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आज और अनुभव : दामाद जी आए हैं… गांव का दही बाहर नहीं जाएगा!

कविता श्रीवास्तव

 

इन दिनों हर जगह महंगाई का रोना है। रसोई की रोजाना की वस्तुओं के दाम भी महंगे हैं। लेकिन एकदम देहात के गांवों को महंगाई में भी जीना आता है। वहां हर वस्तु खरीदनी नहीं होती। यही गांवों की अपनी खासियत है। गांव में गरीबी तो होती है। लेकिन वहां आत्मनिर्भरता होती है। गांव अपने आप में एक बड़ा परिवार होता है। गांव में कोई भूखा न रहे यह सबकी जिम्मेदारी होती है। सबको स्थानीय स्तर पर काम मिल जाता है। अनाज अपने खेत में उत्पन्न होते हैं। वह श्रमिकों को भी दिए जाते हैं। कोई कितना भी गरीब क्यों न हो, त्योहारों पर सबको कुछ-न-कुछ मिल जाता है। किसी की जरूरत के वक्त काम करने गांववाले खुद ही पहुंच जाते हैं। किसी को बुलाना नहीं पड़ता। यही गांवों का रिवाज है। सब भिन्न-भिन्न होकर भी एकजुट रहते हैं। किसी के घर पूजा, ब्याह या कोई बड़ा कार्यक्रम हो तो सफाई, जलापूर्ति, व्यवस्था आदि के लिए लोग ऐसे खड़े हो जाते हैं मानो उनका अपना ही काम हो। यह आज भी होता है। मैं वाराणसी शहर में रही हूं। विवाह मुंबई में हुआ तो यहां आना पड़ा। पतिदेव को अपने साथ बनारस शहर के मायके तो कई बार ले गई हूं। लेकिन बलिया जिला स्थित अपने पैतृक गांव पतिदेव को एक बार ले जाने का मन था। इच्छा यही थी कि मुंबई में रहनेवाले मेरे पतिदेव मेरे पैतृक गांव को भी एक बार देख लें या यूं कहें कि इन्हें इनके ससुराल का गांव दिखाना था। बहुत अनुनय-विनय पर ये राजी हुए। हम जब बनारस गए तो तय कार्यक्रम के अनुसार सुबह गोरखपुर जानेवाली इंटरसिटी एक्सप्रेस ट्रेन से हम निकले। मेरे पैतृक गांव बाराडीह जाने के लिए हम ठीक समय पर बेलथरा रोड स्टेशन पर उतर गए। चाचाजी और भाई हमें लेने आ चुके थे। तभी एक ग्रामीण ने साइकिल से एक थैली उतारकर मेरे चाचाजी के हाथों में थमाया और गांव की ओर लौट गया। एक अन्य व्यक्ति ने एक और थैली पकड़ा दी। हम कुछ समझे नहीं और बहुत ध्यान भी नहीं दिया। कुछ देर बाद जब हम गांव पहुंचे तो मिट्टी के घर में चारपाई पर बैठकर इन्हें बड़ा आनंद आया। चाचीजी और गांव की एक दादीजी ने हाथ से पंखा डोलाना शुरू किया। तभी बाल्टी भर गन्ने का ताजा रस आ गया। गरमागरम ताजा गुड़ की डलियां भी थाली भरकर आ चुकी थीं। एक परात में कुछ ताजा भुने हुए दाने भी आ गए। इन शुद्ध देहाती सामग्रियों को देखकर बहुत अच्छा लगा। बड़ी बात यह थी कि सब कुछ उस गांव का ही था। कुछ भी बाहर से या बाजार से नहीं आया था। चाचाजी ने वह स्टेशन वाली एक बड़ी थैली खोली। उसमें मिट्टी के बर्तन में जमायी हुई गाढ़ी दही थी। चाचीजी ने उस दही को गन्ने के रस वाली बाल्टी में उंड़ेल दिया और लोटे से मिलाने लगीं। फिर बड़ा गिलास भरकर वह रस हमें पीने को मिला। परात में जो ताजे भुने दाने रखे थे, वह स्टेशन वाली दूसरी थैली से निकले थे। चाचाजी ने बताया कि वह व्यक्ति यह दही बेचने ले जा रहा था। जब उसने देखा कि गांव में दामादजी आए हैं, तो अब यह दही गांव के बाहर नहीं जाएगा। वह दामादजी के लिए दे गया है। इसी तरह वह दानावाला भी ताजा चना-चबेना दे गया। दामादजी हमारे घर आए हैं। इसलिए उनकी सेवा में कोई कमी नहीं रहनी चाहिए। यह पूरे गांव के सम्मान की बात है। इसलिए जहां जो उपलब्ध है, वह सेवा देगा। मैंने पूछा, उनकी आज की आमदनी तो गई। तब चाचाजी ने बताया कि बदले में उसे अनाज दे दिया जाएगा। गांव में इसी तरह मोल चुकाया जाता है। गांव की यह व्यवस्था, आपसी प्रेम और परस्पर सेवाभाव देखना मेरे पतिदेव के लिए विस्मयकारी था। लेकिन यह सब देखकर गांव के प्रति उनके मन में अधिक सम्मान उत्पन्न हुआ। फिर पता चला कि पास ही किसी के खेत में गन्ने की पेराई हो रही है और ताजा गुड़ बनाए जा रहे हैं। हम वहां पहुंचे और गुड़ वैâसे बनता है यह देखा। ये किसान अपने देसी उपकरणों से गन्ने का रस निकालकर पुरानी विधि के अनुसार गुड़ तैयार करके आसपास के बाजारों व गांवों में बेचकर इस परंपरा को आगे बढ़ाते हैं। अगले दिन सुबह हम फिर खेतों की ओर गए। दूर-दूर तक हरे-भरे खेत लहराते दिखे। लोग सुबह से ही खेतों में काम पर लगे हुए थे। हम मेड़ पर चल रहे थे। किसी खेतिहर महिला ने मूली तोड़ कर हमें दिया। किसी ने ककड़ी थमा दी। किसी ने कुछ टमाटर। बड़े प्रेम से वे ताजी वस्तुएं तोड़कर हमारी ओर हाथ बढ़ाए जा रहे थे। हम उन्हें बटोरे जा रहे थे। ये वही वस्तुएं थीं, जिन्हें खरीदने के लिए हम मुंबई के बाजारों में महंगा दाम चुकाते हैं। ऐसा अपनापन, स्नेह और आत्मीय प्रेमभाव हमें हर जगह कहां मिल पाता है! गावों की सभ्यता में प्रेमभाव का इतना बड़ा आधार होता है कि किसी को अकेलापन और असुरक्षा महसूस नहीं होती। अनेक मामलों में गांव आत्मनिर्भर होते हैं। यह देखना पतिदेव को द्रवित कर गया। तब से मेरे पतिदेव जब भी बनारस होते हैं, वे हमारे पैतृक गांव जाने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं। गांव पहुंचते ही ये भी एकदम ग्रामीण बन जाते हैं। गांववाले भी इनको खूब सम्मान देते हैं और इन्हें अपने गांव का ही मानते हैं। गांवों की संस्कृति में रमने का मेरा भी दिल करता है।
(लेखिका स्तंभकार एवं सामाजिक, राजनीतिक मामलों की जानकार हैं।)

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