मुख्यपृष्ठस्तंभआज और अनुभव : याद आती है चालियों की दीपावली

आज और अनुभव : याद आती है चालियों की दीपावली

कविता श्रीवास्तव

दीपावली एक दिन का नहीं, बल्कि कई दिनों का त्योहार है। दीपावली से पहले ही घर की साफ-सफाई, रंगरोगन, पकवान, दीयों की रोशनी, पटाखे आदि की ढेर सारी तैयारियां शुरू हो जाती हैं। कोई तीस-पैंतीस साल पहले जब मुंबई में ज्यादातर लोग चालियों में रहा करते थे, उन दिनों कौन किसके यहां आया इसकी खबर सबको हो जाती थी। किसके घर में क्या पक रहा है, यह पैâल रही खुशबू स्वयं बता देती थी। लोग मिलकर त्योहार मनाते थे। सुख-दु:ख में सभी सहभागी बनते। अगर हमारी चाल में किसी एक ने चकली बनाई तो हर घर में चकली बनने लगती। इसी तरह गुझिया, बेसन के लड्डू, नानखटाई, चिवड़ा और न जाने क्या-क्या हम सभी एक-दूसरे की मदद से बना लेते थे। एक-दूसरे के घर पकवानों भरी थाली भेजने का भी खूब रिवाज था। हर घर के दरवाजे पर कंदील जरूर लगता था। मेरे पति भी बहुत अच्छा कंदील बनाते हैं। खैर, हमारी चाल में एक दबंग और गुंडा किस्म का व्यक्ति विजय रहता था, जिससे किसी की भी नहीं जमती। दिवाली के मौके पर एक दिन उसकी पत्नी हमारे घर आई और अनुनय-विनय करते हुए वो मेरे पति से बोली, ‘आप बहुत अच्छा कंदील बनाते हैं। इसलिए एक कंदील हमारे लिए भी बना दीजिए न।’ इसके साथ ही उसने ये भी कहा कि ये अनुरोध उसके पति विजय ने किया है। उसकी बात सुनकर मेरे सहृदय पति ने उसके अनुरोध को स्वीकार करते हुए एक सुंदर सा कंदील बनाकर उसके घर भेज दिया। सबके घरों में कंदील चमक रहे थे और विजय के घर पर मेरे पति के हाथों बना कंदील जगमगा रहा था। अब दीपावली वाले दिन विजय की पत्नी हमारे घर पकवानों की थाल और कुछ पैसे लिए पहुंची। दिवाली की शुभकामनाएं देते हुए वो बोली कि कंदील बेहद सुंदर बना है। मेरे पति ने कुछ पैसे आपके लिए उपहारस्वरूप भेजा है। विजय जैसे व्यक्ति से इस तरह के व्यवहार की हमें बिल्कुल भी उम्मीद नहीं थी। उसका यह व्यवहार हमारे लिए बहुत ही आश्चर्यजनक था। उसकी भलमनसाहत भरी सोच और उपकार के बदले में दी गई भेंट से उसके व्यवहारिक गुणों का परिचय मिला। हमने भले ही उसके लिए एक बार कंदील बनाया। लेकिन उसके अपनत्वभरे व्यवहार ने उसके प्रति हमारी सोच बदल दी। आज भी दिवाली के मौके पर कंदील को देख हमें विजय और चालियों की उन दिनों की दिवाली बहुत याद आती है। सबका मिल-जुल कर पटाखे फोड़ना, एक-दूसरे का ध्यान रखना बहुत याद आता है। एक-दूसरे के घर जाकर पकवान बनाना, पूरी बस्ती का एकजुट होकर जश्न मनाना, हर घर के व्यंजन का स्वाद मिलना और सामुदायिक शक्ति का भरोसा होना सब याद आता है। दिवाली ही नहीं, होली, गणेशोत्सव, नवरात्रि, गोविंदा जैसे त्योहारों के सार्वजनिक आयोजन चालियों में जिस तरह एकजुटता और समुदायिकता के साथ मनाए जाते हैं, वैसा उत्साह-जोश ऊंची इमारतों-बिल्डिंगों के रहन-सहन और संभ्रांत सोसायटियों में देखने को नहीं मिलता। चालियों के आयोजन में अपनापन था, परिवारिकता थी, एक-दूसरे को संभालने का भरोसा था। उन दिनों की मैत्री, उन दिनों के संबंध आज भी कायम हैं। कभी-कभी मन करता है कि चालियों वाले दिन फिर लौट आएं। वह सुकून, वह सामाजिकता फिर से मिले। वह नोक-झोंक, सारी दुनिया की खबरों पर चर्चा, सबकी कानाफूसी आदि से भरा सक्रिय जीवन लौट आए। वही आदमी का नैसर्गिक जीवन है। आज का जीवन तो मोबाइल, कंप्यूटर और फ्लैट के बंद दरवाजे के पीछे सिमट-सा गया है। अन्य प्रसंगों की तरह दीपावली भी आई और चली जाएगी। लेकिन त्योहारों में असली सामुदायिक जिंदगी का लुत्फ उठाने का सानिध्य मिलना ही सौभाग्य की बात है। उसका सभी को अनुभव मिले। हर घर में सुख, समृद्धि और खुशियों की कंदील जगमगाए। दीपावली पर यही शुभकामनाएं!

अन्य समाचार