मुख्यपृष्ठस्तंभआज और अनुभव : मुट्ठी भर देती हैं कोशिशें!

आज और अनुभव : मुट्ठी भर देती हैं कोशिशें!

कविता श्रीवास्तव

लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती,
कोशिश करनेवालों की कभी हार नहीं होती।
कवि मोहनलाल द्विवेदी की ये मशहूर कविता एशियाई खेलों में इन दिनों भारत के शानदार प्रदर्शन पर याद आ गई। वैसे आजकल खेल का जबर्दस्त माहौल है। वनडे विश्व कप टूर्नामेंट शुरू हो गया है। सभी की निगाहें क्रिकेट के मैदानों पर हैं। दूसरी ओर चीन में चल रहे एशियाई खेलों में भारतीय खिलाड़ियों ने विजेता बनकर सोने-चांदी की चमक-दमक लूटने का जोरदार सिलसिला जारी रखा है। हमारे खिलाड़ियों ने एशियाई खेलों में अब तक का सर्वाधिक उत्कृष्ट प्रदर्शन करते हुए मेडलों की झड़ी लगा दी है। तीरंदाजी, बॉक्सिंग, टेनिस, नौकायन, भालाफेंक, एथलेटिक्स व अन्य खेलों में शानदार प्रदर्शन के अलावा हमारी हॉकी टीम एशियाई खेलों के फाइनल में भी पहुंच गई है। इस तरह पिछले एशियाई खेलों के मुकाबले इस बार सर्वाधिक मेडल जीतने का कीर्तिमान भारतीय खिलाड़ियों ने बनाया है। इससे हमारे तिरंगे की शान बढ़ गई है। खेल के क्षेत्र में मेडल जीतने और चैंपियनशिप हासिल करने पर जो रोमांच होता है, वो हमारे रोम-रोम में उमंग और उत्साह भर देता है। इससे अकेले खिलाड़ी ही नहीं, उस खिलाड़ी से जुड़े प्रत्येक व्यक्ति को गर्व का अनुभव होता है। उसके साथी खिलाड़ी, कोच, उसके संस्थान, उसके रिहायशी परिसर, यार-मित्रों-सहकर्मियों से लेकर गांव-जिले तक खुशी महसूस होती है। जब खिलाड़ी देश का प्रतिनिधित्व करता है तो समूचा देश लहराते तिरंगे को देखकर गर्व का अनुभव करता है। इसका अनुभव हमने तब किया, जब मेरे पतिदेव ने अपने कॉलेज के दौरान मुंबई यूनिवर्सिटी का गोल्ड मेडल हासिल किया था। उन्हें बचपन से ही तैराकी का बहुत शौक था। इसके लिए उन्होंने मुंबई के स्विमिंग पूलों में निरंतर जाने का अपना क्रम कभी नहीं छोड़ा। घंटों पानी में तैरना उनका शौक रहा है। इस शौक का फायदा उन्हें तब मिला, जब वे डिग्री कालेज पहुंचे। पता चला कि कॉलेज में वाटरपोलो की नई टीम बनाई जा रही है। ये भी पहुंच गए। ट्रायल के लिए स्वीमिंग पूल में उतरते ही इन्होंने अपनी कुशल तैराकी दिखाई। इनके जबर्दस्त प्रदर्शन से सैकड़ों तैराकों की उपस्थिति के बावजूद इनका चयन टीम के लिए बड़ी सहजता से हो गया। उसके बाद करीब तीन महीने की सघन प्रैक्टिस चली। इस दौरान बहुत सख्त नियम से इन्होंने कोच की हर सलाह का पालन किया। इन्होंने स्वयं को वाटरपोलो का तगड़ा खिलाड़ी बना लिया। मुंबई यूनिवर्सिटी के टूर्नामेंट हुए और वर्ष १९८५ में इन्होंने मालाड के पी.डी. लायंस कॉलेज की ओर से प्रतिनिधित्व करते हुए मुंबई यूनिवर्सिटी का सिल्वर मेडल हासिल किया। इनकी वह उपलब्धि ऐसी रही कि परिवार सहित पूरा इलाका जश्न मनाने इकट्ठा हो गया। उस साल इनकी कॉलेज की टीम दूसरे स्थान पर रही। पहले स्थान से चूकने के बाद सालभर इस टीम ने कड़ा अभ्यास किया और अगले वर्ष इनकी कॉलेज टीम ने मुंबई यूनिवर्सिटी का चैंपियनशिप लेकर गोल्ड मेडल जीतने का सौभाग्य पाया। मुझे आज भी याद है, वह दिन जब मुंबई यूनिवर्सिटी का गोल्ड मेडल जीतकर ये घर लौटे तो उत्सव जैसा माहौल बन गया। सबसे ज्यादा खुशी हमारे माता-पिता और परिजनों को हुई। ऐसे जैसे मुंबई यूनिवर्सिटी का गोल्ड मेडल नहीं, बल्कि विश्व कप जीत लिया हो। लेकिन ऐसी जीत हासिल करने के लिए इन्हें वर्षों की लगन, कठिन परिश्रम और ढेर सारे त्याग करने पड़े क्योंकि खिलाड़ी को नियमित अभ्यास, पौष्टिक पोषण के साथ ही अपने रहन-सहन में काफी बदलाव लाना पड़ता है। ऐसा करने के लिए खेल को समय देना पड़ता है और दूसरी कई चीजें छूट जाती हैं। उस साल इन्होंने गोल्ड मेडल लाया तो कॉलेज में प्रâीशिप मिली और भरी हुए फीस के पैसे कॉलेज ने इनाम के तौर पर वापस लौटा दिए। वह राशि पुरस्कार स्वरूप जब वो घर ले आए तो उसकी बहुत कीमत महसूस की गई। मानो कोई छिपा हुआ खजाना मिल गया हो। आज भी मुंबई यूनिवर्सिटी का वह गोल्ड मेडल और प्रमाणपत्र हमारे घर में शान से रखा हुआ है। वह हमेशा प्रेरणा देता है कि कुछ हासिल करने के लिए खूब परिश्रम और लगन से काम करना चाहिए। बाधाओं को चीरकर आगे बढ़ते रहने से सफलता मिलती ही है।
मोहनलाल जी की प्रेरक पंक्तियां हैं-
डुबकियां सिंधु में गोताखोर लगाते हैं,
जा-जाकर गहरे पानी में खाली लौट आते हैं।
मिलते ना मोती सहज ही गहरे पानी में,
बढ़ता दूना उत्साह इसी हैरानी में।
मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती,
कोशिश करनेवालों की हार नहीं होती।
(लेखिका स्तंभकार एवं सामाजिक, राजनीतिक मामलों की जानकार हैं।)

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