगहों का टेका लेकर लटक गई। फिर मेरी समझ में आया कि नीचे बहुत बड़ा नाला था, जिसमें तेज गति से पानी बह रहा था। मेरे पति ने दौड़कर मुझे ऊपर खींच लिया। अगर एक पल की भी देरी होती तो मैं उस तेज बहाव वाले नाले में फिसलकर बह गई होती। मुझे बाहर निकालने के बाद पति मेरा हाथ पकड़कर आगे बढ़ रहे थे। तभी अगले गड्ढे में वो भी गिर पड़े। लेकिन मेरा हाथ मजबूती से पकड़े होने की वजह से वह भी मेरी तरह बच गए। हम दोनों किसी तरह धीरे-धीरे पानी से बाहर आकर अपने घर पहुंचे। उसके बाद बहुत देर तक हम सकपकाए से रहे। हमारा कलेजा कांप उठा था। क्योंकि हम आए दिन सुनते हैं कि कोई मैनहोल में गिर गया और उसका शव नहीं मिला या कई दिन बाद कोई शव मिला। कोई नाले में बह गया और उसकी लाश गायब हो गई। हमारे साथ भी ऐसा हादसा हुआ और हम मौत के मुंह से निकलकर बाहर आए, यह सुनकर घर के लोगों सहित पड़ोसियों, रिश्तेदारों ने ढेर सारी हिदायतें देनी शुरू कर दीं कि क्या जरूरत थी, ऐसे बारिश में बाहर निकलने की? बहते हुए पानी में स्कूटी ले जाने की? सीधे सड़क से क्यों नहीं आए? बगल से क्यों आने लगे? इन सबके बावजूद हम उस ईश्वर को धन्यवाद दे रहे थे, जिसने हमारी जान बचा ली। घरवालों ने कहा कि कोई बड़ा संकट था टल गया। उसके बाद हमें समझ आया कि लोगों की सीख और हिदायतों को हमेशा नजरअंदाज ही नहीं करना चाहिए। ओवर कॉन्फिडेंस भी बहुत गलत बात होती है। हमने मन बना लिया कि कभी भी पानी से खिलवाड़ नहीं करना है। बहता हुआ पानी हो या थमा हुआ पानी हो। उसके भीतर क्या है यह बाहर से कभी पता नहीं चलता। इसलिए पानी से हमेशा डरना चाहिए और बच के रहना चाहिए। इन दिनों जो जलसैलाब और बाढ़ का नजारा हम देश-विदेश में देख रहे हैं, उससे लोगों के हालात का आकलन करके ही कलेजा कांप उठता है। लेकिन कुदरत के आगे किसी की नहीं चलती। कुछ हमारी भी गलतियां हैं। पहाड़ों को तोड़ना, जंगलों को काटना, पर्यावरण के प्रति बिल्कुल चिंता नहीं करना इसी से ग्लोबल वार्मिंग भी बढ़ रही है और मौसम भी प्रतिकूल स्वभाव दिखाता जा रहा है। इसलिए कुदरत की संरचना की देखभाल और पर्यावरण की रक्षा के दायित्व के प्रति हमें हमेशा सजग रहना चाहिए। कुदरती आपदाओं से बचने के उपाय करने चाहिए।
(लेखिका स्तंभकार एवं सामाजिक, राजनीतिक मामलों की जानकार हैं।)

अन्य समाचार