मुख्यपृष्ठस्तंभआज और अनुभव : इंश्योरेंस एजेंटों के झूठ पर कसो नकेल

आज और अनुभव : इंश्योरेंस एजेंटों के झूठ पर कसो नकेल

कविता श्रीवास्तव
इंश्योरेंस हमारे जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। यह कोई आवश्यक कार्य नहीं है। लेकिन भविष्य में कभी भी आपत्ति, विपत्ति, संकट, बीमारी या दुर्घटना होने पर इंश्योरेंस आर्थिक भरोसे का एक सिस्टम है। इसीलिए इंश्योरेंस कंपनियां बनी हुई हैं। लगभग हर व्यक्ति के जीवन ही नहीं, बल्कि गाड़ी, मकान, इमारतें, कल-कारखाने, उद्योग, यात्रा और अनेक चीजों के लिए इंश्योरेंस कराए जाते हैं। इसके लिए निर्धारित प्रीमियम देना होता है। लेकिन जब इंश्योरेंस को क्लेम किया जाता है तब नियमों और शर्तों को लेकर तमाम तरह की अड़चनें झेलनी पड़ती हैं। इसकी शिकायतें उपभोक्ता अदालतों में बढ़ी हैं। इसी विषय को गंभीरता से लेते हुए उपभोक्ता अदालत ने देश के वित्त मंत्रालय को सुझाव दिया है कि वे इंश्योरेंस एजेंटों को गलत जानकारी और झूठे वादे देकर इंश्योरेंस पॉलिसी करवाने का चलन रोकने के लिए ठोस कदम उठाएं। हमने अक्सर देखा है कि पॉलिसी लेने के लिए इंश्योरेंस एजेंट तरह-तरह के लुभावने वादे और जानकारियां देते हैं। लेकिन जब इंश्योरेंस क्लेम किया जाता है तो कंपनियों के नियम-कानून वैसे नहीं होते हैं जैसा एजेंट ने बताया होता है। इसी बात को लेकर अब एजेंटों की जानकारी और उनके द्वारा बताए गए वादों की वीडियो रिकॉर्डिंग करने का सुझाव उपभोक्ता अदालत ने दिया है। इंश्योरेंस एजेंटों को इंश्योरेंस कंपनियां अच्छी-खासी रकम कमीशन के रूप में देती हैं। इसी कमीशन के चक्कर में वे अधिक से अधिक पॉलिसी बनवाने के चक्कर में रहते हैं। लेकिन इंश्योरेंस क्लेम के समय उपभोक्ता को दिक्कतें होती हैं। इंश्योरेंस एजेंटों की गलत पॉलिसी से उपभोक्ता कितने दुखी होते हैं, मुझे इसका बड़ा ही बुरा अनुभव है। मैंने एक साधारण सी जीवन बीमा पॉलिसी ली और एजेंट को कहा कि उसे १० साल के लिए ही करे। लेकिन एजेंट ने अपना कमीशन लंबे समय तक सुनिश्चित करने के लिए मेरी पॉलिसी को ३० साल का करवा दिया। जब पॉलिसी हाथ में आई तो मुझे इस बात पर बड़ा क्रोध आया। क्योंकि मुझे १० साल बाद पॉलिसी बदलवानी थी। लेकिन एजेंट की चालाकी की वजह से अब मुझे उसे पॉलिसी के लिए ३० साल खत्म होने तक इंतजार करना पड़ेगा। इससे इंश्योरेंस को लेकर मेरी अन्य योजनाएं प्रभावित हुर्इं। इसी तरह जीवन बीमा विभाग ने एक बार फिक्स डिपॉजिट की तरह एक स्कीम निकाली थी। मुझे एजेंट ने बताया कि यह रकम तय समय से पहले भी निकाल सकते हैं। लेकिन कम-से-कम एक साल बाद आप रकम वापस ले सकते हैं। उस पर आपको ब्याज भी मिलेगा और कोई कटौती नहीं होगी। एजेंट के समझाने पर मैंने वह पॉलिसी ले ली। लेकिन एक साल बाद जब मैंने वह रकम निकालने की पेशकश की तो मुझे मेरी मूल रकम से भी कम रकम मिली। बाद में एजेंट ने बताया कि इसमें आपका इंश्योरेंस हुआ इसलिए चार्ज लिए गए हैं। लेकिन पॉलिसी लेते समय उसने मुझे यह जानकारी नहीं दी थी और कहा था कि कुछ नहीं कटेगा और ब्याज भी मिलेगा। उसके झांसे में आने से मुझे एक साल बाद अपने मूल रकम से भी कम रकम मिली तो एजेंट पर बहुत क्रोध आया। उसकी गलत जानकारी की वजह से मेरे पैसे का भी नुकसान हुआ और मुझे धोखा होने का एहसास होने से मन बहुत ही दुखी हुआ। इसी तरह मैंने एक एजेंट से अपनी कार का इंश्योरेंस रिन्यू करवाने को कहा। लेकिन उसने इंश्योरेंस में अपना ईमेल आईडी और अपना फोन नंबर डाल दिया। इसलिए मुझे कोई संदेश या अधिकृत जानकारी नहीं मिली। मैंने पूछा तो उसने व्हॉट्सऐप पर पॉलिसी भेज दिया। उसमें मेरा फोन नंबर और ईमेल नहीं था। मेरे कई बार कहने पर भी वह सुधार नहीं कर पाया। इस तरह इंश्योरेंस एजेंट के कार्य से मुझे धोखे ही हुए हैं। मेरा तो उन पर भरोसा नहीं रहा, जबकि इंश्योरेंस कंपनियां भरोसा यानी गारंटी देने का काम करती हैं। उपभोक्ता अदालत ने कहा है कि एजेंट के साथ होनेवाली वार्तालाप को रिकॉर्ड करना चाहिए। क्योंकि अगर वह गलत जानकारी देते हैं तो यह बात इंश्योरेंस कंपनी के सामने रखी जा सकती है और इसके लिए जिम्मेदारी तय की जा सकती है। क्योंकि उपभोक्ता पूरे नियम व शर्तें पढ़ व समझ नहीं पाता है। वह इंश्योरेंस एजेंट की बताई हुई बातों पर भरोसा करता है। कई बार लिखित नियम व शर्तें साधारण लोगों की समझ में नहीं आते हैं। हर आदमी नियमों को पूरी तरह से पढ़ने की बजाय एजेंटों को अधिकृत व्यक्ति मानकर उन पर भरपूर भरोसा करता है। लेकिन एजेंट झटपट पॉलिसी बनवाने के चक्कर में बड़ी चालाकी से झूठ बोल जाते हैं। गलत दावे करते हैं या कई जानकारियां छुपा लेते हैं। यह सीधे तौर पर उपभोक्ता को धोखा देने जैसा कृत्य है। इसे एक तरह का झांसा भी समझा जाना चाहिए। इंश्योरेंस एजेंट केवल कमीशन कमाने के चक्कर में ही रहते हैं। जबकि उपभोक्ताओं को बेहतर सेवा देना भी उनका दायित्व है। उनकी शंकाओं का समाधान करना भी उनका दायित्व है। इंश्योरेंस के क्लेम को पास करवाने के लिए भी उन्हें मदद करनी चाहिए। आखिर वे कमीशन किस बात का लेते हैं। इन्हीं बातों को ध्यान में रखते हुए उपभोक्ता अदालत ने इंश्योरेंस एजेंटों को अधिक जिम्मेदार बनाने, उन्हें सही ढंग से पॉलिसी की जानकारी देने, नियमों को समझाने आदि के लिए वित्त मंत्रालय को लिखा है। यदि इन सुझावों पर अमल होता है तो यह उपभोक्ताओं के पक्ष में बहुत बड़ी राहत की बात होगी। साथ ही उपभोक्ताओं और इंश्योरेंस कंपनी के बीच विवादों में कमी आएगी।
(लेखिका स्तंभकार एवं सामाजिक, राजनीतिक मामलों की जानकार हैं।)

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